संदर्भ : पत्नी-बच्‍चों की हत्या बूढ़ी मां को अलग कर देने का, असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा

Updated at : 26 Apr 2019 8:15 AM (IST)
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संदर्भ : पत्नी-बच्‍चों की हत्या बूढ़ी मां को अलग कर देने का, असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा

अनुज कुमार सिन्हा चुनाव के माहाैल में दाे बड़ी खबरें दब गयी हैं. दाेनाें घटनाएं झारखंड से जुड़ी हैं आैर समाज में व्याप्त असंवेदनशीलता-निराशा काे दर्शाती हैं. पहली घटना है : जमशेदपुर का एक युवक नाैकरी खत्म हाेने के बाद अपनी पत्नी आैर तीन बच्चाें की हत्या कर भाग जाता है. दूसरी घटना है धनबाद […]

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अनुज कुमार सिन्हा

चुनाव के माहाैल में दाे बड़ी खबरें दब गयी हैं. दाेनाें घटनाएं झारखंड से जुड़ी हैं आैर समाज में व्याप्त असंवेदनशीलता-निराशा काे दर्शाती हैं. पहली घटना है : जमशेदपुर का एक युवक नाैकरी खत्म हाेने के बाद अपनी पत्नी आैर तीन बच्चाें की हत्या कर भाग जाता है. दूसरी घटना है धनबाद की. बेटा-बहू ऊपर की मंजिल पर रहते हैं, बूढ़ी मां नीचे के तल्ले में अकेले. बेटे आैर बहू काे दाे दिन बाद मां की माैत का तब पता चलता है, जब शव का गंध फैलता है. दाेनाें घटनाएं समाज काे बेचैन करनेवाली हैं.

ठीक है एक युवक की नाैकरी चली गयी. वह इंजीनियर था. स्वाभाविक है तनाव रहेगा ही. परेशानी हाेगी. इसी तनाव में अपने तीन बच्चाें आैर पत्नी की हत्या कर भाग जाना बड़ा अपराध है. बड़ी कायरता है. सच कहें ताे यह पागलपन है. पहले यह आशंका थी कि उस युवक ने शायद खुद भी आत्महत्या कर ली हाे. लेकिन उसने ऐसा नहीं किया.

वह पकड़ा गया. इन मासूम बच्चाें का क्या दाेष था? उसकी पत्नी का क्या दाेष था? पिता ताे वह हाेता है, जाे कठिन से कठिन समय में भी हिम्मत नहीं हारता, अाफत-निराशा काे बच्चाें पर फटकने नहीं देता. यहां ताे उलटा ही कर दिया इस कलयुगी बाप ने. उसने जिंदगी ही ले ली.

देश में हर साल लाखाें लाेगाें की नाैकरी खत्म हाेती है. वे फिर नयी नाैकरी खाेजते हैं. विकल्प तलाशते हैं. विकल्प मिलता भी है. काम करनेवाला, शरीर चलानेवाला भूखा नहीं मर सकता. पैसा कमाने के लिए काम ताे करना हाेगा. सवाल है-अपने परिवार का सफाया कर वह युवक क्या संदेश देना चाहता है? यह कायरता है.

अगर एक नाैकरी जाने पर हर व्यक्ति निराश हाे कर जान देने या जान लेने लगे ताे चाराें आेर अराजकता दिखेगी, शायद ही काेई परिवार इससे बचेगा. दुनिया ऐसे कायराें, जिम्मेवारी से भागनेवालाें काे याद नहीं करती है बल्कि काेसती है. समाज में लाखाें ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं, जब पति की माैत के बाद पत्नी ने संघर्ष कर, मजदूरी कर, काेई दुकान खाेल कर अपने बच्चाें काे पढ़ा-लिखा कर बेहतर इंसान बनाया है. खुशी के दिन लाैटे हैं. ऐसे लाेग दूसराें के लिए उदाहरण हाेते हैं. मेहनत का काेई विकल्प नहीं हाेता. अगर उस युवक ने धैर्य रखा हाेता, दिखावा छाेड़ कर अपने परिवार के पालन के लिए ईमानदारी से प्रयास करता, ताे यह नाैबत नहीं आती.

रास्ता निकालना पड़ता है. हाे सकता है कि वह युवक फिजूलखर्ची का आदी हाे. नशा करता हाे (संभावना). एक कहावत है-जितनी चादर है, उतना ही पांव फैलायें. अगर आमद कम है ताे खर्च भी उसी अनुसार करें. लेकिन आज के अधिकतर युवक चकाचाैंध की दुनिया में जीते हैं. ऐसी घटनाआें का एक बड़ा कारण यह भी है.

ठीक है किसी की नाैकरी चली गयी. किसी छात्र का परीक्षा में नंबर कम आ गया. काेई प्रतियाेगी परीक्षा में पास नहीं हाे सका. पैसे के अभाव में शादी टूट गयी. ताे इसका अर्थ यह नहीं है कि जान दे दें.

जान देने (यहां ताे पूरे परिवार का खात्मा ही कर दिया) से समस्या का हल नहीं निकलता. मानसिक ताैर पर मजबूत बनना पड़ता है. आज परेशानी है ताे कल बेहतर दिन आयेगा ही. रात के बाद दिन आैर दिन के बाद रात, यही प्रकृति का नियम है.

परेशानी पर काबू पाना हाेगा आैर यह संभव हाेगा संकल्प, आत्मविश्वास आैर कड़ी मेहनत के बल पर. समाज के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि इन सभी चीजाें की कमी दिख रही है. नाैकरी लगी नहीं कि कार चाहिए, फ्लैट चाहिए या महंगी बाइक. बड़े-बड़े रेस्टाेरेंट में पार्टी. इच्छाआें पर नियंत्रण नहीं हाेने से ऐसी घटनाएं घटती रहेंगी.

दूसरी घटना जाे धनबाद में घटी, वह बताती है कि कैसे परिवार टूट रहा है आैर उसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. जिस मां ने जन्म दिया, बुढ़ापे में उसे ही अलग कर दिया. भारतीय संस्कृति ताे ऐसा पाठ नहीं पढ़ाती. हमारे देश का इतिहास ताे श्रवण कुमार जैसे बेटे का रहा है,जहां मां-पिता काे भगवान का दर्जा मिला हुआ है. धनबाद में उस बेटे की पिता की माैत हाे गयी थी. बूढ़ी मां अकेले नीचे तल्ले मेें रहती थी.

कारण ताे वह परिवार ही बता सकता है. लेकिन स्थिति यह थी कि जब मन किया, शरीर ने साथ दिया, खुद खाना बनाती थी, वरना भूखे साे जाती थी. बेटे आैर बहू उसी घर के ऊपर तल्ले पर आराम से रहते थे. मां ने खाना खाया या नहीं, किस हाल में है, काेई पूछता नहीं था. बूढ़ी मां चल बसी, किसी काे कष्ट नहीं दिया, बुलाया नहीं. बुलाती भी किसे? यह घटना बताती है कि कैसे हमारे समाज में अब मां-बाप काे कुछ लाेग बाेझ समझने लगे हैं.

उस बूढ़ी मां की बेटियां बाहर रहती थीं. साथ रहने काे कहती थी लेकिन मां यह कहते हुए इनकार कर देती कि बेटी के घर रहने से दुनिया क्या कहेगी. काश वह बेटी के पास चली जाती. पारिवारिक कलह की घटनाएं आजकल बढ़ी हैं आैर नयी पीढ़ी के कुछ लाेग खुद काे, पत्नी काे आैर अपने बच्चाें तक काे ही अपना परिवार मान ले रहे हैं. मां-बाप, भाई-बहन तभी याद आते हैं जब काेई परेशानी आती है.

वक्त है संभल जाने का, ऐसी घटनाआें से सबक लेने का. जाे बाे रहे हैं, वही काटेंगे, यही प्रकृति की नियम है. आज आपने अपने मां-बाप के साथ पराये जैसा व्यवहार किया है, कल आपके बच्चे आपके साथ ऐसा ही कर सकते हैं, क्याेेंकि आपके बच्चाें ने ऐसा ही देखा है. बेहतर है परिवार के महत्व काे समझें, ताकत काे समझें. यह परिवार ही है जाे संकट के दाैर में भी आपके साथ खड़ा रहेगा आैर उस संकट से निकाल लेगा.

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