सर्दी की आहट

क्षमा शर्मा वरिष्ठ पत्रकार kshamasharma1@gmail.com जैसे कोई दरवाजे की घंटी बजाकर चला जाये या कुंडी खड़काये, उसके होने का एहसास तो हो, मगर वह दिखायी न दे, इन दिनों सर्दी की आहट कुछ ऐसे ही सुनायी दे रही है. सबेरे-शाम कब धीरे चलता पंखा भी बंद करने का मन करेगा, तो कब गर्मी से पसीना […]
क्षमा शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार
kshamasharma1@gmail.com
जैसे कोई दरवाजे की घंटी बजाकर चला जाये या कुंडी खड़काये, उसके होने का एहसास तो हो, मगर वह दिखायी न दे, इन दिनों सर्दी की आहट कुछ ऐसे ही सुनायी दे रही है.
सबेरे-शाम कब धीरे चलता पंखा भी बंद करने का मन करेगा, तो कब गर्मी से पसीना छूटेगा. बाहर का छाया अंधेरा देखकर लगता है कि शायद रात के आठ बज गये होंगे, मगर अरे अभी तो छह ही बजे हैं.
सूरज का सवेरे देर से आना और शाम को जल्दी जाना अच्छा नहीं लगता. गोधूलि ने भी अपना समय बदल लिया है. चिड़ियां अपने घरों को जल्दी लौटने लगी हैं. सवेरे उनकी चहचहाहट कम सुनायी देती है. वे भी तो सर्दी से निबटने के इंतजाम में लगी होंगी.
इस मौसम में फल-फूल भी खूब दिखने लगे हैं. बाजार में ठेले भर-भरकर मूंगफलियां बिक रही हैं. गजक, रेवड़ी, शकरकंद और गुड़ भी आ पहुंचा है. सरसों का साग भी दिखायी देने लगा है, यानी कि दुकानों में मक्के और बाजरे का आटा भी मिल रहा होगा. अब तारों पर रजाई, कंबल, स्वेटर भी सूख रहे हैं.
पहले सितंबर के महीने से ही दुकानों में स्वेटर के लिए सलाइयां और रंग-बिरंगे ऊन सज जाते थे. जब से रेडीमेड कपड़ों का चलन बढ़ा है, बाजार से ऊन ही नहीं गायब हुआ, बल्कि महिलाओं के हाथों से भी गायब हो गया है. हाथ से बुने तरह-तरह के डिजाइनदार स्वेटर अब बहुत कम दिखते हैं.
जहां अलाव जल सकते हैं, वहां उन्हें जलाने का इंतजाम भी किया जा रहा है. खेतों में पराली जलाने की सूचना आ रही है, यानी कि किसान नयी फसल के लिये अपने-अपने खेतों में तैयारी कर रहे हैं.
खेतों में पराली जलाकर किसान खेतों में मौजूद कीड़े-मकोड़ों से निजात पाते थे. लेकिन, अब कहा जाता है कि पराली के कारण प्रदूषण बढ़ता है, हवा की गुणवत्ता खराब होती है और शहरों में धुएं के कारण लोगों का दम घुटने लगता है. दशहरे से लेकर दिवाली तक चलनेवाले पटाखे भी प्रदूषण में बढ़ोतरी करते हैं.
जिन्हें अपने यहां चिल्ला जाड़ा कहते थे, जिनमें दांत किटकिटाते हैं, वे अब मैदानी इलाकों में बहुत कम पड़ते हैं. इसका कारण ग्लोबल वार्मिंग को बताया जाता है. बहुत बार तो ऐसा भी होता है कि पूरी सर्दिंयां कंबल ओढ़ने से ही निकल जाती हैं, रजाई ओढ़ने की नौबत तक नहीं आती.
सर्दी का सच यह भी है कि बिना घर-बार के लोग खुले में सोने पर मजबूर होते हैं. गाड़ियों के टायर जलाकर वे जगते हुए, पूरी रात काट देते हैं. सोने की कोशिश भी करें, तो आसमान के नीचे नींद नहीं आती. बहुत से लोग जान भी गंवा देते हैं.
जिनके पास सब कुछ है, सर्दी से निबटने के अच्छे इंतजाम हैं, वे सर्दी कम पड़ने से परेशान होते हैं. मगर, जिनके सिर पर छत नहीं, वे कम सर्दी को वरदान की तरह देखते हैं. कम-से-कम ठिठुरन और सर्दीजनित रोगों से बचते हैं.
अक्तूबर जाने को है और जब सर्दी आने-आने को है, तो ऐसे लोगों के जीवन के बारे में भी सोचना चाहिए कि कैसे इन्हें खुले में सोना न पड़े. ये भी ठीक से जी सकें.
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