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चीन के खिलाफ आक्रामक पहल

By डॉ. निशिकांत दुबे
Updated Date
चीन के खिलाफ आक्रामक पहल
चीन के खिलाफ आक्रामक पहल

डॉ निशिकांत दुबे, सांसद, लोकसभा

delhi@prabhatkhabar.in

अयं निजः परो वेति गणना लघु चेतसाम / उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम. अर्थात, प्राचीन काल से भारत की विचारधारा ‘सारी दुनिया एक परिवार है’ की रही है. इस श्लोक से ही शांतिपूर्ण तरीके से समाज में साथ मिलकर रहने, ‘जियो और जीने दो’ की अवधारणा उत्पन्न हुई है. वर्ष 1947 से ही दक्षिण एशिया में अपने पड़ोसियों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों को आगे बढ़ाना भारत का उद्देश्य रहा है. अपने पड़ोसियों के साथ ठोस और रचनात्मक संबंध बनाने के हमारे प्रयास सफल रहे हैं.

नौ देशों- बांग्लादेश, भूटान, चीन, मालदीव, म्यांमार, नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका, और अफगानिस्तान (पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर से)- के साथ भारत की भूमि और समुद्री सीमा है. इनमें चीन और पाकिस्तान के साथ हमारी विशेष परिस्थितियां रही हैं, क्योंकि दोनों राष्ट्र भारत की संप्रभुता को नियमित रूप से चुनौती देते हैं. पाकिस्तान के साथ संबंधों में दीर्घकालिक सुधार में कश्मीर को लेकर उसकी सोच और अशांति फैलाने के उसके प्रयास एक बड़ी रुकावट हैं.

चीन को भी भारत एक प्रमुख दीर्घकालिक खतरे के रूप में देखता है. हाल के दिनों में चीन ने सीमा से जुड़े मुद्दों को हल करने में कम रुचि दिखायी है और लद्दाख व उत्तर-पूर्व के विभिन्न क्षेत्रों पर अपने अवैध दावों को लेकर धौंस दिखाने लगा है. पहले डोकलाम पर आक्रमण का प्रयास और अब गलवान घाटी की घटना भारत को अपनी तिब्बत नीति पर पुनर्विचार करने का आह्वान करती है.

भारत ने दो एकतरफा रियायतें दी हैं- पहला, चीन की नीति का समर्थन और दूसरा, तिब्बत पर चीनी संप्रभुता का स्वीकार. भारत ने कई मौकों पर पंचशील सिद्धांतों का पालन किया है, जो दक्षिण एशिया में अस्थिरता लाने और चीन की साम्राज्यवादी मानसिकता बढ़ाने के लिए जिम्मेदार एक समझौते से अधिक कुछ नहीं है.

नेहरू ने पंचशील समझौते के उल्लंघन में जो दो गलतियां की, वे थीं 1954 में तिब्बत और अक्साई चिन में ‘क्षेत्रीय स्थिरता के लिए’ चीन के दावे का समर्थन तथा दूसरा, 1955 में सोवियत रूस से दोस्ती की कोशिश में संयुक्त राष्ट्र में हंगरी पर उसके दावे का समर्थन. इन फैसलों का भारत की विदेश नीति, अन्य देशों के साथ उसके संबंधों और संप्रभुता बनाये रखने की क्षमता पर काफी असर पड़ा. वर्ष 1950 से ही चीन इस क्षेत्र को अस्थिर करने के लिए तीन आयामी दृष्टिकोण का पालन करता रहा है. पहला, आर्थिक दृष्टि से चीन ने अपने पड़ोसी देशों में भारी निवेश किया है.

दूसरा, उसने 1950 के दशक में तिब्बत पर आक्रमण किया तथा भारत और भूटान के साथ इसी तरह की सोच के तहत आक्रमण के असफल प्रयास करता रहा है. दक्षिण चीन समुद्र में भी वह अपनी सीमाओं के विस्तार में लगा है. तीसरा, चीन केवल तब सीमा से जुड़े मुद्दों को सुलझाने का प्रयास करता है, जब वह असुरक्षित महसूस करता है. रूस और चीन के बीच सीमांकन 2004 में समझौते के बाद शुरू हुआ और यह 2009 में युद्ध की धमकी देकर पूरा किया गया. वर्ष 2009 में चीन और वियतनाम ने भी इसी प्रकार से सीमांकन किया.

अब समय आ गया है कि भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र होने के तिब्बत के दावे का समर्थन करे. भारत एक हिमालयी आर्थिक क्षेत्र का प्रस्ताव कर सकता है, जिसमें तिब्बत, शिनजियांग, नेपाल, भूटान और भारतीय हिमालयी क्षेत्र शामिल होंगे. भारत अपने देश में बौद्ध स्थलों के पर्यटन को प्रोत्साहित कर सकता है. इसमें जापान, म्यांमार, वियतनाम और सिंगापुर के साथ घनिष्ठ रक्षा संबंध भी उपयोगी होंगे.

हमारे रक्षा योजनाकारों को अरुणाचल प्रदेश, लद्दाख, सिक्किम, और संयुक्त अंडमान और निकोबार में हिमालय और बंगाल की खाड़ी में चीन के खिलाफ एक रक्षक के रूप में सुरक्षा योजनाओं को बढ़ाना चाहिए. दक्षिण एशिया में हमें आर्थिक सहयोग की प्रक्रिया को तेज करना चाहिए और क्षेत्रीय एकीकरण परियोजनाओं में केंद्रीभूत क्षेत्रों के निर्माण को शामिल करना चाहिए. आतंकवाद, संगठित अपराध, मानव तस्करी, साइबर सुरक्षा और सामूहिक विनाश के हथियारों का बड़े पैमाने पर प्रसार आदि चुनौतियों से निबटने के लिए प्रभावी आतंकवाद विरोधी नीति आवश्यक है.

सीमाओं का प्रबंधन, साइबर सुरक्षा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, कृषि, शिक्षा, संस्कृति और क्षमता निर्माण के लिए पड़ोसियों के साथ सहयोग पर एक अग्रगामी दृष्टिकोण जरूरी है. भारत ने विभिन्न मंचों पर राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय शांति के मुद्दों को हल करने के लिए समर्पित समितियों का निर्माण किया है. भारत का खाड़ी, मध्य एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और हिंद महासागर द्वीपों के साथ जुड़ना जरूरी है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि उसकी पड़ोस नीति प्रभावित न हो.

यदि भारत क्षेत्रीय स्थिरता बनाने में सक्षम है और 1914 के शिमला समझौते के अनुसार तिब्बत की स्वतंत्रता की मांग उठाता है, तो वर्तमान में चीन के खिलाफ नाराजगी के कारण वह पश्चिमी और दक्षिण-पूर्व एशियाई शक्तियों का समर्थन हासिल कर सकता है. कई व्यवसायों के दूसरे देशों में जाने के कारण आगामी वर्षों में चीन खुद को एक आर्थिक संकट के बीच भी घिरा पायेगा और सीमा विवाद हल करने पर मजबूर होगा. भारत को अपनी क्षेत्रीय रक्षा और दक्षिण एशिया में स्थिरता के लिए चीन के खिलाफ आक्रामक पहल करनी चाहिए.

(ये लेखक के निजी विचार हैं )

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