नग्न होकर स्नान करने से लगता है दोष

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 21 Sep 2018 11:16 AM

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जमशेदपुर : श्री राजस्थान शिव मंदिर, जुगसलाई में गुरुवार को गोवर्धन प्रसंग और रुक्मिणी मंगल की कथा सुनायी गयी. कथावाचक आचार्य मयंक मनीष ने कहा कि नग्न स्नान करने से व्यक्ति लौकिक और पारलौकिक दोनों जगह दोष का अधिकारी बनता है. स्त्रियों को खुले बाल में विचरण नहीं करना चाहिए. धर्म के मार्ग पर चलना […]

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जमशेदपुर : श्री राजस्थान शिव मंदिर, जुगसलाई में गुरुवार को गोवर्धन प्रसंग और रुक्मिणी मंगल की कथा सुनायी गयी. कथावाचक आचार्य मयंक मनीष ने कहा कि नग्न स्नान करने से व्यक्ति लौकिक और पारलौकिक दोनों जगह दोष का अधिकारी बनता है. स्त्रियों को खुले बाल में विचरण नहीं करना चाहिए. धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए. उसे कुचल कर नहीं चलना चाहिए.

दोष रहित होनी चाहिए भक्ति : कथावाचक ने कहा कि गिरिराज की शरण में जाने से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष सभी की प्राप्ति हो जाती है. दोष रहित भक्ति को प्रभु तुरंत स्वीकार करते हैं, लेकिन जिस भक्ति में दोष हो वह भगवान को कभी अच्छा नहीं लगता. भक्ति मार्ग का प्रथम सोपान ही है दोष से दूर रहना. श्रीकृष्ण जगतगुरु की उपाधि से विभूषित हैं. और गुरु को क्या करना चाहिए? जगतगुरु ने अपने दायित्व को लीलाओं के जरिये दिखाया.

श्रीकृष्ण ने जीवन दर्शन कराया : उन्होंने कहा कि गोवर्धन शब्द की विवेचना विद्वतजन अलग-अलग करते हैं. कुछ लोग इसका अर्थ, जहां इंद्रियां बलवती और संतुष्ट हों वो गोवर्धन है से लगाते हैं. कई इसका मतलब गौ वंश का संरक्षण और सेवा भाव से आदर करना समझते हैं. कथावाचक ने समझाया कि भगवान श्रीकृष्ण ने मनुष्य को जीवन दर्शन कराया. भक्ति प्रदान की, योग सिखाया, माया और योगमाया का भेद बताया. अपनी लीलाओं में शामिल कर मोक्ष का अधिकारी बनाया. लेकिन मर्यादा कहीं भी नहीं टूटी. उन्होंने रुक्मिणी मंगल प्रसंग सुनाया. कहा कि राजधर्म में भी परमात्मा मित्रता के धर्म को निभाते हैं. वे प्रेम धर्म को जानते हैं. कथावाचक ने कहा कि राम राज में दूध-भात प्रभु को प्रिय था. कृष्ण राज में दही भात या कढ़ी भात प्रभु को प्रिय रहे. इसे सफल बनाने में मंदिर कमेटी के सभी सदस्यों का योगदान रहा.

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