जिंदगी और पॉलिटिक्स

Updated at : 05 Oct 2018 7:40 AM (IST)
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जिंदगी और पॉलिटिक्स

मुकुल श्रीवास्तव टिप्पणीकार sri.mukul@gmail.com देश में चुनाव का मौसम आनेवाला है. हम जब कार्यस्थल या रिश्तों में फंस जाते हैं, तो बस बेसाख्ता मुंह से निकल जाता है बहुत पॉलिटिक्स है. राजनीति इतना बुरा शब्द भी नहीं है, जितना हम समझते हैं. देश के चुनाव का मौसम पांच साल में एक बार आता है, जब […]

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मुकुल श्रीवास्तव
टिप्पणीकार
sri.mukul@gmail.com
देश में चुनाव का मौसम आनेवाला है. हम जब कार्यस्थल या रिश्तों में फंस जाते हैं, तो बस बेसाख्ता मुंह से निकल जाता है बहुत पॉलिटिक्स है. राजनीति इतना बुरा शब्द भी नहीं है, जितना हम समझते हैं.
देश के चुनाव का मौसम पांच साल में एक बार आता है, जब हम अपनी पसंद से किसी को वोट देते हैं. कभी किसी को जिताने के लिए और कभी-कभी किसी को हराने के लिए, भाई यही तो पॉलीटिक्स है. यानी सारा खेल बस इसी पसंद का है कि हम जिस तरह का देश-समाज चाहते हैं, वैसे ही लोग चुनकर आएं. जब ऐसा नहीं होता है, तो शुरू होता है द्वंद्व. लेकिन, जब बात जिंदगी की होती है, तो पसंद का मामला और भी महत्वपूर्ण हो जाता है.
जिंदगी कोई देश नहीं है कि एक बार अपनी पसंद बता दी और पांच साल की छुट्टी. यहां तो हर वक्त पॉलिटिक्स है. हम सभी अपनी जिंदगी को बेहतर बनाना चाहते हैं.
यह तभी हो सकता है, जब देश और समाज अच्छा होगा. यहां तक तो ठीक है, पर जब बात जिंदगी और रिश्तों की होती है और चीजें हमारे हिसाब से नहीं होती, तब एक और तरह का द्वंद्व शुरू होता है. तब परिस्थितियों का सामना करने की बजाय ‘बहुत पॉलिटिक्स है’ कहकर हम समस्याओं से भागने लग जाते हैं.
जब रिश्ते की राजनीति में फंसें, तो पहले यह तय कीजिए कि आप क्या चाहते हैं और उसी तरह से निर्णय लीजिए. अपनी जिंदगी के पन्ने पलटिए, थोड़ा पीछे मुड़कर देखिए कि आप जिंदगी में सफल या असफल क्यों हुए. अगर आप सफल रहे हैं, तो आपने फैसले सही किये. अगर आप लगातार असफल हो रहे हैं, तो जिंदगी की पॉलिटिक्स यही कहती है कि आप भ्रम के शिकार हैं. जिंदगी और रिश्तों को लेकर आपका नजरिया स्पष्ट नहीं है. जैसे देश के चुनाव में हम भ्रम का शिकार होकर गलत प्रत्याशी को वोट देते हैं, वैसे ही जिंदगी और रिश्तों में गलत फैसले लेकर अपने आप को परेशानी में फंसा लेते हैं.
चुनाव के वक्त बहुत से दल दावा करते हैं कि उनके आते ही विकास की गंगा बहने लगेगी. अब इन पर भरोसा कर लेते हैं, तो आप जिंदगी और रिश्तों के बारे में समझते नहीं हैं. इतना तो आप मानते हैं कि दोस्ती या रिश्ते एकदम से क्लोज नहीं होते. रिश्तों को पकने में वक्त लगता है और इसके पीछे आपके द्वारा लिए गये निर्णय जिम्मेदार होते हैं. उसी तरह से देश में बदलाव एक झटके में नहीं हो सकता है.
समस्या का समाधान तो तभी होगा, जब हम उनके बारे में सोचेंगे. आपने कभी सोचा है कि बचपन का वह दोस्त, जो आपको सबसे प्यारा लगता था, आज उससे बात करने पर वह मजा नहीं आता. क्योंकि आपने अपनी प्राथमिकताएं बदल ली हैं.
आज आपको उसकी उतनी जरूरत नहीं, क्योंकि आपका जीवन आगे बढ़ चला है. बात देश की हो या अपनी-अपनी जिंदगी की पॉलिटिक्स की, सारा खेल पसंद का है. जैसे देश आपसे वोट की उम्मीद करता है, जिंदगी और रिश्ते भी उम्मीद करते हैं. देश का वोट उंगली पर लगी स्याही से दिखता है. जिंदगी और रिश्तों का वोट प्यार के रूप में दिखता है.
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