मतदाताओं के लिए भ्रष्टाचार ही बड़ा मुद्दा

।। संजय कुमार।। (निदेशक, सीएसडीएस) लोकसभा या विधानसभा के चुनावों को अलग-अलग चरणों में इसलिए कराये जाते हैं, क्योंकि चुनाव को निष्पक्ष रूप से कराने के लिए सुरक्षा बलों की जरूरत होती है. एक चरण के बाद दूसरे चरण के लिए सुरक्षा बलों को भेजना होता है. चूंकि हमारे यहां सुरक्षा बलों की संख्या इतनी […]
।। संजय कुमार।।
(निदेशक, सीएसडीएस)
लोकसभा या विधानसभा के चुनावों को अलग-अलग चरणों में इसलिए कराये जाते हैं, क्योंकि चुनाव को निष्पक्ष रूप से कराने के लिए सुरक्षा बलों की जरूरत होती है. एक चरण के बाद दूसरे चरण के लिए सुरक्षा बलों को भेजना होता है. चूंकि हमारे यहां सुरक्षा बलों की संख्या इतनी नहीं है कि एक-दो चरण में चुनाव संपन्न कराये जा सकें. जहां तक इस बार के आम चुनावों की बात है, तो इसे नौ चरणों में किया जाना कुछ लंबा लगता है. क्योंकि इसके पहले के आम चुनावों में चार-पांच चरणों में चुनाव होते रहे हैं.
इस बार के चुनावों के मद्देनजर सबसे अहम बात तो यह है कि पिछले दिनों देश के कुछ राज्यों में जो विधानसभा के चुनाव हुए, उसमें देखा गया कि हर एक राज्य में जो मतदाता प्रतिशत है, जिसे हम बढ़ना-घटना कहते हैं, वह बढ़ता ही रहा है. ऐसे में इस बात की उम्मीद करते हैं कि इस आम चुनाव में भी ज्यादा से ज्यादा मतदाताओं की हिस्सेदारी बढ़ेगी, जिससे वोट प्रतिशत का बढ़ना तय है. ऐसा इसलिए, क्योंकि इस वक्त लोगों के सामने भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है. साथ ही महंगाई भी एक मुद्दा है, जिससे लोग परेशान हैं. ऐसा लगता है कि ये मुद्दे ही इस आम चुनाव में निर्णायक साबित होंगे किसी की हार-जीत के लिए. लेकिन साथ ही भारतीय मतदाताओं में एक प्रकार के राजनीतिक परिवर्तन की इच्छा भी नजर आती है, जिससे वे संभवत: परंपरागत मतदान से इतर जाकर वोट करेंगे.
इस बार भी राष्ट्रीय पार्टियों और दूसरी सभी पार्टियों के अपने खास चुनावी मुद्दे हैं. मसलन भाजपा का मानना है कि चुनाव ‘विकास बनाम वंशवाद’ पर होगा, क्योंकि उसके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हमेशा विकास की बात करते रहते हैं. वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस का मानना है कि यह चुनाव ‘पॉपुलरिज्म बनाम सेक्युलरिज्म’ पर होगा, क्योंकि कांग्रेस लगातार धर्मनिरपेक्षता की बात करती रहती है. लेकिन इन दोनों मुद्दों पर देश की जनता वोट देने नहीं जा रही है, क्योंकि उसके सामने ये मुद्दे नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार और महंगाई सबसे बड़े मुद्दे हैं. लोगों में कांग्रेस से नाराजगी धर्मनिरपेक्षता, वंशवाद, या कोई और मुद्दे को लेकर नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार को लेकर है. ठीक उसी तरह पॉपुलरिज्म या सेक्यूलरिज्म को लेकर लोग भाजपा की ओर नहीं जा रहे हैं, बल्कि कांग्रेस के भ्रष्टाचार की वजह से उधर या दूसरी पार्टियों की ओर जा रहे हैं. पूरा का पूरा आम चुनाव भ्रष्टाचार-महंगाई के मुद्दे पर होने जा रहा है. इसके बाद राजनीतिक परिवर्तन का मुद्दा है, जिसकी बुनियाद दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने रखी थी.
राजनीतिक परिवर्तन की शक्ल में हालांकि कुछ लोगों का ऐसा मानना है कि 2004 के आम चुनाव में भाजपा के ‘शाइनिंग इंडिया’ के खिलाफ जनता ने वोट किया था, तो इस बार कांग्रेस के ‘भारत निर्माण’ के खिलाफ लोग जा सकते हैं. लेकिन मेरा ऐसा मानना नहीं है, क्योंकि सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि राज्यों, शहरों, गांवों और क्षेत्रीय स्तर पर भी इस बार भ्रष्टाचार-महंगाई बड़े मुद्दे के रूप में लोगों के सामने हैं. इंडिया शाइनिंग या भारत निर्माण जैसी चीजें विज्ञापनों तक ही सीमित रहेंगी. इनका मतदाता पर कोई खास असर नहीं होनेवाला है.
इन मुद्दों के ऐतबार से मैं तो यही समझता हूं कि इस बार के आम चुनाव में मतदाताओं के बीच यह चुनौती होनी चाहिए कि वे मतदान में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लें. क्योंकि उन्हें भ्रष्टाचार और महंगाई से मुक्ति तथा राजनीतिक परिवर्तन चाहिए. इसलिए इस बार मतदान प्रतिशत बढ़ेगा. दूसरी बात यह है कि पहले के दौर में जितनी खराब मतदाता सूची होती थी, आज के दौर में उतनी खराब नहीं है. मसलन, ऐसे लोगों का नाम, जो अपने क्षेत्र में मौजूद नहीं होते थे, जिनके कारण मतदान प्रतिशत गिर जाता था. लेकिन अब ऐसा नहीं है. जो नहीं हैं, उनका नाम सूची से काफी हद तक काट दिया गया है. पहले बहुत से मतदाता मत बूथ तक जाते ही नहीं थे, लेकिन आज हर मतदाता राजनीतिक परिवर्तन के लिए उत्साहित नजर आता है. इसलिए मतदान प्रतिशत के बढ़ने की संभावना ज्यादा है. पिछले दिनों हुए कुछ राज्यों के चुनावों में यह नजर भी आया. खास कर ‘आप’ ने इस उत्साह को एक नया आयाम दिया है.
राजनीतिक परिवर्तन की लहर के बावजूद भी राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस और भाजपा के बीच ही मुकाबला होने की संभावना है. आम आदमी पार्टी का राष्ट्रीय स्तर पर उतना दखल नहीं है, इसलिए उससे कुछ ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ेगा. कुछ दलों का गठजोड़ (तीसरा मोरचा : हालांकि मैं इसे तीसरा मोरचा जैसी कोई चीज नहीं समझता) का प्रभाव कुछ राज्यों तक है, इसलिए इसका असर भी कुछ क्षेत्रों पर तो होगा, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर खास दखल नहीं होगा. दरअसल, हर राज्य में चुनावी संघर्ष अलग-अलग प्रकार का होता है, इसलिए राज्यों में प्रभावी क्षेत्रीय दलों के बीच मुकाबला तो हो सकता है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर अभी भी कांग्रेस और भाजपा आमने-सामने होंगे.
जिस ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ की मुहिम को लेकर ‘आप’ का गठन हुआ और देश को भ्रष्टाचार-मुक्त करने का आह्वान हुआ, जिसका फायदा उसे दिल्ली चुनाव में मिला. ऐसे में यदि ‘आप’ 10-12 या 15 सीटें भी लेकर आये, तो यह उसके लिए बड़ी उपलब्धि होगी. फिलहाल यह व्यापक बहस का विषय है, क्योंकि जब तक देश भर में ‘आप’ की मुहिम से सहानुभूति नहीं बढ़ेगी, तब तक उसके लिए मुश्किल है.
नरेंद्र मोदी भी युवाओं की बात करते हैं और ‘आप’ में भी ज्यादातर युवा ही हैं. लेकिन पिछले चुनावों में युवाओं की भागीदारी को देखते हैं, तो यही लगता है कि वे भी आम मतदाता की तरह बिखरे हुए हैं. इसलिए यह कहना मुश्किल है कि युवा भाजपा या आप की ओर ही जायेंगे. दिल्ली से बाहर युवाओं का झुकाव आप की ओर नहीं है, लेकिन वहीं राष्ट्रीय स्तर पर कुछ युवाओं का झुकाव भाजपा की ओर जरूर है. ऐसे में यह मुश्किल है कि इस बार युवाओं का रुख किसी एक ओर होगा.
‘आप’ के आने के बाद दूसरी पार्टियों पर दबाव बढ़ा है कि वे दागी उम्मीदवार न उतारें. इसलिए यह कहा जा सकता है कि 16वीं लोकसभा में दागियों की संख्या कुछ घट सकती है. चुनाव के बाद मतदाताओं की सबसे बड़ी अपेक्षा होगी भ्रष्टाचार पर लगाम के साथ एक स्थिर सरकार की. दूसरी बात है आर्थिक विकास की. महंगाई के इस दौर में बेरोजगारी बड़ी समस्या है, इसलिए देश चाहेगा कि यहां रोजगार बढ़ें. एक मतदाता के रूप में मैं भी चाहूंगा कि एक साफ-सुथरी सरकार बने, ताकि भारत भ्रष्टाचार-मुक्त बने. (वसीम अकरम से बातचीत पर आधारित)
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