जच्चा-बच्चा की बेहतरी

Updated at : 31 Oct 2019 6:20 AM (IST)
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जच्चा-बच्चा की बेहतरी

माताओं व शिशुओं के स्वास्थ्य की स्थिति में सुधार तथा उनकी मृत्यु दर को कम करना हमारे देश की स्वास्थ्य सेवा के सामने सबसे बड़ी चुनौती रही है. संतोष की बात है कि सामुदायिक स्तर पर चलाये जा रहे स्वास्थ्य कार्यक्रमों के कारण इस मोर्चे पर सकारात्मक प्रगति हो रही है. कनाडा के मेडिकल एसोसिएशन […]

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माताओं व शिशुओं के स्वास्थ्य की स्थिति में सुधार तथा उनकी मृत्यु दर को कम करना हमारे देश की स्वास्थ्य सेवा के सामने सबसे बड़ी चुनौती रही है. संतोष की बात है कि सामुदायिक स्तर पर चलाये जा रहे स्वास्थ्य कार्यक्रमों के कारण इस मोर्चे पर सकारात्मक प्रगति हो रही है.
कनाडा के मेडिकल एसोसिएशन जर्नल की रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत के अनेक हिस्सों में जच्चा-बच्चा को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिल रही हैं. कुछ समय पहले प्रकाशित यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन के साझा अध्ययन के अनुसार, 2018 में पांच साल से कम आयु के एक लाख बच्चों में 37 की मौत हुई थी, जबकि 1990 में यह अनुपात 126 मौतों का था यानी हर साल ऐसी मौतों में औसतन 3.5 प्रतिशत की कमी हुई है. नवजात शिशुओं की मृत्यु दर भी घटी है.
वर्ष 1990 के एक लाख शिशुओं में से 57 की मृत्यु का आंकड़ा 2018 में 23 पर आ गया है. विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, 1990 में मातृ मृत्यु दर एक लाख में 556 थी, जो 2015 में 174 पर आ गयी. इस अनुपात में भी निरंतर कमी हो रही है. लेकिन अभी बहुत कुछ करना शेष है. कनाडाई जर्नल ने स्वास्थ्य सेवाओं की विषमता को रेखांकित किया है. प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों और स्वास्थ्यकर्मियों की कमी तथा गांवों से अस्पतालों की दूरी तथा चिकित्सा पर खर्च जैसी समस्याओं के साथ सामुदायिक कार्यक्रमों को सक्षम बनाने एवं उनका विस्तार करने पर समुचित ध्यान का अभाव चिंताजनक है.
इन अवरोधों के कारण आज भी बड़ी संख्या में माताओं एवं बच्चों की जान जा रही है. यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में जानकारी दी गयी है कि 2018 में पांच साल से कम आयु के 8.82 लाख बच्चों तथा पांच से पंद्रह साल के 1.43 लाख बच्चों की मौत हुई थी. गर्भावस्था के दौरान और शिशु के जन्म के समय पैदा हुईं परेशानियों के कारण पिछले साल 5.49 लाख माताओं की जान गयी थी. पांच साल के कम उम्र के अधिकतर बच्चे जन्म के समय की समस्याओं, मलेरिया, निमोनिया, दस्त, सेप्सिस आदि ऐसे कारणों से मर जाते हैं, जिनका निवारण या उपचार संभव है.
हर पांच साल में इस श्रेणी के 60 हजार बच्चे उन बीमारियों का शिकार हो जाते हैं, जिन्हें टीकाकरण से रोका जा सकता है. वर्तमान सरकार की विभिन्न स्वास्थ्य पहलों के साथ स्वच्छ भारत अभियान तथा व्यापक टीकाकरण कार्यक्रम पर जोर देने से स्थिति में तेजी से सुधार की उम्मीद है. स्वास्थ्य सुविधाओं की वंचना सबसे अधिक ग्रामीण क्षेत्रों में है. इस पहलू पर भी ध्यान देते हुए योजनाएं बनायी गयी हैं. मातृ व शिशु मृत्यु दर को घटाने के लिए 2030 तक सौ अरब डॉलर खर्च करने का लक्ष्य रखा गया है.
गांवों में पेयजल आपूर्ति और इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने के लिए बड़े निवेश को मंजूरी दी गयी है. बुनियादी सुविधाओं और देख-रेख के अभाव में किसी माता और बच्चे की मौत नहीं होनी चाहिए, क्योंकि उनका स्वास्थ्य ही हमारे समृद्ध व विकसित भविष्य का आधार है.
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