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इमरजेंसी के बाद चुनाव हार कर कैसे रहती थीं इंदिरा? जानें गांधी परिवार की बहुओं से कैसे रहे रिश्ते

Updated at : 19 Nov 2024 1:59 AM (IST)
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Family of Indira Gandhi

इंदिरा गांधी का परिवार

Indira Gandhi : भारत की एकमात्र महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का 19 नवंबर को जन्मदिन है. उन्हें उनके जीवनकाल में कई नामों से पुकारा गया, जिनमें गूंगी गुड़िया और आयरन लेडी बहुत ही विरोधाभासी और कई सवाल खड़े करने वाला है? आखिर कैसा था इंदिरा गांधी का व्यक्तित्व और अपने रिश्तों को उन्होंने कैसे जीया?

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Indira Gandhi : इंदिरा गांधी का जन्म 19 नवंबर 1917 को तब हुआ था, जब देश आजाद नहीं था. उनके पिता और एक तरह से पूरा परिवार ही स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल था. परिणाम यह हुआ कि इंदिरा का बचपन आम बच्चों की तरह नहीं बीता. वे बेहद अकेली और गुमसुम रहती थीं, पिता अकसर जेल में रहते और मां भी सामाजिक कार्यों में जुटी रहती थीं.

1966 में जब इंदिरा प्रधानमंत्री बनीं थीं, तो उनकी छवि काफी कम बोलने वाली इंदिरा की थी. ऐसे में जब पोखरण1 हुआ तो उनकी छवि एकदम से बदल गई. उनकी गूंगी लड़की की उपाधि आयरन लेडी में बदल गई. उसके बाद जब 1975 में इंदिरा ने देश में इमरजेंसी लगाई तो सहसा लोगों को विश्वास ही नहीं हुआ था कि यह भी सच हो सकता है. इमरजेंसी के बाद इंदिरा गांधी की छवि तानाशाह वाली बन गई. इंदिरा के स्वभाव और व्यक्तित्व पर काफी कुछ लिखा गया है, लेकिन उनके घर वाले उनके बारे में क्या सोचते हैं या सोचते थे यह जानने की इच्छा आम जनता को रहती है, क्योंकि वे इन बातों से दूर रहते हैं. इंदिरा के दोनों बेटों की पत्नी यानी दोनों बहुओं ने उनके व्यक्तित्व के बारे में कई बार चर्चा की है.

इंदिरा काफी सहज, मिलनसार और सीख देने वाली थीं

खुशनुमा माहौल में साथ बहू सोनिया और सास इंदिरा

सोनिया गांधी और मेनका गांधी ने कई इंटरव्यू में यह बात कही है -इंदिरा गांधी ने उन्हें मां की तरह संभाला और प्यार दिया. सोनिया गांधी ने इंडिया टुडे और धर्मयुग को दिए इंटरव्यू में यह बताया था कि जब वो पहली बार इंदिरा से मिली थीं तो काफी डरी हुईं थीं. इंदिरा गांधी ने उन्हें समझाया कि डरने की जरूरत नहीं है और उनका हौसला बढ़ाया.

मेनका गांधी ने सिम्मी ग्रेवाल को दिए इंटरव्यू में बताया है- जब मेरी और इंदिरा जी की मुलाकात हुई, तो मुझे पहले ये पता नहीं था कि वो प्रधानमंत्री हैं. जब पता चला संजय की मां प्रधानमंत्री हैं तो मेरी हालत खराब थी. लेकिन वो बहुत प्यार से मिलीं और सबकुछ ठीक हो गया. वे मुझे खाना बनाना भी सिखाती थीं और वो सबकुछ जो जानना जरूरी था.

संजय गांधी सुझाव देते थे, लेकिन फैसला इंदिरा गांधी का होता था

मेनका गांधी ने इंटरव्यू में बताया है कि संजय गांधी के बारे में मीडिया में कई ऐसी बातें चलती हैं, जो बिलकुल बकवास और घटिया हैं. इमरजेंसी के दौरान भी उनकी भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है. वे सुझाव देते थे लेकिन अंतिम फैसला इंदिरा गांधी का होता था. वे एक अच्छी प्रशासक थीं और जानती थीं कि क्या सही है और क्या गलत. संजय गांधी के बारे में यह कहा जाता है कि उन्होंने अपनी मां को थप्पड़ मारा. यह बेहद घटिया बात है. एक मां और बेटे के बीच किस तरह का रिश्ता होता है, यह मैं जानती हूं. मैं भी एक बेटे की मां हूं.

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चुनाव में हार के बाद टूट गईं थीं इंदिरा

इमरजेंसी के बाद जब चुनाव हुआ तो संजय और इंदिरा दोनों चुनाव हार गए, इस हार से इंदिरा टूट गई थीं. वे गुमसुम रहती थीं क्योंकि जब सत्ता नहीं थी तो लोग दूर हो गए थे. वो घर पर रहती थीं, सन्नाटा पसरा रहता था. कोई नौकर और कुक भी नहीं था. परिवार के लोगों ने उस कठिन वक्त को प्यार से काटा, यह इंटरव्यू में मेनका बताती हैं.

संजय की मौत से पहले इंदिरा ने मेनका को कमरे में बंद कर दिया था

मेनका गांधी ने एक इंटरव्यू में बताया है कि संजय को प्लेन उड़ाने का शौक था और जिस दिन उनकी मौत हुई उससे एक दिन पहले वे उसी प्लेन में उन्हें लेकर गए थे और उन्हें बहुत अजीब महसूस हुआ. वो बहुत रोईं और इंदिरा गांधी से यह कहा कि उन्हें यह प्लेन ना उड़ाने का आदेश दें. इंदिरा ने संजय को मना भी किया, लेकिन अगले ही दिन सुबह आठ बजे की करीब मेनका को उठाकर यह कहा गया कि अस्पताल जाना है संजय का एक्सीडेंट हुआ है. एंबुलेंस में संजय को लाया गया और तब इंदिरा गांधी ने उनसे कहा कि वो जीवित हैं और मेनका को एक कमरे में बंद कर दिया. उस कमरे में वो प्रार्थना करती रहीं और कुछ घंटे बाद इंदिरा ने दरवाजा खोलकर बताया कि संजय नहीं रहे. संजय और इंदिरा का रिश्ता बहुत खास था.

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Rajneesh Anand

लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

राजनीति,सामाजिक, इतिहास, खेल और महिला संबंधी विषयों पर गहन लेखन किया है. तथ्यपरक रिपोर्टिंग और विश्लेषणात्मक लेखन में रुचि. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक. IM4Change, झारखंड सरकार तथा सेव द चिल्ड्रन के फेलो के रूप में कार्य किया है. पत्रकारिता के प्रति जुनून है. प्रिंट एवं डिजिटल मीडिया में 20 वर्षों से अधिक का अनुभव.

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