एक दिन का सम्मान और फिर..

महिला दिवस एक बार फिर आया और गया. पूरे जोर-शोर से. उमंग और गाजे-बाजे के साथ. ठीक वैसे ही, जैसे गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस, हिंदी दिवस, रक्षा बंधन, होली, दीपावली हर वर्ष आते-जाते रहते हैं. थोड़ा हंसना, थोड़ा बिसूरना. बधाइयों-शुभकामनाओं के तांते, उपहार, मिठाई, दावत. अखबारों, टीवी, विज्ञापनों, पोस्टरों में महिला स्तुति-गान. समस्त नारी जाति […]
महिला दिवस एक बार फिर आया और गया. पूरे जोर-शोर से. उमंग और गाजे-बाजे के साथ. ठीक वैसे ही, जैसे गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस, हिंदी दिवस, रक्षा बंधन, होली, दीपावली हर वर्ष आते-जाते रहते हैं. थोड़ा हंसना, थोड़ा बिसूरना. बधाइयों-शुभकामनाओं के तांते, उपहार, मिठाई, दावत. अखबारों, टीवी, विज्ञापनों, पोस्टरों में महिला स्तुति-गान. समस्त नारी जाति के प्रति सम्मान व्यक्त करने की होड़.
बाजारों में वस्त्रभूषणों पर अनेक लुभावने आकर्षक डिस्काउंट्स की झड़ी. ठीक हर बार की तरह. घरों में भी महिला को एक दिन के लिए खुश करने के लिए हम क्या कुछ करने को तैयार नहीं रहते! लेकिन क्या इस तरह किसी एक दिन स्त्रियों को सम्मानित कर देने भर से समाज की स्त्रियों के प्रति नकारात्मक मानसिकता को नजरअंदाज किया जा सकता है?
पूनम पाठक, कोलकाता
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