अधिकार के साथ कर्तव्य की बात भी होनी चाहिए

भारत का संविधान
fundamental rights : स्वतंत्र भारत में भी प्रशासनिक ढांचे को बहुत ठीक नहीं किया गया. लोगों में सामाजिक एवं राष्ट्रीय बोध विकसित करने के बदले अधिकार की भावना भड़कायी जाती रही. अधिकार और कर्तव्य की व्यवस्था भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों व मौलिक कर्तव्यों के रूप में व्याख्यायित है.
Fundamental Rights : हम निरंतर अपने अधिकारों की बातें करते हैं और अपनी दुर्गति का सारा ठीकरा सरकार पर फोड़ देते हैं. पर आप सोचिए कि क्या सरकार हमारी सभी समस्याओं का समाधान कर सकती है? सरकार चाहे कितनी भी सफल क्यों न हो, हमारी सभी समस्याओं का समाधान उसके पास नहीं है. सरकार हमें व्यवस्था खड़ी करके दे सकती है, पर उस व्यवस्था का प्रबंधन और संचालन हमें स्वयं करना होगा. इतिहास बताता है कि अंग्रेजों के आने से पहले स्थानीय प्रशासन प्रबंधन में केंद्रीय सत्ता का हस्तक्षेप नहीं के बराबर था.
हर जगह शासन की स्थानीय इकाई विकसित थी और वही शासन का स्थानीय प्रबंधन देखती थी. इस कारण लोगों के मन में शासन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण था. उन दिनों अधिकारों की बातें कम होती थीं और बड़े पैमाने पर लोगों में कर्तव्य की भावना विकसित थी. परंतु अंग्रेजों ने इसे बदल दिया. लोगों के मन में सरकार और सरकारी व्यवस्था के प्रति उदासीनता छाने लगी और वहीं से कर्तव्य के स्थान पर अधिकार की मांग होने लगी.
स्वतंत्र भारत में भी प्रशासनिक ढांचे को बहुत ठीक नहीं किया गया. लोगों में सामाजिक एवं राष्ट्रीय बोध विकसित करने के बदले अधिकार की भावना भड़कायी जाती रही. अधिकार और कर्तव्य की व्यवस्था भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों व मौलिक कर्तव्यों के रूप में व्याख्यायित है. मौलिक अधिकार हमारे संविधान में संविधान निर्माताओं द्वारा स्थापित किये गये हैं, जबकि मौलिक कर्तव्यों को संविधान संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया है. मौलिक अधिकारों के लागू होने के 26 वर्ष के उपरांत संविधान संशोधन द्वारा मौलिक कर्तव्यों के जोड़े जाने से जनमानस में स्वाभाविक रूप से अधिकारों के प्रति जागरूकता अधिक है और कर्तव्यों का भान कम दिखाई देता है.
इस कारण प्रशासन, देश और समाज के प्रति एक नये प्रकार की उदासीनता विकसित हो गयी है. इसे ठीक करना होगा. कर्तव्यों को अधिकारों के ऊपर प्रतिष्ठित किये जाने से अनेक सामाजिक, राजनीतिक समस्याओं से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त हो सकता है. उदाहरण के लिए, सरकार द्वारा कई कानून बनाये गये हैं, जैसे दहेज लेना और देना दोनों गैरकानूनी हैं, पर समाज में यह धड़ल्ले से चल रहा है. जातिगत टिप्पणी गैरकानूनी है, परंतु समाज में यह किसी न किसी रूप में जारी है. अपने घर की सफाई के साथ-साथ आस-पड़ोस की सफाई हमारा सामाजिक दायित्व है, परंतु सामाजिक बोध के अभाव में ज्यादातर लोग अपने घर का कूड़ा दूसरों के दरवाजे पर जमा कर देते हैं.
यात्रा के समय सार्वजनिक यातायात के साधनों का उपयोग करते समय अधिकतर लोगों को सहयात्रियों का ख्याल नहीं रहता. यातायात नियम तोड़ने को अधिकतर लोग अपनी शान समझते हैं. सार्वजनिक स्थलों की सफाई का हमें ध्यान तक नहीं रहता है. इसी प्रकार, राष्ट्रीय हित की ऐसी बहुत सी बातें हैं जिनकी अधिकतर नागरिक अवहेलना करते हैं. कई व्यक्तियों को इस मामले की जानकारी नहीं होती है, पर कई जिम्मेदार व्यक्ति को भी इनकी अवहेलना करते देखा जा सकता है. इन पूरे मामलों को हम आंकड़ों से समझने का प्रयास करते हैं. परिवहन मंत्रालय द्वारा 2025 में जारी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में हेलमेट नहीं पहनने के कारण प्रतिदिन लगभग 80 लोगों की मृत्यु हो जाती है.
सड़क दुर्घटनाओं पर जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, 2022 में देश में हिट एंड रन की करीब 67 हजार दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें 30 हजार से अधिक लोगों की जान गयी. गृह मंत्रालय के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में प्रतिदिन 18 से 20 महिलाओं को दहेज के कारण अपनी जान गंवानी पड़ती है. अतिसार, हैजा, टाइफायड, हेपेटाइटिस, पोलियो, आंतों के कीड़े, ट्रेकोमा, पेचिश, सिस्टोसोमियासिस आदि ऐसी बीमारियां हैं, जो केवल गंदगी के कारण पनपती हैं. यदि हम सामाजिक दायित्व के तहत सामूहिक रूप से इसके खिलाफ अभियान चलायें, तो इसे नियंत्रित किया जा सकता है.
जिस प्रकार हमारे सामाजिक दायित्व हैं, उसी प्रकार हमारे राष्ट्रीय दायित्व भी हैं. जैसे, युद्ध, महामारी, प्राकृतिक आपदा, राष्ट्रीय आपदा के समय एकता का परिचय देना. सीमा की सुरक्षा के लिए सीमा सुरक्षा बलों का सहयोग करना. आतंकवाद और उग्रवाद के खिलाफ अपनी सुरक्षा एजेंसियों का सहयोग करना. लोगों में राष्ट्रीय भावना का संचार करना. क्षेत्रीयता, सांप्रदायिकता, भाषावाद जैसी विसंगतियों से आम लोगों को सचेत करते रहना. यह केवल सरकारी स्तर पर नहीं हो सकता. इसके लिए आम लोगों को आगे आना होगा.
हमें समझना होगा कि हमारे जो सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्व हैं, उन्हें हम तभी पूरा कर सकते हैं जब हमारे मन में दोनों प्रकार की संवेदना उत्पन्न होगी. इसके लिए सरकार प्रयास तो करती है, पर उसे आम सहयोग की जरूरत पड़ती है. यदि हम सामूहिक प्रयास करें, तो बड़ी से बड़ी कठिनाइयों का सामना कर सकते हैं. कोरोना महामारी इसका उदाहरण है, जब कठिनाइयों के बावजूद लोगों ने महामारी को पराभूत करने के लिए सामूहिकता का परिचय दिया. आगे भी इस प्रकार के प्रयास जारी रहने चाहिए और एक सचेत नागरिक के तौर पर हमें दोनों दायित्वों का निर्वहन करते रहना चाहिए. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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