धर्म और धन

Published at :02 Sep 2016 6:01 AM (IST)
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धर्म और धन

हमारे वेदों के साहित्य में लिखा है- धर्म सच्चाई है. तब अर्थ आता है, जिसका मतलब है माध्यम. धन एक माध्यम है. तब इच्छाएं आती हैं. और फिर मोक्ष आता है. इसका अर्थ है धार्मिकता समृद्धि पर निर्भर करती है. यदि सभी समृद्ध होंगे, तो कोई भी चोरी नहीं करेगा. धर्म का आधार समृद्धि है. […]

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हमारे वेदों के साहित्य में लिखा है- धर्म सच्चाई है. तब अर्थ आता है, जिसका मतलब है माध्यम. धन एक माध्यम है. तब इच्छाएं आती हैं. और फिर मोक्ष आता है. इसका अर्थ है धार्मिकता समृद्धि पर निर्भर करती है. यदि सभी समृद्ध होंगे, तो कोई भी चोरी नहीं करेगा. धर्म का आधार समृद्धि है. और धन का आधार राष्ट्र है. धन महत्वपूर्ण है, परंतु धन केवल एक साधन है. धन सब कुछ नहीं है. धन को कभी भी खुशी से नहीं जोड़ना चाहिए. आप गौर करें कि गरीब लोग भी खुश होते हैं. धन सुरक्षा की एक गलत धारणा बन जाता है.

आप सोचते हो यदि आपके पास धन है, तो आपके पास सब कुछ है. सवाल है कि आप धन क्यों चाहते हो? आराम के लिए न. आराम के तीन प्रकार हैं. शारीरिक आराम, भावात्मक और मानसिक आराम, और अाध्यात्मिक आराम यां आंतरिक आराम. धन केवल एक तरह का आराम दे सकता है- शारीरिक आराम. यह भावनात्मक और अाध्यात्मिक आराम नहीं देता. जैसे हम जीवित रहने के लिए खाते हैं, परंतु यदि हम केवल खाने के लिए जीवित रहे, तो हमारे साथ बुनियादी तौर पर कुछ गलत है. ग्रंथ और प्राचीन लोग बड़ी खूबसूरती से बताते हैं कि आपको अपने धन को इस्तेमाल कैसे करना चाहिए.

आप धन को पांच भागों में बांट लो. एक भाग आप अपने इस्तेमाल के लिए रखो. एक भाग आप बचा लो. एक भाग आप तुरंत जरूरतों पर खर्च करो. यानी आप परिवार के लिए खर्च करो, जिससे मेरा मतलब है तत्काल जरूरतों के लिए. एक भाग आप समाज के लिए इस्तेमाल करो. एक भाग जो आप बचाते हो, उसे बाद में अपने मित्रों, परिवार या अपने वंशजों को दे दो.

आप में धन कमाने की कामना होनी चाहिए. धन बनाना गलत नहीं है. धन कमाओ, परंतु धन के लिए संतुलित रवैया होना चाहिए. धन ही जीवन में सब कुछ नहीं होना चाहिए. यह आपको बनाये रखने के लिए और शरीर को आराम देने के लिए होना चाहिए. यह तो केवल आध्यात्मिकता ही है, जिससे पूर्ण विश्राम मिलता है. और यदि मानसिक और अाध्यात्मिक आराम होगा, जब आप ईश्वर से जुड़े हों, तो आप धन के बारे में सोचते भी नहीं. चीजें अपने आप आती हैं.

-श्री श्री रविशंकर

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