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कद्दू कटेगा, कटेगा ना

Updated at : 18 Nov 2019 6:02 AM (IST)
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कद्दू कटेगा, कटेगा ना

आलोक पुराणिक वरिष्ठ व्यंग्यकार puranica@gmail.com जहां-जहां गठबंधन सरकारें बनने का डौल जमता है, वहां यही बातें सुनायी देती हैं- कद्दू कटेगा, तो सबमें बंटेगा. उस राज्य में एक पार्टी के नेता लगभग रोते हुए कह रहे हैं- हाय किसान, उई किसान, रे किसान, चुनाव परिणाम आने के बाद बीस दिन के बाद तक 29 किसानों […]

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आलोक पुराणिक
वरिष्ठ व्यंग्यकार
puranica@gmail.com
जहां-जहां गठबंधन सरकारें बनने का डौल जमता है, वहां यही बातें सुनायी देती हैं- कद्दू कटेगा, तो सबमें बंटेगा. उस राज्य में एक पार्टी के नेता लगभग रोते हुए कह रहे हैं- हाय किसान, उई किसान, रे किसान, चुनाव परिणाम आने के बाद बीस दिन के बाद तक 29 किसानों की आत्महत्या की खबर आ गयी है
यह खबर ना आयी पक्के तौर पर कि एक स्थायी सरकार बन गयी है, जो ना सिर्फ बन गयी है, बल्कि कायदे से चलेगी भी. किसानों-खेती पर जो नेता रो रहा था, वो मर्सीडीज में बैठ कर रिसोर्ट चला गया- सरकार उगाने. खेती, किसानी, सरोकार, मजदूर, छात्र जाने क्या बातें हो रही हैं- सुनायी यही दे रहा है- कद्दू कटेगा, तो सबमें बंटेगा. वो कैसे ले लेगा वित्त मंत्रालय, वित्त की सबसे ज्यादा जरूरत तो मुझे है. और वो कैसे लेगा उद्योग मंत्रालय, उद्योग तो मैंने किये हैं सबसे ज्यादा सरकार बनाने का. तेरा विधानसभाध्यक्ष होगा.
एक काम करो, तीन विधानसभाध्यक्ष बना देते हैं, तीनों के ही रहेंगे विधानसभाध्यक्ष. यूं ना कर सकते कि हम 244 विधानसभाध्यक्ष बना दें. ना जी, 244 विधानसभाध्यक्ष ना हो सकते संविधान के हिसाब से. एक ही हो सकता है.
चलो एक से काम चलाओ. कद्दू कटेगा तो सबमें बंटेगा. कद्दू तो कटता रहेगा, अभी तो जनता ही कटती दिखती है. वोट दिये, पर सरकार ना मिली. सरकार कद्दू विमर्श में उलझी है. सरकार बन जाये, पर कद्दू विमर्श खत्म ना होना का. कद्दू का जो हिस्सा उसे मिला है, वह ज्यादा बड़ा है, मुझे उतना बड़ा हिस्सा ना मिला. कद्दू विमर्श चालू है, चालू रहेगा.
शरद पवार ने कहा कि महाराष्ट्र में सरकार मजबूती से बने और चले, इसके लिए जरूरी है उनकी कांग्रेस और शिवसेना के अलावा कांग्रेस भी सरकार में शामिल हो. शरद पवार चाहें, तो और मजबूत बनाने के लिए सरकार में भाजपा को भी शामिल कर लें. सरकार मजबूत हो जायेगी. ओ नो, फिर विपक्ष में कौन बचेगा!
विपक्ष में जनता बचेगी, खुद देख लेगी अपना. वैसे मुंबई का जो हाल हर साल होता है बारिश में, उसे देख कर लगता है कि वहां ना सरकार है, ना विपक्ष है. सब मस्त रहते हैं, जनता डूबती मरती है. विपक्ष कुछ ना करता, सरकार तो कुछ ही ना करती. लोकतंत्र की यह परमहंसवाली स्थिति है, सरकार भी निकम्मी, विपक्ष भी निकम्मा. जनता ही कुछ करती है, सो कर देती है, जनता डूब सकती है. नालियों में गिर सकती है. और जनता क्या करे!
बाकी नेतागण तो इधर किसानों-खेती की चिंता करते हुए सरकार उगाने निकल लेते हैं. सरकार की उगाई भी आसान काम नहीं है. तमाम तरह के पदों के आकर्षण के बीज डालो, आफरों से सिंचाई करो, फिर भी फसल ना फूटती.
वो कहते हैं उनसे बात करेंगे, उन उन से बात करेंगे. बात करेंगे और डर भी लगा रहता है कि सिर्फ बातें ही ना होती रहें. घणी सरोकारी बातें हो रही हैं, पर सुनायी यही दे रहा है-कद्दू कटेगा, तो सबमें बंटेगा. पर मूल सवाल वही है- कद्दू ढंग से कट जायेगा ना?
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