भगवान की संपत्ति

Published at :02 Aug 2016 5:35 AM (IST)
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भगवान की संपत्ति

यह अवधारणा कि वास्तविकता में संसार ही केवल एक सत्य है, यह हमारे चेतना को सोचने की इजाजत देता है. इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि जो हम चाहते हैं, वह जब तक हम पाते नहीं, तब तक हम क्या करते हैं. जब हम इस बात पर विश्वास करते हैं कि संसार ही […]

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यह अवधारणा कि वास्तविकता में संसार ही केवल एक सत्य है, यह हमारे चेतना को सोचने की इजाजत देता है. इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि जो हम चाहते हैं, वह जब तक हम पाते नहीं, तब तक हम क्या करते हैं. जब हम इस बात पर विश्वास करते हैं कि संसार ही केवल एक वास्तविकता है, तो हमारे तथाकथित नैतिक सिद्धांत कमजोर हो जाते हैं. उसके बाद हम फिर लालच, ईर्ष्या, वासना, क्रोध, अहंकार और भ्रम जैसी भावनाओं से पीड़ित हो जाते हैं. जबकि संसार कुछ नहीं, बल्कि एक भ्रम है. वास्तविकता में इस संसार का कोई अस्तित्व नहीं है. सच वास्तविक है, पर पूरा संसार एक भ्रम है.

जो ऐसा सोचते हैं उनके लिए मृत्यु के बाद मुक्ति के बारे में सोचने के लिए यह एक अच्छी प्रेरणा है, क्योंकि अगर दुनिया ही एक भ्रम है, तो यह बात मायने नहीं रखती कि हम जीते हैं या मरते हैं. बस यह मायने रखता है कि जितनी जल्दी संभव हो, हमें इस संसार से मुक्ति मिल जाये. अगर हम अपने चारों ओर के पर्यावरण के संकट को देखें, तो ‘यह सिद्धांत कि दुनिया एक भ्रम है’ का महत्व होगा. हमें किसी और दृष्टिकोण से देखना चहिए जैसे कि किसे इस संकट की परवाह है, क्योंकि इसका तो अस्तित्व ही नहीं है.

अगर यह दुनिया भ्रम है, तो कोई भी पानी और हवा को गंदा करे, कोई फर्क नहीं पड़ता. हमारा कर्म केवल मुक्ति पाने के लिए है. परम सत्य यह है कि जो भी अस्तित्व में है, उन सबका स्रोत है. यह संपूर्ण और उत्तम है और परम सत्य से उत्पन्न होनेवाली हरेक वस्तु संपूर्ण और उत्तम है. कृष्ण भगवत गीता में कहते हैं कि, ‘सर्वलोका महेश्वरम्’, जिसका अर्थ है- ‘संसार भगवान की संपत्ति है.’

अगर हम इस दृष्टिकोण से देखते हैं, तो हम लालच, ईर्ष्या, वासना और क्रोध से मुक्त हो जाते हैं, क्योंकि हम समझ जाते हैं कि हम स्वामी नहीं, बल्कि रखवाले हैं. अगर हम किसी को अच्छा करते देखते हैं, तो हम उसके अच्छे भाग्य का जश्न मनाते हैं, क्योंकि हम मानते हैं कि हम सब भाई और बहन हैं. हम सब भगवान की संतान और केवल आत्मा हैं. शोषण करना स्वार्थी और अहंकारी दिल के रोग का लक्षण है. करुणा उस व्यक्ति का लक्षण है, जिसने वास्तविकता में तृप्ति पा ली है.- राधानाथ स्वामी

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