डूबते शहरों को बचाने के लिए तैयारी जरूरी

New Delhi: A motorcyclist wades through a flooded road near the Red Fort as the swollen Yamuna river floods low-lying areas, in New Delhi, Thursday, July 13, 2023. The torrential Yamuna in Delhi swelled to a staggering 208.48 metres Thursday morning, inundating nearby streets and public and private infrastructure, and causing immense hardships to people living in close proximity to the river. (PTI Photo/Kamal Kishore) (PTI07_13_2023_000130B)
रिपोर्ट में कहा गया था कि जलवायु परिवर्तन के कारण बरसात का स्वरूप बदल रहा है. इससे बाढ़ और सुखाड़, दोनों की मार और तगड़ी होगी.
दिल्ली में यमुना अपने सौ साल पुराने ठिकाने को तलाशती आ गयी तो हो-हल्ला मच गया कि रिकार्ड तोड़ बारिश से ऐसे हालात बने. बीते एक दशक के दौरान मुंबई, हैदराबाद, चेन्नई, बेंगलुरु सहित कई राजधानियां और विकास के मानक कहे जाने वाले शहर ऐसे ही डूबते रहे. हर बार यही जुमला दोहराया गया कि बेशुमार बरसात से हालात बिगड़े. लेकिन, वास्तविकता यह है कि भारत जलवायु परिवर्तन के खतरे और उससे बचाव के बारे में गंभीर है ही नहीं.
बरसात को कोसने और सारा साल प्यासे रहने का रोग अब महानगरों में ही नहीं, दूसरे शहरों में भी आम है. चूंकि बरसात के दिन कम हो रहे हैं, और साल में बमुश्किल 45 दिन बारिश होती है, इसलिए लोगों का ध्यान बाकी के 325 दिन के सुकून पर ज्यादा रहता है. लेकिन, हमारा देश शहरीकरण की ओर अग्रसर है, और बदलते मौसम का मिजाज अब हमारी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है.
आइआइटी, पटना के एक शोध में सामने आया है कि नदियों के किनारे बसे लगभग सभी शहर अब थोड़ी बरसात में ही दम तोड़ देते हैं. दिक्कत केवल बाढ़ की ही नहीं है. इन शहरों की मिट्टी में पानी सोखने की क्षमता भी घटती जा रही है. शहरों में अब गलियों में भी सीमेंट पोत कर आरसीसी सड़कें बनाने का चलन बढ़ गया है, और औसतन 20 फीसदी जगह ही कच्ची बची है जो पानी सोख सकती है. लगातार कमजोर हो रही जमीन पर खड़े कंक्रीट के जंगल किसी छोटे से भूकंप से भी ढह सकते हैं.
याद करें, दिल्ली में यमुना किनारे वाली कई कॉलोनियों के बेसमेंट में अप्रत्याशित पानी आने और ऐसी कुछ इमारतों के गिर जाने की घटनाएं भी हुई हैं. दिल्ली में तो यमुना के कछार पर कब्जा कर लगभग 35 लाख की आबादी बस गयी है. आज बस-अड्डे, ओखला या आइटीओ पर जहां पानी भरा है, वे सभी कुछ दशक पहले तक यमुना की लहरों से भरे मुस्कुराते थे.
तीन साल पहले, केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय में तैयार पहली जलवायु परिवर्तन मूल्यांकन रिपोर्ट में साफ बताया गया था कि भारतीय शहरों में पर्यावरण के प्रति लापरवाही से बचा नहीं गया तो हालात नियंत्रण के बाहर होंगे. रिपोर्ट किसी लाल फीते में बंधी रही और राजधानी दिल्ली में चेतावनी साकार हो गयी. अभी तो बरसात ने यह दिन दिखाये हैं, वह दिन दूर नहीं जब महानगरों में गर्मी का तापमान असहनीय स्तर पर होगा.
रिपोर्ट में कहा गया था कि जलवायु परिवर्तन के कारण बरसात का स्वरूप बदल रहा है. इससे बाढ़ और सुखाड़, दोनों की मार और तगड़ी होगी. साथ ही, सतही और भू-जल का गणित गड़बड़ायेगा जो देश की जल सुरक्षा के लिए खतरा है. यह दुखद है कि हमारे नीति-निर्धारक अभी भी अनुभवों से सीख नहीं रहे हैं. आंध्र प्रदेश जैसे राज्य की नयी निर्माणाधीन राजधानी अमरावती, कृष्णा नदी के जलग्रहण क्षेत्र में बनायी जा रही है.
कहा जा रहा है कि यह पूरी तरह नदी के तट पर बसी होगी. लेकिन, यह नहीं बताया जा रहा कि इसके लिए नदी के मार्ग को संकरा कर जमीन उगाही जा रही है, जिसके अति बरसात में डूबने और धंसने तक की पूरी संभावना है. शहरीकरण और बाढ़ की दिक्कतों पर विचार करते समय जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक त्रासदी को ध्यान में रखना जरूरी है.
वातावरण में बढ़ रहे कार्बन और ग्रीन हाउस गैस प्रभावों के कारण ऋतुओं का चक्र गड़बड़ा रहा है. इसी की परिणति है कि गर्मी में भयंकर गर्मी होती है, तो ठंड के दिनों में कभी बेतहाशा ठंड, तो कभी गर्मी का अहसास. वहीं, बरसात में कभी सुखाड़ होता है, तो कभी अचानक आठ से दस सेंटीमीटर पानी बरस जाता है.
संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि धरती का तापमान ऐसे ही बढ़ा तो समुद्र का जल स्तर बढ़ेगा, और कई शहरों के डूबने का खतरा होगा. यह खतरा महज समुद्र तटों पर बसे शहरों पर ही नहीं, बल्कि उन शहरों पर भी होगा, जो ऐसी नदियों के किनारे हैं, जिनका पानी सीधे समुद्र में गिरता है. जलवायु परिवर्तन के खतरों के प्रति सचेत करते हुए इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च इन एग्रोफॉरेस्ट्री के निदेशक डा कुलूस टोपर ने भी अपनी रिपोर्ट में बताया है कि आने वाले समय में जलवायु परिवर्तन के भीषणतम उदाहरण नजर आएंगे, जो कृषि उत्पादकता पर चोट, जल दबाव, बाढ़, चक्रवात व सूखे जैसी गंभीर दशाओं को जन्म देंगे.
जाहिर है इसका दुष्परिणाम गांवों से लोगों का पलायन होगा, और इसका दबाव शहरों पर ही पड़ेगा. ऐसे में यह तय है कि आने वाले दिन शहरों के लिए सहज नहीं है. हालांकि, शहरीकरण को रोकना मुश्किल है. लेकिन, इसके दुष्प्रभावों को नियंत्रित रखने के प्रयास तो किये ही जा सकते हैं. जैसे, पॉलीथिन पर पूरी पाबंदी हो, शहरों में खाली और कच्ची जगह को बचाया जाए, तालाब-पोखर-नदी जैसे प्राकृतिक जलाशयों को उनके मूल स्वरूप में रखा जाए, तथा उसके जलग्रहण क्षेत्र को किसी भी किस्म के निर्माण से मुक्त रखा जाए. साथ ही, पेड़ों के महत्व को भी समझना होगा, जो गर्मी को नियंत्रित करने के साथ बरसात के पानी में जमीन के कटाव को भी रोकते हैं.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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