धरती से जुड़ने के दिन

Published at :19 Sep 2016 6:22 AM (IST)
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धरती से जुड़ने के दिन

हमारी आधुनिक शिक्षा और आधुनिक संस्कृति का पूरा फोकस इस पर है कि हम अपने भौतिक पर्यावरण व उसके हर तत्व का कैसे इस्तेमाल और दोहन कर सकें. हम अपनी बुद्धि के प्रभाव व जागरूकता का इस्तेमाल करते हुए जीवन को अनुभव करने के तरीके को कैसे बेहतर बना सकते हैं, इसे नहीं बताया जा […]

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हमारी आधुनिक शिक्षा और आधुनिक संस्कृति का पूरा फोकस इस पर है कि हम अपने भौतिक पर्यावरण व उसके हर तत्व का कैसे इस्तेमाल और दोहन कर सकें. हम अपनी बुद्धि के प्रभाव व जागरूकता का इस्तेमाल करते हुए जीवन को अनुभव करने के तरीके को कैसे बेहतर बना सकते हैं, इसे नहीं बताया जा रहा है.

हमने अपने आसपास की हर चीज का इस्तेमाल करना सीख लिया, फिर भी हमारा कल्याण नहीं हुआ. अगर आप अपनी भौतिक स्थितियों को बेहतर करने की कोशिश करते हैं, तो केवल वही बेहतर होते हैं, लेकिन इससे आपमें या जीवन को अनुभव करने के आपके तरीके में कोई सुधार नहीं आता. जब आप सांस लेते हैं, तो हवा की कोई ऐसी खास मात्रा नहीं है, जो आपकी या मेरी हो. अपने आस-पास के परिवेश के साथ लेन-देन किये बिना आप जीवित नहीं रह सकते. हमारी बुद्धि और जागरूकता ही हमारे विरुद्ध उठ खड़ी हुई है, क्योंकि हमने कभी अपने लिए एक पर्याप्त मजबूत आधार तैयार करने की कोई जरूरत ही नहीं समझी. इसीलिए पृथ्वी तत्व हमारे लिए इतना महत्वपूर्ण है और इसीलिए आपका मूलाधार स्थिर है.

इस धरती के साथ संबंध बनाने का और अपने मूलाधार को स्थिर करने का सहज तरीका है कि नंगे पैर चलना. अमावस्या से दो दिन पहलेवाला दिन प्रदोष होता है. उस दिन चंद्रमा का गुरुत्वाकषर्ण एक जड़ता को पैदा करता है और इसमें आपका शरीर व उसकी ऊर्जा अन्य दिनों की अपेक्षा धरती से ज्यादा जुड़ी होती हैं, क्योंकि यह आपको उसी दिशा में खींच रही है. वहीं पूर्णिमा के दिन चंद्रमा का आकर्षण आपको उलटी दिशा में ऊपर की ओर खींचता है. इसलिए अमावस्या, प्रदोष, शिवरात्रि व पूर्णिमा के लिए अलग-अलग तरह के योगिक अभ्यास करने की परंपरा है.

अगर रोज संभव न हो, तो कम-से-कम इन तीन दिनों में, प्रदोष से लेकर अमावस्या तक, आप नंगे पैर रहें और चलें. अगर आप बाहर नंगे पैर नहीं निकल सकते, तो घर में नंगे पैर रहें, फर्श पर आलथी-पालथी मार कर बैठें. ये दोनों क्रियाएं आपके भीतर न सिर्फ धरती से ऊर्जा का गहन संबंध जोड़ती हैं, बल्कि आपके भीतर पृथ्वी का अंश होने का भाव भी जगाती हैं.

-सद्गुरु जग्गी वासुदेव

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