बड़ा कदम है मलयालम को आधिकारिक भाषा बनाना

Updated at : 25 Mar 2026 11:34 AM (IST)
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Malayalam official language

मलयालम बनायी गयी आधिकारिक भाषा

Malayalam official language : मलयालम को केरल की आधिकारिक भाषा बनाने की मांग बहुत पुरानी है. इस दिशा में पहला प्रयास करीब दस वर्ष पहले कांग्रेस की अगुवाई वाली संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) की सरकार ने किया था. वर्ष 2015 में ओमन चांडी सरकार ने इस विधेयक को पारित कराया था.

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Malayalam official language : केरल का नाम केरलम् किया जाना और इसके सप्ताह भर बाद ही मलयालम को राज्य की आधिकारिक भाषा की मंजूरी मिलना महज संयोग नहीं है. राज्य विधानसभा चुनाव की अधिसूचना जारी हो चुकी है. सो इस संदर्भ में राजनीतिक दलों द्वारा इन दोनों कदमों का श्रेय लेने की होड़ मचना स्वाभाविक है. लेकिन भाषा कानून को लेकर केरल की सीमाओं के बाहर सवाल भी उठने शुरू हो गये हैं.

मलयालम को केरल की आधिकारिक भाषा बनाने की मांग बहुत पुरानी है. इस दिशा में पहला प्रयास करीब दस वर्ष पहले कांग्रेस की अगुवाई वाली संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) की सरकार ने किया था. वर्ष 2015 में ओमन चांडी सरकार ने इस विधेयक को पारित कराया था. पर तब इस विधेयक पर पड़ोसी कर्नाटक सरकार ने कड़ा एतराज जताया था. जब इस विधेयक को मंजूरी के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा गया, तो राष्ट्रपति ने इसे 1963 के ऑफिशियल भाषा एक्ट के नियमों को हटाने के सुझाव के साथ वापस भेज दिया था. फिर दस वर्ष बाद मौजूदा वाम मोर्चा की सरकार ने इसे नये रूप में पारित किया.


इस बार भी कर्नाटक इस कानून का विरोध कर रहा है. अब तक केरल में अंग्रेजी के साथ ही मलयालम की आधिकारिक भाषा के तौर पर प्रतिष्ठा रही है. लेकिन नये कानून के तहत सरकारी और सरकारी अनुदान प्राप्त स्कूलों में कक्षा 10 तक मलयालम को पहली भाषा के तौर पर अनिवार्य रूप से पढ़ाना जरूरी होगा. अदालती फैसलों और कार्यवाही भी अनिवार्य तौर पर मलयालम भाषा में अनूदित की जायेंगी. अब से राज्य विधानसभा में सभी बिल और अध्यादेश मलयालम में पेश किये जायेंगे.

अंग्रेजी में प्रकाशित महत्वपूर्ण केंद्रीय और राज्य कानूनों का भी मलयालम में अनुवाद होगा. नये कानून के तहत सूचना तकनीकी विभाग को मलयालम के प्रभावी इस्तेमाल के लिए ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर और इंस्ट्रूमेंट विकसित करने की जिम्मेदारी दी जा रही है. राज्य सचिवालय के मौजूदा पर्सनल एंड एडमिनिस्ट्रेटिव रिफॉर्म्स (ऑफिशियल लैंग्वेज) विभाग का नाम बदलकर ‘मलयालम भाषा विकास विभाग’ किया जा रहा है. इन कदमों के साथ ही, राज्य में मलयालम भाषा विकास निदेशालय भी गठित किया जायेगा.


भाषाई अस्मिता के लिहाज से देखें, तो केरल का यह कदम बेहद क्रांतिकारी और भारतीय भाषाओं के हित में है. लेकिन कर्नाटक की आपत्तियों को भी अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए. केरल के कासरगोड जिले में कन्नड़ भाषी ज्यादा हैं. राज्य में इसी तरह तमिल, तुलु, गुजराती और कोंकणी भाषी भी हैं. उनकी अपनी भाषाओं में पढ़ाई वाले स्कूल भी हैं. हालांकि, मलयालम भाषा कानून का विरोध तमिल मूल के लोगों ने नहीं किया है. पर कर्नाटक सरकार का तर्क है कि यह कानून केरल में रहने वाले कन्नड़ भाषी अल्पसंख्यकों की भाषाई अस्मिता के लिए खतरा है. कर्नाटक सीमा क्षेत्र विकास प्राधिकरण का तर्क है कि कासरगोड और केरल के दूसरे कन्नड़ भाषी क्षेत्रों में भाषायी अल्पसंख्यक अभी स्कूलों में कन्नड़ को पहली भाषा के तौर पर पढ़ते हैं. केरल में स्कूलों में हिंदी भी पढ़ायी जाती रही है.

दिलचस्प यह भी है कि केरल के विद्वान भी इस कानून के पक्ष में तर्क देते वक्त केंद्र सरकार पर केरल में हिंदी थोपने का आरोप लगाने से नहीं हिचक रहे. केरल सरकार ने हालांकि सफाई दी है कि जिनकी मातृभाषा तमिल, कन्नड़, तुलु या कोंकणी है, उनके लिए भी कानून में प्रावधान हैं. मलयालम को आधिकारिक भाषा बनाने का स्थानीय नागरिक स्वागत तो कर रहे हैं, पर कुछ का मानना है कि इस कानून के नाम से ही अलगाववादी और वर्चस्ववादी झलक मिलती है. केरल के बौद्धिकों के एक वर्ग का कहना है कि बेहतर होता कि इस कानून का नाम ‘मलयालम भाषा एक्ट 2025’ की जगह ‘केरल स्टेट लैंग्वेज एक्ट 2025’ होता. इससे समावेशी संदेश जाता. बौद्धिकों का यह भी तर्क है कि कानून में मलयालम की जगह राज्य में प्रयोग में लायी जाने वाली तमिल, कन्नड़, कोंकणी, तुलु और गुजराती का भी जिक्र होता, तो बेहतर होता.


केरल में जंगलों और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों की अपनी भाषाएं भी हैं. इसलिए एक वर्ग का मानना है कि उनकी भाषाओं की अस्मिता की रक्षा का बोध भी इस कानून में होना चाहिए था. बेशक केरल के विधानसभा चुनाव में मलयालम को आधिकारिक दर्जा मिलना बड़ा मुद्दा होगा. राज्य की राजनीति में प्रभावी दखल देने की ताक में बैठी भाजपा, कांग्रेस और वाम मोर्चा, सभी इसका श्रेय लेने की कोशिश करेंगे. पर यहां के बौद्धिक समाज का मानना है कि इस कानून से राज्य में एक भाषा के वर्चस्व का भाव पैदा हो सकता है. सो, भाषा विकास विभाग और निदेशालय को केवल मलयालम भाषा तक सीमित नहीं रहना होगा, बल्कि केरल की सभी भाषाओं के लिए सक्रिय होना होगा. इसमें दो राय नहीं कि मातृभाषा से इतर समूहों से आने वाले लोग किसी भी भाषा को अवसरों और जरूरत के लिहाज से सीखते हैं. इस प्रक्रिया में उत्साह जुड़ जाता है, तो भाषाएं समृद्ध होती हैं. आधिकारिक भाषा बनने के बाद मलयालम को लोग उत्साह से सीखें, शायद यही केरल के बौद्धिक चाहते हैं. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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Rajneesh Anand

लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

राजनीति,सामाजिक, इतिहास, खेल और महिला संबंधी विषयों पर गहन लेखन किया है. तथ्यपरक रिपोर्टिंग और विश्लेषणात्मक लेखन में रुचि. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक. IM4Change, झारखंड सरकार तथा सेव द चिल्ड्रन के फेलो के रूप में कार्य किया है. पत्रकारिता के प्रति जुनून है. प्रिंट एवं डिजिटल मीडिया में 20 वर्षों से अधिक का अनुभव.

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