शिखर पर पहुंच कर भी लाचार क्यों?

Published at :08 Mar 2014 4:00 AM (IST)
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शिखर पर पहुंच कर भी लाचार क्यों?

।। दक्षा वैदकर।। (प्रभात खबर, पटना) विगत 20-25 सालों में देश में शिक्षा के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है. साथ ही महिलाओं में भी शिक्षा का अच्छा प्रसार हुआ है. इसका परिणाम यह हुआ कि देश के हर क्षेत्र में महिलाओं ने उल्लेखनीय प्रगति की है. पुरुषों के वर्चस्व वाले क्षेत्रों में भी अपनी […]

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।। दक्षा वैदकर।।

(प्रभात खबर, पटना)

विगत 20-25 सालों में देश में शिक्षा के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है. साथ ही महिलाओं में भी शिक्षा का अच्छा प्रसार हुआ है. इसका परिणाम यह हुआ कि देश के हर क्षेत्र में महिलाओं ने उल्लेखनीय प्रगति की है. पुरुषों के वर्चस्व वाले क्षेत्रों में भी अपनी पहचान बनायी है. वे बड़े-बड़े संस्थानों, कंपनियों की मुखिया बन कर काम कर रही हैं और रोजाना नयी-नयी चुनौतियों का सामना कर रही हैं. महिलाओं की इस प्रगति से भारतीय राजनीति भी अछूती नहीं है. महिलाओं ने राजनीति में अपना उचित प्रतिनिधित्व हासिल करने की पुरजोर कोशिश की है. हर राजनीतिक पार्टी में उनकी हिस्सेदारी बढ़ी है. फिर पार्टी चाहे प्रादेशिक स्तर की हो या राष्ट्रीय स्तर की. यह सचमुच गर्व की बात है.

हमारे देश में पहली बार एक महिला ने राष्ट्रपति पद को सुशोभित किया. इससे पहले देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने करीब 16 साल देश का सफल नेतृत्व किया. डेढ़ दशक से ज्यादा समय से कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी की बागडोर सोनिया गांधी के हाथों में है. उनके नेतृत्व में पिछले एक दशक से कांग्रेस सत्ता में है. उधर दक्षिण भारत में जयललिता अन्नाद्रमुक पार्टी का नेतृत्व सफलतापूर्वक कर रही हैं. उनके नेतृत्व में पार्टी तमिलनाडु में सत्तारूढ़ है. उत्तरप्रदेश में मायावती एक मजबूत राजनीतिक स्तंभ हैं और कई बार मुख्यमंत्री पद को भी सुशोभित किया. दिल्ली में शीला दीक्षित दस साल सत्ता में रहीं. बंगाल में ममता बनर्जी ने 34 सालों की वामपंथी सरकार को उखाड़ फेंका. राजस्थान में वसुंधरा राजे सत्ता में हैं. उमा भारती मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं. अन्य पार्टियों में भी महिलाएं महासचिव, प्रदेश पार्टी अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पदों को सुशोभित कर रही हैं.

परंतु, दूसरी तरफ देश में अधिसंख्य महिलाएं असहाय हैं. उन पर बलात्कार, अनाचार, अत्याचार लगातार बढ़ रहे हैं. उनके साथ भेदभाव हो रहा है. देश की सबसे बड़ी समस्या के रूप में ये बातें उभर कर आयी हैं. किंतु राजनीति में सक्रिय महिलाएं इतनी सक्षम नहीं हैं कि वे अपनी समस्याओं पर संविधान में उचित संशोधन करवा सकें और ऐसे नये कानून बनवा सकें, जो महिलाओं को उचित सुरक्षा और सम्मान दिला सके. यहां तक कि पिछले कई सालों से लंबित महिला आरक्षण विधेयक अब तक संसद में पारित नहीं हो सका है. उसमें हर पार्टी का पुरुष नेतृत्व अपने हिसाब से संशोधन चाहता है. इसका उद्देश्य महिलाओं का भला करना कम और वोट बैंक बढ़ाना ज्यादा है. देश की विदेश नीति, रक्षा नीति और अर्थ नीति जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर उनके मतों का विशेष महत्व नहीं है. आज महिला दिवस पर हमें उम्मीद करनी चाहिए कि आनेवाले समय में महिलाएं राजनीति में इतनी सक्रिय होंगी कि वे देश को अपने विचारानुसार चला सकेंगी. साथ ही महिलाओं को सुरक्षा और सम्मान की जिंदगी जीने का हक दिला सकेंगी.

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