डॉक्टरों का संघर्ष

Updated at : 13 Apr 2020 11:00 AM (IST)
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डॉक्टरों का संघर्ष

दुनियाभर में जारी कोविड-19 वायरस के संक्रमण से बीमार लोगों को बचाने की उम्मीद डॉक्टरों पर टिकी है. यह सुकूनदेह है कि लोग ठीक हो रहे हैं और बड़ी तादाद में रोगियों को मौत के मुंह में जाने से बचाया जा रहा है, लेकिन हमें यह भी मालूम है कि इस वायरस के संक्रमण की कोई दवा हमारे पास नहीं है और इसका कोई टीका भी साल-दो साल बाद ही मुहैया होने की उम्मीद है.

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दुनियाभर में जारी कोविड-19 वायरस के संक्रमण से बीमार लोगों को बचाने की उम्मीद डॉक्टरों पर टिकी है. यह सुकूनदेह है कि लोग ठीक हो रहे हैं और बड़ी तादाद में रोगियों को मौत के मुंह में जाने से बचाया जा रहा है, लेकिन हमें यह भी मालूम है कि इस वायरस के संक्रमण की कोई दवा हमारे पास नहीं है और इसका कोई टीका भी साल-दो साल बाद ही मुहैया होने की उम्मीद है. यह वायरस बहुत तेजी से फैलता भी है और संक्रमित व्यक्ति की तबीयत को बड़ी जल्दी खराब भी कर सकता है. इलाज की कोई प्रक्रिया भी डॉक्टरों के पास पहले से उपलब्ध नहीं है. नया होने की वजह से इस वायरस के बारे में बहुत कुछ जानकारी भी नहीं है. ऐसे में समझा जा सकता है कि डॉक्टर किन चुनौतियों का सामना करते हुए बीमारों की जान बचाने की कोशिश कर रहे हैं.

इस हालत में उनका सहारा स्वास्थ्य और शोध से जुड़ी देशी-विदेशी संस्थाओं के निर्देश हैं, जो अलग-अलग देशों और विभिन्न प्रकार के संक्रमितों की सूचनाओं से निर्धारित किये जा रहे हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से संक्रमण को संभालने के लिए अनेक सुझाव दिये गये हैं और इन सुझावों में नयी बातें भी जोड़ी जा रही हैं. भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने भी भारतीय डॉक्टरों के लिए ऐसे निर्देश जारी किया है. इसके अलावा चिकित्सक एक-दूसरे के समझ और अनुभवों को भी साझा कर रहे हैं. अपनी पढ़ाई और अन्य बीमारियों से मिलते-जुलते लक्षणों के हिसाब वे दवाइयां दे रहे हैं.

कई बार कई तरह की दवाइयां भी मिला-जुला कर रोगी को दी जा रही है. बड़ी संख्या में हमारे डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी बेहद दबाव और बिना समुचित संसाधनों के काम कर रहे हैं. इनमें से अनेक संक्रमण के शिकार भी हुए हैं. फिर भी ये सभी एक ही उद्देश्य को सामने रखते हुए संघर्षरत हैं कि संक्रमण को गंभीर नहीं होने देना है और गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति का जीवन बचाना है. विश्व स्वास्थ्य संगठन और चीन के संयुक्त शोध में यह निष्कर्ष संतोषजनक है कि लगभग 80 फीसदी संक्रमितों में मामूली से लेकर साधारण लक्षण दिखते हैं.

ऐसे लोगों को सही निगरानी और बुनियादी दवाओं से ठीक किया जा सकता है. हमारे डॉक्टर ऐसे मरीजों पर नजर रखे हुए हैं, क्योंकि वायरस की गति के बारे में कुछ भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है. शेष संक्रमितों की हालत बहुत खराब हो सकती है तथा करीब छह फीसदी बहुत अधिक बीमार हो सकते हैं. चूंकि दवाओं समेत अन्य कई जरूरी चीजों की कमी है, सो स्वास्थ्यकर्मियों को उपलब्ध सुरक्षा उपकरणों से ही काम चलाना पड़ रहा है और वे बहुत समझ-बूझ से ऐसा कर भी रहे हैं. हमें डॉक्टरों, नर्सों और अस्पतालों के स्टाफ का आभारी होना चाहिए तथा संक्रमण से अपने और अपनों को बचाने के लिए सावधानी एवं सतर्कता बरतनी चाहिए.

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