पढ़ाई हो या चुनाव खरहा दौड़ नाकाम

Published at :06 Mar 2014 2:57 AM (IST)
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पढ़ाई हो या चुनाव खरहा दौड़ नाकाम

।। राजीव चौबे।। (प्रभात खबर, रांची) मार्च का महीना, यानी परीक्षाओं का मौसम. बच्चों की साल भर की पढ़ाई का नतीजा बताती है परीक्षा. साथ ही, राजनीतिक परीक्षाओं का मौसम भी आ गया है. आम चुनाव की तिथियां घोषित हो गयी हैं. इसमें नेताओं और राजनीतिक पार्टियों के पांच साल के काम का नतीजा सामने […]

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।। राजीव चौबे।।

(प्रभात खबर, रांची)

मार्च का महीना, यानी परीक्षाओं का मौसम. बच्चों की साल भर की पढ़ाई का नतीजा बताती है परीक्षा. साथ ही, राजनीतिक परीक्षाओं का मौसम भी आ गया है. आम चुनाव की तिथियां घोषित हो गयी हैं. इसमें नेताओं और राजनीतिक पार्टियों के पांच साल के काम का नतीजा सामने आयेगा. खैर, बात चाहे अकादमिक हलके की हो या राजनीतिक हलके की, अपनी-अपनी परीक्षाओं को लेकर तैयारियां जोरों पर हैं. अपने बीते दिनों को याद करें. कई छात्र साल भर नियमित रूप से पढ़ाई करनेवाले होते थे. तो दूसरी तरफ ऐसे बच्चे भी होते थे, जो परीक्षा के ऐन मौके पर ‘गहन अध्ययन’ शुरू करते थे. इनके लिए साल भर की आरामतलबी वाली पढ़ाई से ज्यादा उपयोगी परीक्षा से एक -दो सप्ताह पहले की पढ़ाई होती थी. इसके पीछे इनका अपना तर्क भी होता था. ऐसी तैयारी की पद्धति अपनाने वाले इसे ‘परफॉर्मेस अंडर प्रेशर’ की संज्ञा देते हैं. इनका तर्क होता है कि मानसिक दबाव हमेशा नकारात्मक नहीं होता. कभी-कभी यह सकारात्मक भी होता है.

लेकिन इतना तो तय है कि जो प्रदर्शन साल भर की नियमित पढ़ाई के बाद दिखता है, वह परीक्षा से एक हफ्ते पहले वाली पढ़ाई में कतई नहीं दिख सकता. वैसे ‘अपवाद’ हर जगह होते हैं और इस मामले में भी जरूर होंगे, इससे मैं इनकार नहीं करता. खैर, मुद्दे की बात यह है कि भोज के दिन कोहड़ा रोपने वाली कहावत राजनीति के क्षेत्र में भी अब चरितार्थ होती दिख रही है. अक्सर ऐसा देखने-सुनने को मिल जाता है कि हमारे नेता वोट लेने के समय गली-गली, दरवाजे-दरवाजे घूम कर हाथ जोड़ते हैं और चुनाव जीत जाने के बाद सब भूल जाते हैं. लेकिन इस बार मीडिया में चुनावी तैयारियों का कवरेज देख कर ऐसा लगता है कि ये नेता अपने बचपन में भी ऐसे ही छात्र रहे होंगे, जो परफॉर्मेस अंडर प्रेशर के मार्गी रहे होंगे.

मीडिया में कई ऐसे नेता दिखते हैं जो अपने पूरे कार्यकाल के दौरान ‘एक्टिव’ रहते हैं. कभी रैली को संबोधित करते हैं, तो कभी धरने पर बैठते हैं. वहीं, ऐसे नेता भी कम नहीं, जो चुनाव से ठीक पहले अपनी कुंभकर्णी नींद तोड़ते हैं और लोगों से ‘घुलने-मिलने’ की कोशिश करने लगते हैं. ये लोग कुछ दिनों में ‘खरहा दौड़’ दौड़ कर लोगों को लुभा लेने के अतिआत्मविश्वास में अपनी हंसाई करा बैठते हैं. नियमित प्रदर्शन करनेवाले नेता जहां पूरे आत्मविश्वास के साथ रैलियों में अपने श्रोताओं को ‘भाई और बहन’ बना चुके होते हैं, वहीं खरहा दौड़ वाले इतने हतोत्साहित हो जाते हैं कि भीड़ के बीच लोगों को संबोधित करने के दौरान उन्हें खुद अपनी भी आवाज सुनायी नहीं देती. वैसे, मतदाता होने के नाते हमारे लिए किस किस्म का नेता बढ़िया होगा, इसका भान तो आप सबको हो ही गया होगा. और, ‘खरहा दौड़’ दौड़नेवाले नेता हमें कितना बेवकूफ समझते हैं, यह भी आप समझ रहे होंगे.

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