विनोबा भावे की दृष्टि में हिंदी
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :23 Sep 2019 1:51 AM (IST)
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योगेंद्र यादव अध्यक्ष, स्वराज इंडिया yyopinion@gmail.com भला हो अमित शाह का, जिन्होंने विनोबा को फिर से पढ़वा दिया. हिंदी की प्रकृति और राष्ट्र निर्माण में हिंदी की भूमिका के बारे में इतनी मानीखेज बात और कौन कह सकता था? अगर आज के संदर्भ में उनकी बात नहीं सुनेंगे, तो भला कब सुनेंगे? इस साल मैंने […]
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योगेंद्र यादव
अध्यक्ष, स्वराज इंडिया
yyopinion@gmail.com
भला हो अमित शाह का, जिन्होंने विनोबा को फिर से पढ़वा दिया. हिंदी की प्रकृति और राष्ट्र निर्माण में हिंदी की भूमिका के बारे में इतनी मानीखेज बात और कौन कह सकता था? अगर आज के संदर्भ में उनकी बात नहीं सुनेंगे, तो भला कब सुनेंगे?
इस साल मैंने सोचा था कि हिंदी दिवस पर कोई लेख नहीं लिखूंगा. न हिंदी दिवस की रस्म बदलती है, न हिंदी की दुर्दशा. इसलिए इस बार मौन रखने की ठानी थी. लेकिन, इस बार गृह मंत्री अमित शाह का बयान आ गया. उनके बयान पर प्रतिक्रिया आनी शुरू हो गयी. मुझे भी उनके भाषण पर त्वरित प्रतिक्रिया देनी पड़ी.
गृह मंत्री की कई बातों से मैं सहमत था. हमें अपनी भाषाओं का सम्मान करना चाहिए, कि भारत विविध भाषाओं का देश है, कि हम अपनी भाषाओं को समृद्ध नहीं करेंगे तो हमारी राष्ट्रीय चेतना विकसित नहीं होगी, कि सांस्कृतिक हीनताबोध हमारे राष्ट्रीय चेतना के विकास में बाधक है. मुझे उनकी ये सारी बातें भा गयीं कि कोई गैर-हिंदी भाषी व्यक्ति इतना बढ़-चढ़कर हिंदी की वकालत कर रहा था.
गृह मंत्री की इस बुनियादी बात से मैं सहमत नहीं हो पाया कि राष्ट्रीय एकता के लिए एक भाषा की जरूरत है और यह काम केवल हिंदी कर सकती है.
यूरोप के देशों में यह धारणा रही है कि एक भाषा के बिना राष्ट्र नहीं बन सकता. लेकिन, भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने इस धारणा को खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि भारत की राष्ट्रीय एकता भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को स्वीकार करके ही बनेगी. अनेकता में एकता के फॉर्मूले की शुरुआत भाषाई अनेकता में राष्ट्रीय एकता से हुई थी. इसीलिए हमारे संविधान में ‘राष्ट्रभाषा’ शब्द का इस्तेमाल कहीं नहीं किया गया. और हिंदी को ‘राजभाषा’ का दर्जा दिया गया था. वैसे भी, हिंदी थोपना भारतीय राष्ट्रवाद और हमारे संविधान की भावना के विरुद्ध है.
गृह मंत्री ने कहा कि हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाएं यूरोप की हर भाषा से श्रेष्ठ हैं. लेकिन ऐसा मानने का क्या आधार है, यह नहीं बताया. सुषमा स्वराज के हवाले से उन्होंने यह दावा किया कि हिंदी बोलनेवालों की संख्या पूरे विश्व में 20 प्रतिशत है. मुझे कहीं भी 5-6 प्रतिशत से अधिक आंकड़ा नहीं मिला. उन्होंने राम मनोहर लोहिया के नाम यह उक्ति दर्ज की की ‘हिंदी के बिना लोकराज संभव नहीं है’. जबकि लोहिया ने कहा था कि ‘लोकभाषा के बिना लोकराज संभव नहीं है’.
मुद्दे की बात यह है कि गृह मंत्री ने संत विनोबा भावे को याद किया और उनके हिंदी प्रेम का हवाला दिया. आज की पीढ़ी में विनोबा को याद करनेवाले कम लोग हैं.
महात्मा गांधी के प्रिय शिष्य और एक मायने में उनके आध्यात्मिक उत्तराधिकारी विनोबा भावे अक्सर भूदान आंदोलन के कारण याद किये जाते हैं. अधिकतर लोग भूल गये हैं कि राजनीति और सामाजिक परिवर्तन में मग्न रहनेवाला यह संत अनेक भाषाओं का प्रकांड पंडित भी था. अपनी मातृभाषा मराठी के साथ-साथ भारतीय संविधान में सूचीबद्ध सभी 14 भाषाओं पर उनकी पकड़ थी. वे अंग्रेजी, फारसी और अरबी के ज्ञाता भी थे.
मंत्रीजी ने विनोबा का यह वाक्य उद्धृत किया- ‘मेरे देश में हिंदी की अवमानना हो, यह मैं सहन नहीं कर सकता’. बात सही है. विनोबा ने कही थी.
लेकिन उसका संदर्भ हिंदी को अन्य भारतीय भाषाओं से श्रेष्ठ बताना नहीं था. विनोबा का संदर्भ था अंग्रेजी का वर्चस्व और उसके सामने हिंदी का अनादर, जो उन्हें असहनीय था. विनोबा चाहते थे कि राष्ट्र-निर्माण में हिंदी एक विशेष भूमिका अदा करे, लेकिन उनकी समझ और आज हिंदी की वकालत करनेवालों की समझ में अंतर है.
विनोबा कहते हैं कि हिंदी न तो तमिल जितनी पुरानी है, न ही कन्नड़ जैसी समर्थ है और न ही संस्कृत की तरह शब्द संपन्न. विनोबा हिंदी को देश की सबसे सरल और सुगम भाषा भी नहीं मानते, क्योंकि इसमें लिंग-भेद का लफड़ा है. उनकी नजर में हिंदी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह भाषा सबसे कम तकलीफ देती है और सबसे अधिक सहन करती है. यानी इसको आप आसानी से तोड़-मरोड़ सकते हैं. हिंदी का खिचड़ी स्वरूप हिंदी की सबसे बड़ी विशेषता है.
हिंदी की विशिष्टता के बारे में विनोबा की दृष्टि के सभी हिंदीवादियों के लिए दो सबक हैं. पहला, हिंदी बाकी सब भाषाओं के सामने झुक कर ही एक विशिष्ट भूमिका अदा कर सकती है, कानून या डंडे के जोर पर अपनी विशिष्टता का एहसास करवाकर नहीं. हिंदी को थोपने की कोशिश हुई, तो उससे संविधान और राष्ट्रीय एकता का ही नहीं, बल्कि खुद हिंदी का ही नुकसान होगा. दूसरा सबक यह है कि हिंदी को विस्तार के लिए पवित्रता का आग्रह छोड़ना होगा.
विनोबा ने समझाया कि अगर हिंदी नदी की तरह पवित्र निर्मल और सिर्फ दो छोर के बीच ही बनी रहना चाहती है, तो वह केवल एक क्षेत्रीय भाषा बनकर रह जायेगी. लेकिन, अगर हिंदी पूरे देश की भाषा बनना चाहती है, तो उसे सब तरह के भाषाई आग्रहों को आत्मसात करना होगा. कुछ ऐसी ही बात गांधीजी हिंदुस्तानी भाषा के बारे में कहते थे.
अगर विनोबा भावे को अच्छी तरह से पूरा पढ़ लिया जाये, तो शायद यह समझ में आ जाये कि हिंदी भारत के जनमानस की एक भाषा बन सकती है, लेकिन उस अर्थ में राष्ट्रभाषा नहीं बन सकती, जैसी जर्मनी के लिए जर्मन या फ्रांस के लिए फ्रेंच है.
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