सही कदम है आइडीबीआइ के विनिवेश को रोकना

आईडीबीआई बैंक
IDBI : भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को निजी संस्थाओं को बेचने का कोई इतिहास नहीं रहा है. फिर भी, अलग-अलग बैंकों के विलय के जरिये बैंकों की कुल संख्या में निश्चित रूप से कमी आयी है. जहां कुछ समय पहले तक सार्वजनिक क्षेत्र के 27 बैंक थे, वहीं अब उनकी संख्या घटकर मात्र 12 रह गयी है.
IDBI Bank : वर्ष 1991 में नयी आर्थिक नीति की शुरुआत के बाद से, जिसमें तीन मुख्य आयाम शामिल थे- उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण- बैंकों के निजीकरण का मुद्दा हमेशा ही एक विवादास्पद विषय रहा है. सार्वजनिक क्षेत्र में विनिवेश दो तरीकों से होता है- रणनीतिक बिक्री से और बाजार आधारित शेयर बिक्री से. रणनीतिक बिक्री में अक्सर मूल्यांकन से जुड़ी समस्याएं, बोली लगाने वालों की सीमित संख्या और पारदर्शिता की कमी के आरोप सामने आते हैं. इसके विपरीत, शेयर बाजार के जरिये किया जाने वाला विनिवेश अधिक पारदर्शी होता है, इसमें अधिक लोगों की भागीदारी होती है और इससे शेयरों का सही मूल्य तय हो पाता है.
भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को निजी संस्थाओं को बेचने का कोई इतिहास नहीं रहा है. फिर भी, अलग-अलग बैंकों के विलय के जरिये बैंकों की कुल संख्या में निश्चित रूप से कमी आयी है. जहां कुछ समय पहले तक सार्वजनिक क्षेत्र के 27 बैंक थे, वहीं अब उनकी संख्या घटकर मात्र 12 रह गयी है. इसके अतिरिक्त, एक और बैंक है, जिसका नाम इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया (आइडीबीआइ) है, जिसमें केंद्र सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम की शेयरहोल्डिंग मिलाकर सरकार का कुल नियंत्रण लगभग 95 प्रतिशत हो जाता है. विशेष रूप से आइडीबीआइ बैंक के मामले में, पिछले कुछ वर्षों से सरकार रणनीतिक विनिवेश की दिशा में कदम बढ़ा रही थी, और इस संबंध में पहले प्रस्ताव आमंत्रित किये गये थे.
हाल की रिपोर्टों के अनुसार, सरकार ने अब इस बैंक के रणनीतिक विनिवेश को रोक दिया है. सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निजीकरण को लेकर महत्वपूर्ण तर्क दिये जाते रहे हैं. पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निजीकरण के आलोचकों के, खासकर आइडीबीआइ के मामले में, अपने मजबूत तर्क हैं. आइडीबीआइ बैंक, जो कुछ वर्ष पहले एक मुश्किल दौर से गुजर रहा था, अब घाटे से उबर चुका है और एक मुनाफा कमाने वाली संस्था बन गया है.
हालांकि, इसके निजीकरण के समर्थकों का पहला तर्क यह है कि आइडीबीआइ के निजीकरण से बाजार अनुशासन को बढ़ावा मिलेगा और पूंजी का कुशल आवंटन होगा. दूसरा, यह सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को नौकरशाही की देरी और राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करेगा. इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज होगी. तीसरा, निजीकरण से परिसंपत्ति की गुणवत्ता और एनपीए के प्रबंधन में सुधार हो सकता है. चौथा, निजीकरण बैंकिंग सेवाओं में नवाचार, ग्राहक केंद्रित उत्पादों और डिजिटल बदलाव के जरिये प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ा सकता है. पांचवां, निजीकरण प्रबंधन बोर्ड की अधिक मजबूत जवाबदेही, पारदर्शिता और बेहतर अनुपालन मानकों के जरिये कॉरपोरेट प्रशासन में सुधार कर सकता है. छठा, भारत सरकार ने आइडीबीआइ बैंक को चालू रखने के लिए उसमें बार-बार पूंजी डाली है. निजीकरण करदाताओं के पैसे पर बार-बार होने वाले पूंजीकरण को कम करने में मदद कर सकता है.
भारत और दुनियाभर में निजी क्षेत्र के बैंकों के दिवालिया होने का एक इतिहास रहा है. लेकिन, ऐसा एक भी मामला नहीं है जहां कोई सार्वजनिक क्षेत्र का बैंक दिवालिया हुआ हो और जमाकर्ताओं का पैसा डूब गया हो. दूसरी बात, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर लोगों का भरोसा आम जनता को अपनी बचत इन बैंकों में जमा करने के लिए प्रोत्साहित करता है. जब 1969 में पहली बार 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया और 1980 में छह और बैंकों का, तो सरकार का मुख्य उद्देश्य समावेशी विकास को बढ़ावा देना था. यह देखते हुए कि कृषि, छोटे पैमाने के उद्योग, शिक्षा, निर्यात को बढ़ावा देना आदि प्राथमिक महत्व के क्षेत्र हैं, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के जरिये इन ‘प्राथमिक क्षेत्रों’ के लिए ऋण की उपलब्धता सुनिश्चित की गयी. आरबीआइ के तमाम नियमों, उप नियमों और निर्देशों के बावजूद, निजी क्षेत्र के बैंक उस तरह से वित्तीय समावेशन का काम नहीं कर पा रहे हैं, जैसा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक कर रहे हैं.
नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद, प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत ‘जीरो बैलेंस’ वाले जन धन खाते खोले गये, जिससे वित्तीय समावेशन सुनिश्चित हुआ. अब तक ऐसे 51 करोड़ जन धन खाते खोले जा चुके हैं, जिनमें से केवल 1.4 करोड़ खाते ही निजी बैंकों ने खोले हैं. यह तथ्य वित्तीय समावेशन में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की भूमिका के बारे में बहुत कुछ कहता है. दीनदयाल अंत्योदय योजना के तहत छह करोड़ महिलाओं को दिये जाने वाले 90 प्रतिशत आजीविका ऋण सार्वजनिक क्षेत्र के और उनके द्वारा प्रायोजित क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों द्वारा ही उपलब्ध कराये जा रहे हैं.
इसी तरह, रेहड़ी-पटरी वालों को ऋण देने का काम भी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा ही किया जाता है. ऐसी स्थिति में निजी क्षेत्र के बैंकों का मुनाफा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से अधिक होता है. इसलिए यह कहना कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का निजीकरण कर हम बैंकों के लाभ बढ़ा सकते हैं, तो यह काम वित्तीय समावेशन की लागत पर होगा. इसलिए आइडीबीआइ बैंक का रणनीतिक विनिवेश, उसे निजी हाथों में सौंपने से रोका जाना एक सही नीति है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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