जानलेवा बुखारों का कहर
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 08 Feb 2019 7:24 AM
साल के पहले पांच सप्ताहों में ही देश में स्वाइन फ्लू के 6,701 मामले सामने आये हैं. इस बीमारी से अब तक 226 मौतें ही चुकी हैं. इसी अवधि में पिछले साल इससे सिर्फ 798 लोग बीमार हुए थे और मृतकों की संख्या 68 रही थी, लेकिन पूरे साल में करीब 15 हजार लोग इस […]
साल के पहले पांच सप्ताहों में ही देश में स्वाइन फ्लू के 6,701 मामले सामने आये हैं. इस बीमारी से अब तक 226 मौतें ही चुकी हैं. इसी अवधि में पिछले साल इससे सिर्फ 798 लोग बीमार हुए थे और मृतकों की संख्या 68 रही थी, लेकिन पूरे साल में करीब 15 हजार लोग इस फ्लू की चपेट में आये थे और मरनेवालों की संख्या 1,103 रही थी.
हालांकि, पीड़ित देश के कई राज्यों में हैं, पर फिलहाल राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा और पंजाब सर्वाधिक प्रभावित हैं. चूंकि फ्लू का असर एक साल के अंतराल पर कम या ज्यादा होता रहता है, तो अनुमान यह है कि इस साल मरीजों की तादाद बहुत बढ़ सकती है.
इसमें एक कारण जाड़े के मौसम का लंबा होना भी है. मौसम गर्म होने के साथ शायद स्वाइन फ्लू के विषाणुओं का कहर कम होने की उम्मीद की जा रही है. दिल्ली में डेंगू का एक मामला भी सामने आया है. हालांकि, राजधानी में मलेरिया और चिकनगुनिया से अभी कोई पीड़ित नहीं है, पर आगामी दिनों में दिल्ली और अन्य राज्यों में इनके असर से इनकार नहीं किया जा सकता है.
इस संबंध में कुछ बातों को रेखांकित करना जरूरी है. मौतों में कमी यह इंगित करती है कि बीते अनुभवों के आधार पर स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों में उपचार बेहतर हुआ है. इसका दूसरा पहलू यह है कि मृतकों में ज्यादातर वैसे लोग हैं, जिन्हें पहले से सांस-संबंधी बीमारियां, रक्तचाप और मधुमेह की शिकायत थी. यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि ऐसी बीमारियों में प्रदूषण एक बड़ा कारण है तथा हमारे शहरों में वायु एवं जल प्रदूषण लगातार बढ़ता जा रहा है.
इस कारण दवाओं का असर कम होता है और अन्य बीमारियां फ्लू को अधिक घातक बना देती हैं. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय राज्यों के साथ निरंतर संवाद कर मौसमी बुखारों की स्थिति पर नजर रख रही है. स्वाइन फ्लू समेत अन्य मौसमी बुखार दुनिया में हर साल 30 से 50 लाख लोगों को ग्रसित करते हैं तथा तीन से साढ़े छह लाख लोग अकाल मृत्यु के शिकार होते हैं. अन्य जगहों की तरह हमारे यहां भी एक मुश्किल है कि रोगाणुओं का कहर साल के अलग-अलग महीनों में अलग-अलग जगहों पर बरपा होता है.
इस हिसाब से ही टीकाकरण और उपचार के इंतजाम होने चाहिए. रोगाणुओं के सक्रिय होने में मौसम और लोगों की स्वास्थ्य की दशा की अहम भूमिका होती है, तो इन बीमारियों का सामना करने की चुनौती को अलग से न देखकर स्वास्थ्य सेवा की व्यापक तैयारी के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए. देश के उत्तरी और उत्तर-पश्चिमी इलाकों में स्वाइन फ्लू और अन्य रोगाणुजन्य बुखारों से ज्यादा लोग बीमार होते हैं.
इन राज्यों में उपचार की पुख्ता व्यवस्था करने के साथ आम लोगों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत स्वास्थ्यकर्मियों को जागरूक बनाने की कोशिशें भी लगातार होनी चाहिए, क्योंकि एक तरह के बुखार के बाद दूसरे तरह की बीमारी आन खड़ी होती है.
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