कल समाप्त होगा अधिक मास, फिर से गूंजेंगी शहनाइयां, शुरू होंगे मांगलिक कार्य

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Adhik Maas

अधिक मास सांकेतिक तस्वीर

Adhik Maas 2026: अधिक मास को मलमास और पुरूषोतम मास के नाम से भी जाना जाता है. यह महिना भगवान विष्णु को सर्मपित है. इस महिने अधात्मिक-धार्मिक कार्य और दान-पूण्य पर जोड़ दिया जाता है और शुभ भौतिक कार्यों पर रोक लगी रहती है.

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Adhik Maas 2026: हिंदू पंचांग के अनुसार, 17 मई 2026 से प्रारंभ हुआ पवित्र अधिक मास 15 जून 2026 (सोमवार) को समाप्त हो रहा है. अधिक मास के समाप्त होते ही पिछले 30 दिनों से रुके हुए सभी मांगलिक और शुभ कार्य, जैसे विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश, नामकरण संस्कार और नए व्यापार की शुरुआत, पुनः आरंभ हो जाएंगे. एक बार फिर शहनाइयों की गूंज सुनाई देने लगेगी.

क्यों रुके रहते हैं शुभ कार्य?

हिंदू ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, अधिक मास में सूर्य की कोई संक्रांति नहीं होती, अर्थात सूर्य इस अवधि में एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश नहीं करता. सौर चक्र में इस संक्रमण-विहीन अवधि के कारण इस मास को मलमास भी कहा जाता है.

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह समय सांसारिक और भौतिक शुभ कार्यों जैसे विवाह, गृह प्रवेश, नए व्यवसाय की शुरुआत या अन्य मांगलिक कार्यों के लिए अनुकूल नहीं माना जाता. इसलिए इस दौरान ऐसे कार्यों पर विराम लगाया जाता है.

अधिक मास को पुरुषोत्तम मास क्यों कहा जाता है?

पौराणिक कथा के अनुसार, सूर्य संक्रांति न होने के कारण इस मास को मलमास कहकर उपेक्षित किया जाता था और कोई भी देवता इसका स्वामी बनने को तैयार नहीं था. तब यह मास भगवान विष्णु की शरण में पहुंचा.

भगवान विष्णु ने करुणावश इसे अपना सर्वोत्तम नाम ‘पुरुषोत्तम’ प्रदान किया और स्वयं इसके अधिपति बने. तभी से अधिक मास को पुरुषोत्तम मास कहा जाने लगा. मान्यता है कि इस मास में की गई पूजा, जप, तप, व्रत और दान का फल सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक प्राप्त होता है.

अधिक मास की समाप्ति पर क्या करें?

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, 15 जून 2026 को अधिक मास का अंतिम दिन अत्यंत पुण्यदायी माना गया है. इस दिन किए गए दान, स्नान और पूजा-पाठ का विशेष महत्व होता है.

  • दीपदान और पवित्र स्नान: इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने और संध्या के समय दीपदान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है.
  • पितृ तर्पण: अधिक अमावस्या पितरों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण और पिंडदान करने का अत्यंत शुभ अवसर मानी जाती है.
  • मालपुए का दान: मान्यता है कि अधिक मास के समापन पर कांसे के पात्र में मालपुए का दान करने से घर में सुख, समृद्धि और शांति का वास होता है तथा भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है.

यह भी पढ़ें: Purushottam Maas का समापन: राजगीर, मधुश्रवा और तपोवन में मलमास की पवित्र परंपरा और आध्यात्मिक महत्व

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Neha Kumari

लेखक के बारे में

By Neha Kumari

नेहा कुमारी वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल में धर्म बीट पर कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं. वह व्रत-त्योहार, राशिफल, पंचांग, ज्योतिष, शुभ मुहूर्त, पौराणिक कथाओं और भारतीय संस्कृति से जुड़े विषयों पर लेख लिखती हैं. उन्होंने वेस्ट बंगाल स्टेट यूनिवर्सिटी से मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन की डिग्री प्राप्त की है.

डिजिटल पत्रकारिता में उन्होंने धर्म, ज्योतिष और भारतीय परंपराओं से जुड़े विषयों पर विशेष अनुभव हासिल किया है. उनका उद्देश्य पाठकों तक सरल भाषा में सटीक, विश्वसनीय और उपयोगी जानकारी पहुंचाना है, ताकि वे धार्मिक और सांस्कृतिक विषयों को आसानी से समझ सकें.

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