जन्म के 200 वर्ष : विद्यासागर पर हर भारतवासी को है नाज

Updated at : 26 Sep 2019 6:57 AM (IST)
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जन्म के 200 वर्ष : विद्यासागर पर हर भारतवासी को है नाज

शंकर राय सेवानिवृत इंजीनियर delhi@prabhatkhabar.in गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- पूर्ण विकास के लिए ज्ञान-कर्म-योग-भक्ति का सम्मिलन जरूरी है. ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने अपने जीवन में ये चार योग सम्मलित किये थे. उनके व्यक्तित्व के बारे में वरिष्ठ कवि माइकल मधुसूदन दत्ता लिखते हैं- विद्यासागर में भारतीय मुनि-ऋषियों का ज्ञान, अंग्रेज राजपुरुष की कर्मशक्ति […]

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शंकर राय
सेवानिवृत इंजीनियर
delhi@prabhatkhabar.in
गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- पूर्ण विकास के लिए ज्ञान-कर्म-योग-भक्ति का सम्मिलन जरूरी है. ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने अपने जीवन में ये चार योग सम्मलित किये थे. उनके व्यक्तित्व के बारे में वरिष्ठ कवि माइकल मधुसूदन दत्ता लिखते हैं- विद्यासागर में भारतीय मुनि-ऋषियों का ज्ञान, अंग्रेज राजपुरुष की कर्मशक्ति और भारतीय मां की करुणा-दया-ममता का मिलन था. रबींद्रनाथ टैगोर लिखते हैं-
विद्यासागर का था अपराजेय पौरुष-अक्षय मनुष्यत्व.
श्री अरविंद ने कहा था कि विद्यासागर एक ऋषि, बौद्धिक क्षमता से युक्त एक विद्वान थे, जिन्होंने टाइटन की तरह एक नये बंगाली भाषा और एक नये समाज का निर्माण किया. वहीं सिस्टर निवेदिता कहती हैं- विवेकानंद ने कहा था कि रामकृष्ण के बाद उनके हृदय में जो दूसरा श्रद्धा का स्थान है, वह विद्यासागर के लिए है. देश के लिए वंदे मातरम् मंत्र देनेवाले ऋृषि बंकिमचंद्र चटर्जी की नजर में देश के महान समाज संस्कारक शिक्षाविद् थे पंडित ईश्वर चंद्र विद्यासागर.
वर्ष 1820 में 26 सितंबर को बंगाल के मेदनीपुर में जन्में ईश्वर चंद्र का बचपन बहुत गरीबी में बीता. जब कमाने लगे, तो मां से कहा कि मेरी इच्छा है कि मैं आपको तीन गहना बनवा दूं. उनकी मां बोलीं कि तीन गहने की मेरी भी इच्छा है.
वे गहने हैं- गांव में एक नि:शुल्क विद्यालय, एक नि:शुल्क दवाखाना और गरीबों के लिए नि:शुल्क भोजन. मां की इन तीनों इच्छाओं को विद्यासागर ने पूरा किया. यही थी उनकी मात‍ृ-वंदना. यही है असली भक्ति. उनकी मां ने एक बार चिट्ठी लिखी थी कि दुर्गा पूजा में जब देश आना, तो कंबल ले आना. पिछले साल सर्दियों में गरीब लोगों को बहुत कष्ट हुआ था. धन्य है यह मां और धन्य है उनका लाल.
उनके जन्मस्थान मेदिनीपुर से कलकत्ता करीब 70 मील दूर है. अपने पिता ठाकुरदास बंद्योपाध्याय के हाथ पकड़े बालक ईश्वर चंद्र पैदल आते-जाते रास्ते में मील के पत्थरों पर लिखी अंग्रेजी की संख्या देखकर अंग्रेजी की गिनती सीख गये. वे खाना पकाते थे और सबको परोसने के बाद ही स्कूल जाते थे और शाम को भी सबको खिलाकर रास्ते की स्ट्रीट लाइट के नीचे खड़े होकर दो-तीन घंटे पढ़ते थे. स्कूल में हमेशा प्रथम आते थे. साल 1840 में ईश्वर चंद्र को विद्यासागर की उपाधि मिली, उसके बाद अगले 30-35 साल तक उन्होंने शिक्षा और समाज सुधार में व्यापक काम किये.
नारी की दुखावस्था, उसकी असहायता-अपमान उनको रुलाती थी. नारी शिक्षा और विधवा बालिका विवाह, बहुविवाह जैसे समाज सुधार के क्षेत्र में जान खतरे में डालकर भी काम किये. विद्यासागर के प्रयास से 26 जुलाई, 1856 में विधवा विवाह कानून पास हो गया. उसके पहले ही 3 दिसंबर, 1829 को राजा राममोहन राय ने सती प्रथा बंद कराने का कानून पास कराये थे.
साल 1857 में कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा में विद्यासागर की अहम भूमिका थी. अंग्रेज गवर्नर उनका आदर करते थे. उस समय बंगाल बिहार के साथ उड़ीसा से भी जुड़ा हुआ था. उनके प्रयास से पटना डिवीजन में करीब 17 स्कूल और भागलपुर डिवीजन में 15 स्कूल और कटक डिवीजन में 18 स्कूल खुला.
ईश्वर चंद्र हिंदी भाषा की काफी कद्र करते थे. उनका देवनागरी में लेख इतना सुंदर और आकर्षक होता था कि संस्कृत कॉलेज में उन्हें इसके लिए 8 रुपये का पुरस्कार मिला था.
आधुनिक हिंदी भाषा के जनक भारतेंदु हरिश्चंद्र के साथ उनका हार्दिक संपर्क रहा. भारतेंदु के काशी स्थित मकान में विद्यासागर गये थे. भारतेंदु की नजर में विद्यासागर दया निधान परमगुण सागर थे. विद्यासागर हमेशा किराये के मकान में रहे. वे संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी और बांग्ला की किताबें खरीदते थे और पढ़ते थे. उनके पास सोलह हजार से अधिक किताबें थीं. उन किताबों के रख-रखाव के लिए कलकत्ता के बादुर बगान में एक मंजिला मकान बनाया गया.
जिंदगी के आखिरी 20-22 साल उन्होंने झारखंड के करमाटांड़ गांव में बिताया. कलकत्ता से आदिवासी लोगों के लिए होमियोपैथी दवा, कपड़ा आदि लेकर करमाटांड़ गांव जाते थे. उन लोगों को कॉलरा, मलेरिया होने पर घर जाकर सेवा का काम करते थे.
इस बूढ़े बाबा को संथाल आदिवासियों ने अपने हृदय में बसा लिया था. वर्ष 1888 में विद्यासागर की पत्नी का देहांत हो गया. इसके तीन साल बाद कलकत्ता में 70 वर्ष 10 महीना 3 दिन की आयु बिताकर विद्यासागर भी स्वर्गधाम को चल बसे. महान विद्यासागर पर हर भारतवासी को हमेशा नाज रहेगा.
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