मिलन युद्धाभ्यास: भारत की नौसैना शक्ति का प्रदर्शन

मिलन युद्धाभ्यास
Exercise-Milan : ऐसे युद्धाभ्यासों की शृंखला में जुड़ने वाला अब तक का सबसे बड़ा अभ्यास है 15 फरवरी से 25 फरवरी तक विशाखापट्टनम में आयोजित बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास 'मिलन.' इस विशाल अभ्यास में शामिल 74 देशों की नौसेनाओं के 84 युद्धपोतों में भारतीय विमानवाहक पोत विक्रांत और पनडुब्बियों को मिलाकर 19 भारतीय नौसेनिक पोत थे.
Exercise-Milan : मध्य युग से आज तक सैन्य और आर्थिक रूप से शक्तिशाली देश अपने साम्राज्य का विस्तार करने के लिए समुद्र की लहरों पर एकाधिपत्य जमाने का प्रयत्न करते आये हैं. हालांकि, साम्राज्यवाद का अब अंत हो चुका है, पर आज भी वैश्विक अर्थव्यवस्था सुदूर देशों के बीच फैले महासागरों में निरापद वाणिज्य पर टिकी हुई है. सुदूर दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला से भारत में खनिज, तेल का आयात या वियतनाम से अमेरिकी नागरिकों के लिए वस्त्र-परिधान का निर्यात, आज की अर्थव्यवस्था के ये दो छोटे-से नमूने सिद्ध करते हैं कि विश्व के सागर-महासागर दुनिया के समस्त देशों के साझा संसाधन और साझा पूंजी के रूप में देखे जाने चाहिए.
भारत मानता है कि इक्कीसवीं सदी की चुनौतियों का समाधान एकाकी नहीं, सामूहिक प्रयासों में निहित है. सुरक्षित, मुक्त और संतुलित समुद्री क्षेत्र को वैश्विक शांति और समृद्धि की कुंजी मानकर भारत विभिन्न देशों के साथ समय-समय पर सैन्य अभ्यास आयोजित करता आया है और ऐसे आयोजनों में भाग लेता आया है.
हाल के वर्षों में मित्र देशों के साथ किये गये उल्लेखनीय युद्धाभ्यासों में प्रमुख था, मालाबार नौसैनिक युद्धाभ्यास. वर्ष 1992 में अमेरिका और भारत के संयुक्त प्रयास से आरंभ होने वाले इस अभ्यास में जापान और ऑस्ट्रेलिया भी जुड़कर अब क्वाड नाम से जाने जाते हैं. इसके अतिरिक्त, वरुण और गरुड़-25 (भारत-फ्रांस की नौसेनाओं का), इंद्र (रूस-भारत की तीनों सेनाओं का) और समुद्र शक्ति (भारत-इंडोनेशिया का) कुछ अन्य उदाहरण हैं.
ऐसे युद्धाभ्यासों की शृंखला में जुड़ने वाला अब तक का सबसे बड़ा अभ्यास है 15 फरवरी से 25 फरवरी तक विशाखापट्टनम में आयोजित बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास ‘मिलन.’ इस विशाल अभ्यास में शामिल 74 देशों की नौसेनाओं के 84 युद्धपोतों में भारतीय विमानवाहक पोत विक्रांत और पनडुब्बियों को मिलाकर 19 भारतीय नौसेनिक पोत थे. इन पोतों के कार्यकलाप में कठिन समुद्री युद्धाभ्यास, पनडुब्बी रोधी और हवाई रोधी अभ्यास शामिल हैं. ‘मिलन’ अभ्यास केवल भारत की नौसैन्य क्षमता और शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि इस सम्मिलित युद्धाभ्यास का उद्देश्य भाग लेने वाली नौसेनाओं के बीच आपसी विश्वास, सहयोग और समन्वय बढ़ाना है. एक तरफ इसका तत्काल प्रभाव उन्नत युद्ध कौशल और बेहतर सामरिक क्षमता के रूप में दिखेगा, तो दूसरी तरफ इसका दीर्घकालीन उद्देश्य सामूहिक सुरक्षा, नियम आधारित व्यवस्था और परस्पर विश्वास बढ़ाना है.
भारत आज अमेरिका, चीन और रूस के बाद विश्व की चौथी बड़ी सैन्य शक्ति के रूप में जाना जाता है. उसके साथ अमेरिका, रूस, जापान, ऑस्ट्रेलिया और ईरान जैसे देशों की नौसेनाओं का यह संयुक्त अभ्यास हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के क्षेत्र ही नहीं, पूरे विश्व के समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा बनकर उभरेगा. समुद्री मार्गों की सुरक्षा, सभी देशों की साझा चिंता है. इसी पृष्ठभूमि में यह अभ्यास स्पष्ट करता है कि समुद्री डकैती, तस्करी, आतंकवाद और आपदाओं जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए बहुपक्षीय सहयोग अनिवार्य है. वर्ष 2024 में सोमालिया के जिन समुद्री लुटेरों ने ईरानी वाणिज्य पोतों पर कब्जा कर 19 पाकिस्तानी क्रू को बंदी बना लिया था, उन्हें भारतीय नौसेना पोत ‘सुमित्रा’ ने समर्पण करने के लिए मजबूर किया था. इसी तरह, भारतीय नौसेना पोत ‘कोलकाता’ भी सोमालिया के समुद्री लुटेरों पर भारी पड़ा था. इस तरह भारत, सागर में अंतरराष्ट्रीय सहयोग का वर्षों से प्रशंसनीय प्रदर्शन करता आया है.
यह युद्धाभ्यास भारत की बढ़ती समुद्री भूमिका को भी रेखांकित करता है. एक ओर भारत एक विश्वसनीय सुरक्षा भागीदार के रूप में उभर रहा है, जहां उसकी नौसेना न केवल संचालन क्षमता दिखाती है, बल्कि समन्वय, प्रशिक्षण और मानवीय सहायता के क्षेत्रों में भी नेतृत्व प्रस्तुत करती है. दूसरी ओर है चीन का विस्तारवादी रुझान. दक्षिण चीन सागर में चीन के समुद्री दावों, कृत्रिम द्वीपों और सैन्य उपस्थिति से झांकती आक्रामकता पूरे हिंद-प्रशांत में चिंता का विषय बनी हुई है. एक अरसे से ताइवान के ऊपर कब्जा कर लेने की चीन की अभिलाषा अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण पूरी नहीं हो सकी है. किंतु समय-समय पर चीनी नौसेना और वायुसेना द्वारा ताइवान के इर्द-गिर्द पैदा किये गये आतंक के माहौल ने जापान को भी आशंकित कर रखा है. अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के अनुसार, फिलीपींस से 200 मील दूर तक उसके एक्सटेंडेड इकोनॉमिक जोन में आने वाले क्षेत्र में चीनी नौसेना और तटरक्षक युद्धपोतों ने हाल में ही फिलीपींस की एक जहाज को टक्कर मार क्षतिग्रस्त कर दिया. चीन की इस आक्रामक हरकत के कारण फिलीपींस को अमेरिका के साथ एक सुरक्षा संधि का सहारा लेना पड़ा.
हिंद और प्रशांत महासागर में भी चीन आर्थिक कूटनीति के माध्यम से अपना प्रभाव बढ़ा रहा है. पड़ोसी देशों में इंफ्रास्ट्रक्चर, बंदरगाहों और संपर्क परियोजनाओं के जरिये चीन की रणनीतिक उपस्थिति प्रतिस्पर्धा को जन्म दे रही है. चीन के एक्सिम बैंक ने श्रीलंका में हंबनटोटा बंदरगाह बनाने के लिए भारी कर्ज देकर श्रीलंका को इस बंदरगाह को 99 वर्षों के लिए चीन को लीज पर देने के लिए मजबूर कर दिया. श्रीलंका के आग्रह के बावजूद, कि वह हंबनटोटा को चीनी सैन्य शक्ति के उपयोग में नहीं आने देगा, चीन के मिसाइल ट्रैकिंग और समुद्री शोध करने वाले जहाजों की उपस्थिति से आज यह बंदरगाह हिंद महासागर में चीन की सैन्य शक्ति जमाने वाला पहला सशक्त चरण बन चुका है.
चीन ने होर्मुज जलडमरूमध्य में भी अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश की है. तेल आपूर्ति के इस संकरे लेकिन प्रमुख मार्ग से भारत बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता है. फारस की खाड़ी में अरब सागर और ईरान के तटीय क्षेत्र के निकट ग्वादर बंदरगाह के निर्माण और विकास के पीछे चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी और नौसेना के उपयोग के लिए समुचित प्रबंध करने की मंशा ही है. ऊर्जा और व्यापार के प्रमुख मार्गों पर किसी एक देश का बढ़ता नियंत्रण क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित करता है. ऐसे में बहुराष्ट्रीय अभ्यास यह संदेश देते हैं कि समुद्र किसी एक शक्ति का क्षेत्र नहीं, साझा धरोहर हैं, जहां नियम आधारित व्यवस्था का सम्मान आवश्यक है. भारत अन्य देशों के साथ समावेशी और पारदर्शी विकास मॉडल अपनाकर और सहयोग कर चीनी प्रतिस्पर्धा पर भारी पड़ सकता है. विशाखापट्टनम में नौसैनिक शक्तियों के बीच सहयोग द्वारा संतुलन स्थापित करने के इस प्रशंसनीय प्रयोग को शक्ति प्रदर्शन की आक्रामक अभिव्यक्ति समझना गलत होगा. यह 74 देशों की नौसेनाओं के बीच मैत्रीपूर्ण साझेदारी और सहयोग का प्रशंसनीय प्रयत्न है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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