संख्या पर भारी समीकरण
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :09 Mar 2014 4:32 AM (IST)
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।। पुष्पेश पंत।। (वरिष्ठ स्तंभकार) इस बार चुनावी बहसें ज्यादातर नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के बीच मुठभेड़ों तक ही गरमाती रही हैं. कुछ इस अंदाज में जैसे हमारा संसदीय जनतंत्र अचानक अमेरिकी नमूने की राष्ट्रपति प्रणाली में बदल चुका है. इसके साथ ही बाकी तमाम मुद्दे नजरअंदाज कर सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता के दंगल को […]
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।। पुष्पेश पंत।।
(वरिष्ठ स्तंभकार)
इस बार चुनावी बहसें ज्यादातर नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के बीच मुठभेड़ों तक ही गरमाती रही हैं. कुछ इस अंदाज में जैसे हमारा संसदीय जनतंत्र अचानक अमेरिकी नमूने की राष्ट्रपति प्रणाली में बदल चुका है. इसके साथ ही बाकी तमाम मुद्दे नजरअंदाज कर सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता के दंगल को जबरन सुर्खियों में बनाये रखने का प्रायोजित अभियान जारी है. ऐसा लगने लगा है कि जैसे सभी प्रमुख राजनीतिक दल एक सुनियोजित, सहकारी, प्रायोजित अभियान को संपन्न कराने में जुटे हैं जो हमारा ध्यान देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, आतंकवाद और कानून के राज को ताकतवर लोगों द्वारा खत्म करने की लगभग सफल साजिश से भटका रहा है. इस कारण विकास से जुड़े मुद्दे जैसे रोजी-रोटी, शिक्षा-चिकित्सा, सड़क, बिजली-पानी आदि जाने कहां रेगिस्तान में किसी मरीचिका की तरह दूर होते जा रहे हैं.
कुछ समय पहले तक आम आदमी पार्टी (आप) के दिल्ली में अचानक धूमकेतु की तरह उदय होने से यह भरम पालने की संभावना बड़ी थी कि शायद आगामी लोकसभा चुनावों में अब तक सत्तारूढ़ समान रूप से भ्रष्ट और खुदगर्ज नेताओं तथा राजनैतिक दलों से आजिज आ चुकी जनता अपने लिए नया सार्थक विकल्प पा सकती है. जिन परिस्थितियों में आम आदमी पार्टी की सरकार को दिल्ली में काम नहीं करने दिया गया और जिस तरह उसे खारिज करने के अभियान में कांग्रेस और भाजपा दोनों ही एकजुट हो गये, उसे देख कर यह आशा लगभग नष्ट हो चुकी है. ईमानदारी का तकाजा यह भी है कि मोहभंग के लिए खुद आम आदमी पार्टी के अति उत्साही और लगभग पूरी तरह निरंकुश कार्यकर्ता खुद कम जिम्मेदार नहीं.
यह कहना अलग बात है कि आदर्शवादी आंदोलकारियों की तुलना खुर्राट, मौकापरस्त राजनेताओं के साथ नहीं कि जानी चाहिए. नये लोगों की कार्यशैली फर्क होगी ही, पर इसका मतलब यह नहीं निकाला जा सकता कि अपनी अराजकता को तमगे की तरह सीने पर सजा कर- आ बैल मुङो मार वाली बकैती की मुद्रा, नियम-कानून सब ताक पर धर कर आप यह दावा करने लगें कि हम तो इस पूरी भ्रष्ट व्यवस्था को बदल देना चाहते हैं. ऐसा नहीं कि इस आचरण ने सिर्फ मध्यवर्ग के पढ़े-लिखे व सुविधाभोगी नागरिकों को ही सरदर्द दिया है. झुग्गी-झोपड़ियों में रहनेवाले भी यह सोचने को विवश होने लगे हैं कि क्या आम आदमी पार्टी वाले वाकई ऐसी सरकार चला सकते हैं जो उनके साथ किये लोक-लुभावन वादों का पूरा कर सके? दिल्ली के मतदाता समूह में आम आदमी पार्टी का जनाधर भले ही कमोबेश बरकरार रहा हो, पर यह बात नकारी नहीं जा सकती कि अखिल भारतीय स्तर पर कांग्रेस या भाजपा की कमजोरी का फायदा उठा जिन राज्यों में स्थानीय, क्षेत्रीय पार्टियां सत्तारूढ़ हैं, उनकी अलोकप्रियता को अपने पक्ष में भुना कर केजरीवाल और उनके सहयोगी एक व्यावहारिक तीसरे मोरचे को जन्म दे सकते हैं.
चुनावी तारीखों की घोषणा के साथ ही जोड़-तोड़ और सरगर्मियां तेज हो गयी हैं. एक ओर यह बात जगजाहिर है कि बेचारे राहुल गांधी इस दौड़ में नरेंद्र मोदी से बहुत पीछे हैं. इस प्रतियोगिता में खरगोश अति-आत्मविश्वास से पीड़ित और अहंकारी भले ही दिखलायी देता हो, पर मूर्ख कतई नहीं है. जीत के फीते तक पहुंचने तक वह अपने दौड़ने की गति कम करने वाला नहीं है और कछुए की जगह जो प्रतियोगी दिखलाई दे रहा है, वह चलना शुरू करने को ही राजी नहीं. सिर्फ कवचनुमा खोल से बीच-बीच में सिर निकाल इधर-उधर झांक लेता है और सूत्र-वाक्यों में कुछ उपदेश सुना फिर गर्दन भीतर कर लेता है. कांग्रेसी पस्त हालत में हैं और कुछ ने कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन पकड़ना कबूल किया है. अब इस मौकापरस्त दल-बदल को आप कुछ कहें, पर कांग्रेस के माहौल को कांग्रेस के प्रतिकूल करने का काम तो ये शुरू कर ही चुके हैं.
इनमें वरिष्ठ कांग्रेसी नेता जगदंबिका बाबू ही नहीं, एनटीआर की पुत्री और मनमोहन सरकार में केंद्रीय मंत्री रह चुकी पुरंदेश्वरी भी हैं. आंध्र प्रदेश के विभाजन को लेकर कांग्रेस के घर की दीवार में जो दरार फटी थी, वह उसकी छत ढहाने का जोखिम पैदा कर चुकी हैं. आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे कांग्रेस के किरन रेड्डी ने नयी पार्टी की घोषणा कर दी है और बचा-खुचा काम सीमांध्र के अन्य कांग्रेसी प्रतिनिधि, केंद्रीय और प्रांतीय मंत्री, सांसद और विधायक कर डालेंगे. सवाल बस इतना बचा है कि इसका फायदा किसको ज्यादा होगा जगनमोहन रेड्डी को अथवा चंद्रबाबू नायडू को? कांग्रेस ने अपनी तरफ से भरसक यह कोशिश की थी कि तेलंगाना में चंद्रशेखर राव की पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) का विलय कांग्रेस के साथ हो जायेगा. पर कुल जमा उपलब्धि इतनी ही सामने आयी कि वह अपने पूरे कुनबे की सोनिया गांधी के साथ तसवीर खिंचवा कर घर लौट गये.
करीब एक पखवाड़े पहले तक तीसरे मोरचे की पदचाप सुननेवाले बहुतेरे थे. माकपा के महासचिव प्रकाश करात की सदारत में एक प्रेस सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें ग्यारह गैर-कांग्रेसी राजनैतिक दलों ने यह संकेत दिया कि खंडित जनादेश की दशा में अगर उनके सभी सदस्यों की संख्या कांग्रेस या भाजपा से अधिक रही, तो वे केंद्र में सरकार बनाने के लिए दावेदार हो सकते हैं. खींच-तान कर जुटायी गयी इस एकता को बिखरते ज्यादा देर नहीं लगी. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भले ही निरंतर यह हठ दर्शाते रहे हैं कि प्रशासनिक अनुभव हो या योग्यता, उन्हें किसी भी तरह नरेंद्र मोदी से कमतर नहीं आंका जा सकता. सच तो यह है कि प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के लिए योग्यता या अनुभव कसौटी नहीं. यदि ऐसा होता, तो न देवगौड़ा कभी प्रधानमंत्री बने होते और ना ही ज्योति बसु प्रधानमंत्री पद से वंचित रखे गये होते. इस अभागे देश में एक से अधिक बार ऐसा हुआ है, जब किसी गुमनाम व्यक्ति के भाग्य से उसके सिर पर दूध-दही की मटकी से भी मूल्यवान यह छींका टूटा है. और न ही, प्रधानमंत्री बनने के लिए अपने पक्षधर सांसदों की संख्या का सदन में बहुमत जरूरी है. 1960 के दशक में कांग्रेस के विभाजन के बाद हुए चुनावों में श्रीमती गांधी के नेतृत्ववाली कांग्रेस बहुमत में नहीं थी और कम्युनिस्टों के समर्थन के कारण ही सरकार बनाने और उसे बचाये रखने में सफल हुई थीं. बाद के वर्षो में भी अनेक कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों ने जोड़-तोड़, खरीद फरोख्त और भयादोहन से यह काम पूरा किया. चाहे वह पिछले दिनों का ‘वोट के लिए नोट वाला कांड’ हो या उसके पहले का झारखंड मुक्ति मोरचा (झामुमो) रिश्वत कांड. इन्हें भारतीय जनतंत्र के इतिहास में शर्मनाक अध्याय ही समझा जाना चाहिए.
अनेक ऐसे प्रधानमंत्री इतिहास में अपना नाम दर्ज करा चुके हैं जो दगाबाज समर्थकों के कारण अपना पद गंवाने को मजबूर हुए. पहले थे मोरारजी देसाई, जिन्हें धकिया कर कांग्रेस की मदद से प्रधानमंत्री की कुरसी पर बैठने को उतावले थे चौधरी चरण सिंह. खुद चरण सिंह को तब इस बात का इल्म नहीं था कि कितनी जल्दी कांग्रेस उन्हें धोखा दे देगी और उनकी ढाई घड़ी की बादशाहत खत्म हो जायेगी. बाद के दिनों में वीपी सिंह, चंद्रशेखर, इंद्रकुमार गुजराल और अटल बिहारी वाजपेयी सभी का हश्र ऐसा ही हुआ. हमारी राय में इस अंकगणित को ले कर माथापच्ची करना बिल्कुल बेकार है कि किस दल के कितने सांसद चुन कर आयेंगे और त्रिशंकु संसद का कैसा भविष्य होगा. हाल ही में, दिल्ली में बहुमत पाने में असमर्थ रहने के बाद सरकार बनी थी आम आदमी पार्टी की. कांग्रेस ने चाहे जिस मकसद से, भाजपा को बाहर रखने या मोदी का रथ रोकने के लिए, केजरीवाल को सुर्खियों में रखने का फैसला लिया हो, नतीजा यही निकल कर आया. इन पंक्तियों के लेखक का यह मानना है कि भारत की चुनावी राजनीति में अंकगणित से कही अधिक महत्व बीजगणित का है. जहां कोइ ए बी सी की तुलना में फैक्टर एक्स समीकरण को बुरी तरह गड़बड़ा सकता है. कभी आप रेखागणित के उस प्रमेय में उलङो रहते हैं कि दो समांतर रेखाएं कभी मिलती नहीं, जबकि होता यह है कि दोनों रेखाएं अपने स्वार्थ-साधन के लिए एक-दूसरे के इतना समीप पहुंच जाती हैं कि वे मिल कर एक हो जाती है. इसी तरह त्रिवेणी के पौराणिक मिथकीय संगम में कौन नदी धरा में लुप्त-गुप्त हो जाती है और किसका पानी अपना रंग दूसरे पर चढ़ा देता है, कहना कठिन हो जाता है.
इस समय भारतीय राजनीति में चुनाव के ठीक पहले संगम के तट पर बैठ बीजगणित से मनोरंजन कहीं अधिक लाभप्रद लगता है. उत्तर प्रदेश में मुलायम और माया कांग्रेस के साथ मिल कर समान भुजाओं वाला एक ऐसा त्रिकोण दिखलायी दे रहे हैं जो कुछ को आपातकाल के अत्याचारी लाल तिकोन की याद दिला रहा है, तो कुछ दूसरों को असुरों जैसे विपक्षियों के मर्मस्थल में जा घुसनेवाले जहरीले तीर का अगला सिरा. मगर तीर को निशाने तक पहुंचाने के लिए धनुष को चलानेवाले जिस अर्जुन की जरूरत होती है, वह कहीं नजर नहीं आता.
ममता बनर्जी और जयललिता अब तक अपने पत्ते खोलने को राजी नहीं. उन्हें लगता है कि ताश की गड्डी फेंटते रहना ही सबसे सफल रणनीति है. मगर जो बात किसी से छिपी नहीं कि अंतत: जब सर्वस्व अर्थात् अपनी जागीर की सूबेदारी दावं पर लगी होगी, तब ये दोनों देवियां तीसरी देवी मायावती के साथ मिल कर उसी वीर के साथ खड़ी नजर आयेंगी, जिसका अभिषेक छत्रपति के रूप में होने जा रहा होगा. इन सब बातों को हल्के अंदाज में खारिज नहीं किया जाना चाहिए. जो सच्चाई निकल कर सामने आ रही है, वह यह है कि केंद्र में मनमोहन सरकार के दस साल यूपीए-2 सरकार की छवि को ही कलंकित करने के लिए जिम्मेदार नहीं, बल्कि कांग्रेस पार्टी के इकबाल को भी पूरी तरह नष्ट करनेवाले रहे हैं. सोनिया-राहुल और उनके दरबारियों के अलावा न तो कहीं संगठन है, ना आला कमान. लेकिन, कुनबापरस्ती, व्यक्ति-पूजा और वंशवाद सिर्फ कांग्रेस तक सीमित नहीं. सपा, अकाली दल और नेशनल कॉन्फ्रेन्स- कौन इससे मुक्त है? किसी भी राष्ट्रीय पार्टी का चरित्र और संस्कार जनतांत्रिक नहीं. इस परिप्रेक्ष्य में जिस महत्वपूर्ण चुनौती को रेखांकित किया जाना जरूरी है, वह यह है कि क्या 2014 के चुनाव भारतीय राजनीति को वास्तव में संविधान में प्रतिष्ठित समतापोषक समाज का सपना सच करने के लिए मतदाता को प्रोत्साहित कर सकेंगे? क्या मतदाता अपने विवेक का उपयोग कर जाति-धर्म, भाषा और दलगत पक्षधरता से ऊपर उठ कर वोट डालेगा? बेहतर उम्मीदवार को पुरस्कृत करेगा और कलंकित, निकम्मे, गलीज को दंडित? क्या भारत का संघीय स्वरूप, संसद में निर्वाचित सदस्यों के जरिए, बिना एकता को संकटग्रस्त किये हमारी विविधता को प्रतिबिंबित करेगा?
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