120 Bahadur : 3 महीनों तक बर्फ की चादर में जमी रही थी रेजांग ला युद्ध के रणबांकुरों की कहानी, अब क्यों हो रहा विरोध?

Edited by Rajneesh Anand
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रेजांग ला युद्ध के रणबांकुरों की कहानी

120 Bahadur : तीन महीनों तक बर्फ की चादर से ढंके बंकर में 120 बहादुरों की कहानी दफन रही. जब बर्फ पिघलनी शुरू हुई तो सेना के अधिकारियों के साथ-साथ आम लोगों को भी पता चला कि रेजांग ला के युद्ध में किस तरह 13 कुमाऊं रेजीमेंट के 120 सैनिकों ने अपनी जान की परवाह ना करते हुए चीनी सेना के हर तरह से मजबूत सैनिकों को रोका और उन्हें मारकर भारत माता की रक्षा की. इन सैनिकों ने चीनी मशीनगनों का मुकाबला अपने जोश और मजबूत इरादों से किया. उनके पास गोला-बारूद खत्म थे, फिर भी एक-एक ने दस-दस चीनियों को मारा. भारतीय दावे के अनुसार 1300 चीनी सैनिक मारे गए थे, जबकि चीन का कहना था कि उसके 500 सैनिक मारे गए जो 1962 के युद्ध में चीनी को सबसे बड़ी क्षति थी. रेजांग ला का युद्ध और उनके रणबांकुरे एक बार फिर चर्चा में हैं.

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120 Bahadur : फरहान अख्तर की आने वाली फिल्म 120 बहादुर इन दिनों चर्चा में है. इसकी वजह यह है कि अगले महीने रेजांग ला दर्रे पर लड़ी गई भारतीयों सैनिकों की अनोखी वीरगाथा की वर्षगांठ है और इसी मौके पर फरहान अख्तर की वो फिल्म भी रिलीज हो रही है, जिसमें इस युद्ध के गौरव को दर्शाया गया है. फरहान अख्तर ने इस फिल्म में उस युद्ध के कमांडर और कुमाऊं रेजीमेंट के मेजर शैतान सिंह का रोल निभाया है.

सच्ची घटना पर आधारित इस फिल्म को अहीर जाति के विरोध का सामना भी करना पड़ रहा है. इसकी वजह यह है कि अहीर जाति के लोगों का कहना है कि रेजांग ला के युद्ध में अकेले शैतान सिंह ने अपना योगदान नहीं दिया था, बल्कि उनके साथ 120 बहादुर भी लड़े थे, जो अहीर जाति से थे और उनके योगदान को फिल्म में उस तरह नहीं दिखाया गया है, जिस तरह दिखाया जाना चाहिए था. फिल्म का विरोध करने वालों का कहना है कि मूवी में सिर्फ शैतान सिंह की भूमिका को दिखाया गया है, जबकि रेजांग ला के युद्ध में उन सैनिकों की भी अहम भूमिका थी, जो अहीर जाति से आते थे.

अहीर जाति के लोग क्यों कर रहे हैं ‘120 बहादुर’ का विरोध?

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120 बहादुर का विरोध करता अहीर समाज

1962 में चीन ने भारत की सीमा से सटे राज्यों अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख में हमला शुरू कर दिया था. रेजांग ला में 18 नवंबर 1962 को चीन ने हमला किया. चीन की ओर से हमला बहुत बड़ा था. उस इलाके में 13 कुमाऊं रेजिमेंट की चार्ली कंपनी के 120 भारतीय सैनिक ने मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में तैनात थे. शैतान सिंह राजस्थान के रहने वाले थे और उनके साथ जो रेजीमेंट थी उनमें से अधिकांश लोग राजस्थान और हरियाणा के थे और उन्हें बर्फ में लड़ाई का कोई अनुभव नहीं था. इस रेजीमेंट में अधिकांश सैनिक अहीर जाति के थे, जिन्हें यादव के तौर पर आज के समय में ज्यादा जाना जाता है. रेजीमेंट के 120 में से 114 सैनिक इस युद्ध में शहीद हो गए.

चीनी सैनिकों ने जब पहली बार हमला किया, तो उनकी संख्या सीमित थी. मेजर शैतान सिंह ने अपने सीनियर अधिकारियों को वायरलेस पर मैसेज भेजा और उनसे मदद मांगी क्योंकि उन्हें शंका थी कि चीनी सैनिक फिर हमला करेंगे, लेकिन उनतक सहायता पहुंचाना संभव नहीं था. उनके वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा कि अभी सहायता नहीं पहुंचाई जा सकती है, आप चाहें तो पोस्ट को खाली करके वापस लौट जाएं. उस वक्त शैतान सिंह ने अपने रेजीमेंट के सैनिकों से पूछा था कि क्या वे वापस लौटना चाहेंगे? उन्होंने यह भी कहा था कि मैं यहीं शहीद हो जाऊंगा लेकिन वापस नहीं जाऊंगा. उस वक्त उनकी पूरी रेजीमेंट ने पोस्ट पर डटे रहने का फैसला किया था और युद्ध में जाबांजी दिखाते हुए चीनी सैनिकों को आगे बढ़ने से रोका था.

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इस युद्ध में ना सिर्फ शैतान सिंह बल्कि 13 कुमाऊं रेजीमेंट के 114 सैनिक मारे गए थे. अहीर जाति के लोगों का कहना है कि इस फिल्म में उन सैनिकों के योगदान को कम करके दिखाया गया है और एक तरह से इसे सिर्फ शैतान सिंह के बलिदान की कहानी बना दिया गया है, जो उन बहादुर सैनिकों के साथ अन्याय है, जिन्होंने रेजांग ला के युद्ध में अदम्य साहस का परिचय दिया था. इसके साथ ही अहीर समाज यह चाहता है कि मूवी का नाम भी अहीर जाति के नाम पर रखा जाए. इसी वजह से अहीर या यादव जाति के लोग फरहान अख्तर की फिल्म 120 बहादुर का विरोध कर रहे हैं.

रेजांग ला के युद्ध में क्या हुआ था?

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रेजांग ला युद्ध

रेजांग ला का युद्ध 18 नवंबर की मध्यरात्रि से शुरू हुआ था और 19 तारीख की सुबह तक चला था और 20 नवंबर को चीन ने अपनी ओर से सीज फायर की घोषणा कर दी थी. चीन ने 20 अक्टूबर 1962 को भारत पर हमला शुरू किया था, उसका इरादा पूरे लद्दाख पर कब्जा करने का था और इसी उद्देश्य से चीनी सैनिकों ने रेजांग ला दर्रे पर हमला किया था. उस वक्त चीनी सैनिकों को जवाब देने के मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में 13 कुमांऊ रेजीमेंट के 120 सैनिक रेजांग ला के पोस्ट में मौजूद थे. पहले हमले में चीनी सैनिकों ने याक के शरीर पर लालटेन बांधकर उन्हें भेजा था. मेजर शैतान सिंह ने हमले का आदेश दिया, बाद में उन्हें चीनी सैनिकों की चाल का पता चला कि वे भारतीय सैनिकों के हथियार और गोला बारुद को खत्म करना चाहते हैं.

शैतान सिंह ने उसी दौरान अपने वरिष्ठ अधिकारियों से मदद मांगी थी, जो उन्हें मिल नहीं पाई क्योंकि भारतीय सेना उस वक्त बहुत मजबूत नहीं थी. सेना के पास उन्नत हथियार नहीं थे, ना ही उनके पास बर्फ में पहनने के लिए जूते और कपड़े ही थे. बावजूद इसके सैनिकों ने पोस्ट खाली नहीं किया और अपने जोश से वहां जमे रहे. चीनी सैनिकों ने किस्तों में हमला किया, उनके पास मशीनगन था, जबकि भारतीय सैनिक राइफल से युद्ध लड़ रहे थे, वे संख्या में 3000 थे और भारतीय 120. बावजूद इसके मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में 120 जांबाजों ने जान लड़ा दिया और 1300 से अधिक चीनी सैनिकों को मारा. उनके हमलों को नाकाम करते हुए वे तबतक लड़े जबतक उनके शरीर में जान रही.

मेजर शैतान सिंह ने तो दोनों हाथ जख्मी होने के बाद अपने पैरों से गन चलाया और दुश्मनों को मारा. मेजर शैतान सिंह को हमले से बचाकर रखने वाले सैनिक ने उनकी लाश को बर्फ में दबा दिया था.इस युद्ध के लड़ाकों ने हथियार और गोली-बारूद समाप्त हो जाने के बाद अपने हाथों और मेजर ने उससे कहा था तुम चले जाओ और जाकर सबको बताओ कि 13 कुमाऊं रेजीमेंट के लड़ाकों ने कैसे युद्ध लड़ा था. इस युद्ध में कुछ को चीनी सैनिकों ने बंदी बना लिया था और कुछ वापस लौट गए थे, उन्होंने युद्ध के बारे में अपने सीनियर्स को बताया लेकिन किसी ने उनकी बातों को माना नहीं, क्योंकि बर्फ जम जाने की वजह से रेजांग ला में सबकुछ उसमें दफन हो गया था.

रेजांग ला की लड़ाई का सच कब आया सामने?

रेजांग ला के युद्ध का सच फरवरी 1963 में सामने आया, जब बर्फ पिघलनी शुरू हुई. बर्फ के पिघलने पर एक चरवाहा रेजांग ला के युद्ध क्षेत्र में पहुंचा, तो उसे बंकर जैसा कुछ दिखा. उसने अंदर जाकर देखा तो उसकी आंखें फटी रह गईं, क्योंकि वहां लाशों का ढेर लगा था. उसने तुरंत नीचे जाकर भारतीय सेना के अधिकारियों को इसकी जानकारी दी. जब सेना के अधिकारियों ने क्षेत्र का दौरा किया, तो उन्हें सच पता चला और रेजांग ला में सैनिकों ने जो वीरता दिखाई थी, उसका पता चला.मेजर शैतान सिंह का शव भी उसी दौरान मिला और शहीद होने के तीन महीने बाद ही उनका भी अंतिम संस्कार हुआ था.

रेजांग ला कहां है और कब यहां चीन ने हमला किया था?

रेजांग ला (Rezang La) लद्दाख के चुशूल सेक्टर में स्थित एक ऊंचा पहाड़ी दर्रा है, जो भारत और चीन की सीमा पर लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) के करीब है. 1962 के भारत-चीन युद्ध के वक्त 18 नवंबर की रात को चीन ने यहां हमला कर दिया था.

रेजांग ला की पोस्ट में उस वक्त कौन तैनात थे?

रेजांग ला की पोस्ट में उस वक्त मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में 13 कुमांऊ रेजीमेंट की चार्ली कंपनी तैनात थी, जिनकी संख्या 120 थी.

रेजांग ला के युद्ध में कितने भारतीय शहीद हुए थे?

रेजांग ला के युद्ध में 114 भारतीय सैनिक शहीद हुए थे, जबकि उन्होंने 1300 चीनी सैनिकों को मारा था.

क्या 120 बहादुर फिल्म सच्ची घटना पर आधारित है?

हां 120 बहादुर फिल्म सच्ची घटना पर आधारित है. यह युद्ध 1962 में लड़ा गया था.

यह फिल्म किसकी कहानी बताता है?

यह फिल्म भारतीय सेना के चार्लाी कंपनी के सैनिकों की वीरता की कहानी बताता है, जो कुमाऊं रेजीमेंट के थे.

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Rajneesh Anand

लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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