फेसबुक : एक दिलचस्प सफर

मलंग लेखक टिप्पणीकार हैं फेसबुक पर गूगलीय ज्ञान से भरे योद्धाओं का ऐसा कब्जा हुआ कि तमाम जमे हुए लोग पानी मांगने लगे और एक बार तो इस माध्यम को ही खारिज करने पर तुल गये थे, क्योंकि उनकी एक पोस्ट से डेस्कटॉप क्रांतिकारी तमाम बातें सर्च मार कर निकाल लेते और सीधे उन लोगों […]
मलंग
लेखक टिप्पणीकार हैं
फेसबुक पर गूगलीय ज्ञान से भरे योद्धाओं का ऐसा कब्जा हुआ कि तमाम जमे हुए लोग पानी मांगने लगे और एक बार तो इस माध्यम को ही खारिज करने पर तुल गये थे, क्योंकि उनकी एक पोस्ट से डेस्कटॉप क्रांतिकारी तमाम बातें सर्च मार कर निकाल लेते और सीधे उन लोगों को चुनौती देने लगे जिनके केबिन में घुसने की हिम्मत कोई नहीं करता था.
इस तरह लिखंत-पढ़ंत का एक समाजवाद आया तो सही, लेकिन जल्दी ही वो आजम की भैंसों पर चढ़े समाजवाद का ही रूप हो गया. फेसबुक ने दस साल होने पर अपने यहां खट रहे सभी कामगारों की प्रोफाइलों को एक-डेढ़ मिनट का सिनेमा बनाने का मौका दिया. फटाफट भाई लोगों ने लांच की अपनी मूवी और दोस्तों के साथ शेयर किया. भाई, सबको अच्छा लगता है कि फ्लैशबैक चले और सब कुछ घूम के आ जायें, यादें हरी हो जाती हैं.
फेसबुक भारत में आया, तब यहां लोग ऑरकुट का इस्तेमाल सीख गये थे, इंटरनेट सुलभ हो गया था और एक नया मंच मिला था जहां अपने पुराने साथियों को खोज कर उनसे फिर से डिजिटल कनेक्शन बनाये जा रहे थे. लेकिन यह राजनैतिक बहसों का अखाड़ा और कवियों के उभरने का मंच नहीं बन पाया था. अधिकतर एक दूसरे को तसवीरें ही दिखायी जाती थीं और कुछ पुराने दिनों की बातें होती थीं. ऑरकुट सीख चुके लोगों को जब फेसबुक मिला तो दुनिया ही बदल गयी. अपन ने भी यूनिवर्सिटी के जमाने के चेहरों की तलाश शुरू की.
तमाम लोग मिलते चले गये. लगता था कि एक नायाब खजाना ही हाथ आ गया है. फिर बीएचयू जिनकी भी प्रोफाइल में था वो लोग फेसबुक सर्च में दिखने लगे और जितने भी नाम देश-दुनिया में सुने से लगे, सबसे कनेक्ट हो जाने की तलब लगती रही. पहला दौर तसवीरें अपलोड करना सीखने और दिखाने का रहा. यार कितने बदल गये, अच्छा बच्चे कितने हैं, कैसा चल रहा है इत्यादि. वो बातें जो कभी किसी पुराने दोस्त के मिल जाने पर होती हैं.
कुछ दोस्तों ने सबकुछ दिखा दिया, तो कुछ आजतक अपनी बीवियों की तसवीरें नहीं डाल पाते, क्योंकि उन्हें डर है कि तमाम लोग उनकी बीवियों को ‘लाइक’ करने लगेंगे. ऐसे लोग भी दोस्त बने जिनसे कैम्पस में संवाद सीमित ही रहा या कभी हुआ ही नहीं, तो कुछ ऐसे भी बने जिनके बारे में कुछ लोगों की राय थी कि बहुत बड़े ओहदे पर है और मिलने पर पहचानता ही नहीं. लेकिन फेसबुक पर वो मिले तो काफी सहज संवाद हुआ और कई तो बाद में कहीं मिले तो फेसबुक की पहचान के ही हवाले से सहजता से मिले.
शुरुआती सर्किल जल्दी ही बोर भी हो गया, क्योंकि कुछ तसवीरें देख ली गयीं, फिर हाल-चाल भी हो गया, अब आगे क्या? सभी अपने काम-धंधे में व्यस्त, केवल यही तो है नहीं जिंदगी में. हां, एक बदलाव ये भी आया कि हॉस्टल में भी जिसके ‘बड्डे’ का पता नहीं था उसे फेसबुक के हवाले से ‘हैप्पी बड्डे’ बोला जाने लगा. तमाम बुड्ढे लोगों ने यहां एक बड्डे में उतनी बधाइयां जुटा लीं जो पूरे जीवन में नहीं मिली होंगी.
शुरुआती समस्या भाषा की भी रही. ऑरकुट पर हिंदी थी, लेकिन यहां नहीं थी. लेकिन ये समस्या भी जल्दी ही दूर हो गयी. मित्रों के मित्रों के जरिये दोस्त बनने लगे और देश के नामी लोगों का फेसबुक पर सर्च शुरू हुआ खासकर वो लोग जो हिंदी में लिखते थे. खैर तभी फेसबुक पर आया दौर समूहों का यानी फेसबुक ग्रुप्स. अब इन ग्रुपों में जम कर बहस चलती थी, लेकिन चूंकि तब तक मोदी या ‘आप’ या किसी और का प्रकोप यूजर्स के दिमाग पर नहीं था इसलिए संवाद प्राय: ढंग से ही चलते थे.
फिर एडमिन कुछ ही दिनों में महत्वाकांक्षी होते गये, क्योंकि उनको ये भ्रम होता गया कि ग्रुप से किसी को निकालने का अधिकार उन्हीं के पास है इसलिए बहस कैसी चले और किस एजेंडे पर हो, ये भी वही तय करेंगे. इन समूहों में भी अनेक लोगों से दोस्ती हुई और कुछ ऐसे भी थे जो इन डिजिटल दोस्तियों को लेकर बेहद संजीदा हो गये थे और खासकर कोई महिला मित्र है तो उसके प्रोटेक्टर जैसा भी बरताव करते थे. कुछ पत्रकारों ने भी ग्रुप्स चलाने की कोशिश की, लेकिन वहां भी कुछ ही दिन में अहं आड़े आने लगे और मुद्दे की बात छोड़ भाई लोग किसी न किसी की धोती खोलने में भिड़ जाते थे.
हालांकि यहां जूते चलने की गुंजाइश नहीं थी, फिर भी जो कुछ चलाने लायक था, सब चलने लगा और समूहों से लोगों का मोहभंग शुरू हुआ. लेकिन तब तक सबकी फ्रेंडलिस्ट बढ़ती जा रही थी. कुछ लोगों के यहां तो रैलियां निकलनी शुरू हो गयी थीं और वो अधिकतम मित्र की सीमा पार करके अब ‘अनुयायी’ बनाने लगे थे. ऐसे लोगों में नये दौर के मठाधीश शामिल हैं. अच्छा है कि अब तक उन लोगों ने खुद को बहुत बदला है और उनके यहां संवाद की गुंजाइश है.
कुछ विदेशी समूहों से भी जुड़ाव हुआ, लेकिन वहां भी लगा कि जबरदस्त पूर्वग्रह हावी हैं. मानवाधिकारों के नाम पर सबके अपने-अपने एजेंडे तय हैं. वहां से जल्दी ही छुट्टी पा ली. हां, एक ग्रुप में किसी अमेरिकी ने मेरा जवाब रोमन हिंदी में लिख कर दिया और बताया कि ‘ओबामा सबसे बड़ा हरामी है’. आश्चर्य हुआ कि इसको हिंदी, वो भी गाली आती है, तब उसने बताया कि वो कभी इंग्लैंड की कुश्ती टीम का कोच था और कुछ ब्रिटिश पहलवान पंजाबी थे जिन्होंने उसे हिंदी-पंजाबी का ज्ञान दिया. फिर मैं भी उसका दोस्त बन गया.
व्यावसायिक कारणों से तमाम वर्कशॉप और सेमिनारों में जाना होता रहा है, जहां भी अनेक देशी-विदेशी मित्र बने. देश के कुछ ऐसे लोग भी मित्र बने जिनका फेसबुक पर काम ही केवल मित्र बनाना होता है और बहुत हुआ तो किसी मित्र का ही स्टेटस अपने नाम से चिपकाना होता है.
एक कार्यक्र म में मिली एक विदेशी कन्या जो एक बड़े संस्थान का मीडिया रिलेशन देखती है, अच्छी दोस्त बन गयी, प्राय: फेसबुक पर भी संवाद होता रहा. शादी के काफी बाद उसने अपनी एक तसवीर लगायी जिसमें अपने पति के साथ एक बोट से गोताखोरी के लिए तैयार थी. साफ दिख रहा था कि वो गर्भवती है.
मेरे एक कमेन्ट के बाद मेरे कुछ दोस्तों ने उसे नसीहत देने वाले कमेन्ट किये और फिर उसे फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दी. उसने मुङो मेसेज किया कि कैसे दोस्त हैं तुम्हारे जो कहीं से भी मुझसे कनेक्टेड नहीं हैं फिर भी नसीहत दे रहे हैं कि पेट में बच्चा हो तो ऐसा काम नहीं करना चाहिए और फिर मेरे दोस्त भी बनना चाहते हैं.
मायूसी से समझाना पड़ा कि ये आम हिंदुस्तानी बीमारी है, रिक्वेस्ट इग्नोर करो. हालांकि तबसे एक सबक ये भी मिला की यहां भी सुविधा है कि हम किससे और कैसे संवाद करें. यानी, सार्वजनिक संवाद की जगह अलग तरीका निकल ही गया.
आज फेसबुक कह रहा है कि भारत में यह मजबूत मीडिया के रूप में उभर रहा है. लेकिन बहुत पहले ही यहां इसकी घोषणा हो गयी थी जब एक तत्कालीन बड़े फेसबुक चिंतक ने अलग ही विमर्श शुरू किया था, जिसमें कारपोरेट मीडिया के बहिष्कार और अपने मीडिया को मजबूत करने की बात थी. उनकी बातों से प्रभावित होकर एक खास वर्ग के छात्रे जोश में आ गये थे. लेकिन एक दिन उनकी प्रोफाइल ही गायब हो गयी और यहां घोषणा होने लगी कि उनकी प्रोफाइल कारपोरेट मीडिया के दलालों ने हैक कर ली है.
कुछ दिनों बाद उनका फिर अवतरण हुआ और वो देश के एक बड़े कारपोरेट मीडिया हाउस में संपादकीय पद प्राप्त कर चुके थे. तब भी तमाम लोगों ने उनकी लानत-मलानत की. वहीं कुछ लोगों ने कहा कि ये सशक्तीकरण कुछ लोगों को पच नहीं रहा है. फिलहाल कारपोरेट मीडिया को डाउन करने के पुराने स्टैंड को छोड़, बाकी सब पर वो बहुत अच्छा लिख रहे हैं.
लुकबैक में एक चीज नहीं भूलती, लगता था कि साहित्य का फेसबुकीय स्वर्णकाल आ गया है. तमाम लोग की-बोर्ड तोड़ कर रचनाएं डालते थे और कई दिन तक वाह-वाह चलती. रचनाकार यदि महिला है तो कहना ही क्या, चार सेकेंड में चालीस लाइक आ जाते थे. उतनी देर में वो पोस्ट पूरी खुलती ही नहीं जितनी देर में लोग पसंद कर लेते थे.
कई बार तो ऐसा भी देखा कि किसी महान रचनाकार का माल किसी ने डाला और नीचे उसका नाम भी लिखने का एहसान कर दिया, तब भी तमाम लोग ‘सी मोर’ पर क्लिक न करके लोटने लग जाते थे कि कितना अच्छा लिखती हैं आप, न जाने कहां से ये हुनर आया है, आदि. कई बार किसी मशहूर कृति तक को अपने नाम से डालनेवाले कुछ लोग देखे, जिनको यदि बताओ कि लिखने वाले का नाम तो डाल दो, तो जवाब आता कि आप लोगों को चेक किया जा रहा था कि याद है कि नहीं. जबरदस्त दौर था, तुम मेरी पीठ खुजलाओ मैं तेरी खुजलाता हूं टाइप का.
लेकिन ऐसे धंधे में बरकत नहीं होती. फेसबुकिया हिंदी साहित्य पर कोई शोध लिखता, इससे पहले ही ये कला धूमिल होती गयी. अभी भी कहीं बची हो तो कह नहीं सकता क्योंकि मैंने ऐसे साहित्यकारों को ‘अमित्र’ कर दिया है.
फेसबुक पर एक और भ्रम टूटा कि लिखने के लिए पढ़ना भी पड़ता है. गूगलीय ज्ञान से भरे योद्धाओं का ऐसा कब्जा हुआ कि तमाम जमे हुए लोग पानी मांगने लगे और एक बार तो इस माध्यम को ही खारिज करने पर तुल गये थे, क्योंकि उनकी एक पोस्ट से डेस्कटॉप क्र ांतिकारी तमाम बातें सर्च मार कर निकाल लेते थे और सीधे उन लोगों को चुनौती देने लगे जिनके केबिन में घुसने की हिम्मत कोई नहीं करता था.
इस तरीके से लिखंत-पढ़ंत का एक समाजवाद आया तो सही, लेकिन जल्दी ही वो जनाब आजम की भैंसों पर चढ़ा समाजवाद का ही रूप हो गया. चालीस साल से जो एक ही चीज रट रहा हो उसके सामने गूगल से एक दिन पहले तक की जानकारी निकाल कर चमकायी जाने लगी. वैसे फेसबुक ने हमारी उस प्रवृत्ति को उभार दिया है कि कहीं भी घुस पड़ो, जो होगा देखा जायेगा.
लेकिन इन्हीं तमाम लंतरानियों के बीच कुछ ऐसे लोगों से भी संवाद हुआ जिनका होना मेरे लिए मायने रखता है, लेकिन फेसबुक न होता तो शायद ही कभी मिल पाते. एक हल्ला फेक आइडी वालों का भी चला, लेकिन उससे मुङो परहेज नहीं है. किसी के लिखे हुए से उसकी असलियत हमेशा सामने ही आये, जरूरी नहीं. इसलिए जितनी भी प्रोफाइल्स हैं उन सबके हवाले से आने वाली पोस्ट कैसी हैं, ये कनेक्ट होने का आधार है, न कि किसी की तसवीर या उसके होने का प्रमाणपत्र. क्योंकि जल्दी ही भगवान राम की तसवीर लगाकर भी मां-बहन की गालियां देनेवालों का भी दौर आ गया था और चे ग्वारा की फोटो लगा कर बहकी-बहकी बातें करने वाले भी थे.
एक ट्रेंड जिसका मैं शिकार हुआ कि खास तरह की पोस्ट या कमेन्ट के चलते किसी खास फिरकेवालों का कनेक्ट हो जाना और फिर अपने मनमाफिक पोस्ट न देख कर कभी वॉल पर और कभी इनबॉक्स में गालियां देने लग जाना. ये बहुत ही अजीब प्रजाति है. कभी किसी ने घोषणा कर दी की नयी सरकार के आते ही इटली भेज दिए जाओगे, तो कभी कोई कहता कि शर्म करो, हिंदू पैदा हुए हो.
किसी जनाब की शिकायत आती कि संघ का हिडेन एजेंडा बढ़ाने वाली पोस्ट क्यों करते हो तो कभी कुछ और. यानी फेसबुक पर भी गिरोहबंदी होने लगी और ‘व्हाट इज इन माई माइंड’ की जगह दोस्तों को लगने लगा कि उनके हिसाब से स्टेटस डालना चाहिए. ये फेसबुक पर नये युग का आगमन हो रहा था, यानि सेक्युलर-फेक्युलर और आप्युलर-पापुलर युग आ चुका था.
अब लगने लगा कि देश की राजनीति को दिशा देने वाले सभी लोग मेरे मित्र ही बन गये हैं. ई-चौपाल सीधे सीधे पॉलिटिक्स डील करने की ऊ चौपाल बन गयी जहां सब अपना-अपना भौकाल ही बनाने के चक्कर में लगे दिखने लगे. इस बीच में कुछ जरूरी सेटिंग्स भी बदलनी पड़ीं. जैसे कि परिवार को इस झुंड में अलग किया जाए, ताकि यहां-वहां फैले आत्मीय लोगों से संवाद अलग चलता रहे. एक आम फेसबुकिया के जीवन में बहुत कड़वाहट दिखने लगी, वो भी उन मुद्दों पर जिन पर उसने फेसबुक के आने के पहले शायद ही कभी इतनी शिद्दत से बात की हो.
इंटरनेट पर उपलब्ध तसवीरों से छेड़छाड़ करके नये प्रयोग भी दिखने लगे. शायद अब प्रेसीडेंट ओबामा को ही जुकरबर्ग से कहना पड़े, क्योंकि इस भारतीय कला के बारे में खबर बीबीसी पर भी आ गयी है.
हालांकि अमरीकी भी ये काम करते हैं, लेकिन वो उन तसवीरों को लेकर दंगे नहीं करते. न ही अपने नेता के लिए माहौल बनाये रखने और दूसरे को डाउन करने के लिए ऐसा गढ़ते हैं. क्रि एटिविटी बढ़ी है तो नकारात्मकता भी काफी ऊपर चढ़ी है. लेकिन, एकदम से फेक नहीं है ये फेसबुक, कुछ के चेहरे मेरे दिल में काफी अच्छे बने हुए हैं, उम्मीद है कि वो बने ही रहेंगे. आमीन!
(गपागप डॉट कॉम से साभार)
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