शारदीय नवरात्र, तीसरा दिन :चंद्रघंटा दुर्गा का ध्यान

Published at :04 Oct 2016 6:39 AM (IST)
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शारदीय नवरात्र, तीसरा दिन :चंद्रघंटा दुर्गा का ध्यान

जो पक्षिप्रवर गरूड़ पर आरूढ़ होती हैं, उग्र कोप और रौद्रता से युक्त रहती हैं तथा चंद्रघंटा नाम से विख्यात हैं, वे दुर्गा देवी मेरे लिए कृपा का विस्तार करें. संपूर्ण जगत् देवीमय है – 3 तीसरी नवरात्र को देवी के स्वरूप चंद्रघंटा के नाम से पूजा की जाती है .नैवेद्य में केला, दूध और […]

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जो पक्षिप्रवर गरूड़ पर आरूढ़ होती हैं, उग्र कोप और रौद्रता से युक्त रहती हैं तथा चंद्रघंटा नाम से विख्यात हैं, वे दुर्गा देवी मेरे लिए कृपा का विस्तार करें.
संपूर्ण जगत् देवीमय है – 3
तीसरी नवरात्र को देवी के स्वरूप चंद्रघंटा के नाम से पूजा की जाती है .नैवेद्य में केला, दूध और शुद्ध घी मिश्रित चने चढ़ाया जाता है. इससे दुःखों का नाश करके देवी सांसारिक कष्टों से मुक्ति दिलाती हैं. देवी ने कहा – मैं ही सब देवताओं के रूप में विभिन्न नामों से स्थित हूं और उनकी शक्तिरूप से पराक्रम करती रहती हूं. जल में शीतलता, अग्नि में उष्णता, सूर्य में ज्योति एवं चंद्रमा में ठंडक मैं ही हूं.
अहं ब्रह्मस्वरूपिणी। मत्तः प्रकृतिपुरूषात्मकं जगत्। शून्यं चाशून्यं च-
इस वचन के अनुसार भगवती को निखिल विश्वोत्पादक ब्रह्म ही स्वीकार किया गया है. दूसरी बात यह है कि दार्शनिक दृष्टिसे प्रणव का जो अर्थ है, यही ह्लीं का अर्थ है. स्थूल विश्वप्रपंच के अभिमानी चैतन्य को वैश्र्वानर कहते हैं, अर्थात समस्त प्राणियों के स्थूल विषयों का जो उपभोग करता है. इसी जागरित-स्थान वैश्र्वानर को प्रणव की प्रथम मात्रा अकार समझना चाहिए. अर्थात समस्त वाड्मय, चार वेद, अठारह पुराण, सत्ताईस स्मृति, छह दर्शन आदि प्रणव की एकमात्रा अकार का अर्थ है -अकारो वै सर्वा वाक् (श्रुति) अर्थात समस्त वाणी अकार ही है. स्वप्नप्रपंच का अभिमानी चैतन्य को तैजस कहलाता है, अर्थात वासनामात्रा का स्वप्न में उपभोग करता है. यह तैजस ही प्रणव की द्वितीया मात्रा उकार है. अर्थात् अकार-मात्रा की अपेक्षा उकार-मात्रा श्रेष्ठ है.
सुषुप्ति-प्रपंच के अभिमानी चैतन्य को प्राज्ञ कहते हैं. अर्थात वह सौषुप्तिक सुख के आनन्द का अनुभव करता है. यही प्राज्ञ प्रणव की तीसरी मात्रा मकार है. जो अदृश्य-अव्यत्रहार्य- अग्राह्य- अलक्षण- अचिन्त्य तत्व इन मात्राओं से परे हैं. अर्थात अद्वैत शिव ही प्रणव है. वही आत्मा है. अब ह्लीं कार का विचार करें. जो शास्त्र में प्रणवकी व्याख्या है, वही ह्लींकारकी व्याख्या है. ह्लींकार में जो हकार है, वही स्थूल देह है, रकार सूक्ष्मदेह और ईकार कारण-शरीर है. हकार ही विश्व है, रकार तैजस, और ईकार ही प्राज्ञ है.
(क्रमशः) प्रस्तुतिः डॉ एन के बेरा
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