मराठा आरक्षण की पेचीदगियां

Updated at : 01 Aug 2018 11:48 PM (IST)
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मराठा आरक्षण की पेचीदगियां

अनुराग चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार anuragshama@gmail.com एक वर्ष से भी ज्यादा समय तक शांतिपूर्ण रहे मराठा आरक्षण आंदोलन के अचानक हिंसक और ‘बलिदानी’ हो जाने के पीछे महाराष्ट्र की सोलह प्रतिशत मराठा समुदाय में व्याप्त निराशा और राजनीतिक अकेलापन बतौर कारण दिख रहा है और मराठा शीर्ष नेतृत्व यह कह रहा है कि इस समस्या का […]

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अनुराग चतुर्वेदी

वरिष्ठ पत्रकार

anuragshama@gmail.com

एक वर्ष से भी ज्यादा समय तक शांतिपूर्ण रहे मराठा आरक्षण आंदोलन के अचानक हिंसक और ‘बलिदानी’ हो जाने के पीछे महाराष्ट्र की सोलह प्रतिशत मराठा समुदाय में व्याप्त निराशा और राजनीतिक अकेलापन बतौर कारण दिख रहा है और मराठा शीर्ष नेतृत्व यह कह रहा है कि इस समस्या का निदान संविधान संशोधन में है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण का प्रतिशत निश्चित किया हुआ है, जो पचास प्रतिशत से अधिक नहीं है. मराठा युवकों में बेरोजगारी भयंकर रूप से फैली हुई है.

कई वर्षों तक महाराष्ट्र और मराठा एक-दूसरे के पर्याय हो चुके थे. कांग्रेस राष्ट्रवादी का नेतृत्व महाराष्ट्र में अब्दुर्रहमान अंतले, सुधाकर राव नाईक (बंजारा समुदाय) को मुख्यमंत्री बनाने की ‘हिम्मत’ दिखा चुके हैं, पर शिवसेना-भाजपा ने ब्राह्मण मुख्यमंत्री के रूप में पहले मनोहर जोशी और फिर भाजपा ने नागपुर के देवेंद्र फड़नवीस को मुख्यमंत्री बनाया.

मराठा आरक्षण क्या आर्थिक आधार पर होगा? क्या सामाजिक आधार ही आरक्षण का आधार है, यह बहस बाबा साहेब आंबेडकर के नाती और दलितों के नेता प्रकाश आंबेडकर ने छेड़ी है.

दलित और पिछड़े समुदाय भी इस बात को लेकर चिंतित हैं कि मराठा समुदाय कहीं उनके हिस्से पर कब्जा न कर ले. बंजारा समुदाय की भाजपा मंत्री पंकजा मुंडे ने कहा कि यदि उन्हें एक घंटे के लिए महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बना दिया जाये, तो वे मराठा आरक्षण की फाईल पर हस्ताक्षर कर देंगी. इस पर प्रकाश आंबेडकर ने कहा है, ‘यह चिक्की खरीद की फाईल नहीं है, यह संविधान से जुड़ा मसला है’. शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने भी यह मांग की है कि पंकजा को मुख्यमंत्री बना दिया जाना चाहिए.

किसी को आरक्षण देना इतना आसान नहीं है, इसमें कई कानूनी पेंचीदगिया हैं. इंदिरा साहनी केस (1992), जिसे मंडल निर्णय के रूप में जाना जाता है, में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया था कि संविधान की धारा 16 के अंतर्गत नौकरियों और शिक्षा में 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण नहीं दिया जायेगा. महाराष्ट्र में इस समय 52 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है. यदि 16 प्रतिशत आरक्षण मराठों को दिया जाता है, तो यह बढ़कर 68 प्रतिशत हो जायेगा.

मराठा युवकों की बैचेनी देखिये. एक युवक काका साहेब दत्तात्रेय शिंदे (28 वर्ष) ने जल समाधि ले ली. नवी मुंबई में पुलिस लाठीचार्ज के बाद एक युवक मारा गया. एक युवक प्रमोद होरे पाटिल (31 वर्ष ) ने फेसबुक पर घोषणा कर रेल के सामने कटकर आत्महत्या की ली. पहले दौर में अहमद नगर, औरंगाबाद और दूसरे दौर में मुंबई, ठाणे, पुणे और कोल्हापुर में हिंसा हुई. महाराष्ट्र सरकार इस आंदोलन से इतनी घबरा गयी कि उसने कुछ कदम तत्काल उठाये. पहला, पिछड़े वर्ग के अध्यक्ष की नियुक्ति की, जो पिछले कई माह से रिक्त था. सर्वदलीय बैठक बुलायी और अब संभव है विधानसभा का विशेष सत्र भी बुलाया जाये.

मराठा जाति महाराष्ट्र की एक कृषि प्रधान जाति है, जो राजनीतिक दबदबा रखती है, जैसे उत्तर भारत में जाट और राजपूत या गुजरात में पटेल रखते हैं. महाराष्ट्र में 52 कुलीन मराठा परिवार हैं, जिन्हें विकास की राजनीतिक रोशनी का लाभ मिला है. कृषि की अनिश्चितता, कृषि से होनेवाले लाभ में कमी ने मराठा युवकों के मन में सरकारी नौकरियों के प्रति आकर्षण पैदा किया, जो बहुत सीमा तक मजबूरी के कारण बना है.

महाराष्ट्र में आबादी का 33 प्रतिशत मराठों का है. अभी तक मराठा आबादी आरक्षण को हेय नजर से देखती थी. औरंगाबाद में विश्वविद्यालय के नाम पर पैदा हुआ विवाद हो या फिर आरक्षण में मंडल जातयों को शामिल किया जाना हो, मराठाओं का सामाजिक स्थान काफी अनुदारवादी था, पर धीरे-धीरे ज्यादातर मराठा समुदाय संपन्नता और सत्ता से दूर हो गया. महाराष्ट्र में सत्ता परिवर्तन के कारण मराठा समुदाय की असली शक्ति सहकारी समितियों के आर्थिक व्यवहार पर जबदस्त मार पड़ी. यही कारण रहा कि मराठाें में रोजगार, संपन्नता और पद की गरिमा कुछ ही ‘कुलीनों’ के हाथ में रह गयी.

मराठा राजनेताओं के पास शिक्षा, शक्कर और सहकारिता का तिलिस्म पिछले चार वर्षों में टूट गया, लेकिन जिस शालीनता और गरिमा से महाराष्ट्र के ग्रामीण और कस्बों में मराठा आरक्षण आंदोलन चला, उससे उसको राजनीतिक समर्थन मिला.

मराठा समुदाय को कोई राजनीतिक दल नाराज नहीं करना चाहता है, लेकिन कानूनी प्रावधान है कि 16 प्रतिशत आरक्षण कोई भी अदालत मंजूर नहीं करेगी. ऐसी स्थिति में लोकसभा में बहुमत हासिल की हुई भाजपा को संसद में संविधान की धाराओं में परिवर्तन करना होगा.

यह संविधान बदलाव इतना आसान नहीं, क्योंकि दलित-पिछड़े वर्ग अपने अधिकारों के लिए सजग हो, सड़क पर उतरने को तैयार हैं. गुर्जर, जाट, पटेल समुदाय भी आशा भरी निगाह से मराठा आंदोलन की परिणति को देख रहे हैं, क्योंकि संविधान में भावी बदलाव उन्हें भी आरक्षण देने का रास्ता खोलेगा.

संविधान में बदलाव की रणनीति का सबसे अधिक फायदा शरद पवार को होगा. लेकिन, असल सवाल है कि क्या राजनीतिक-सामाजिक शक्तियां यह होने देंगी?

क्या यह आंदोलन और हिंसक होकर अपने रास्ते से भटक तो नहीं जायेगा, क्योंकि महाराष्ट्र के गांवों तक यह आग फैल चुकी है? महत्वपूर्ण है कि चुनावी वर्ष में मराठा आरक्षण आंदोलन अपने निर्णायक मंजिल की ओर पहुंचने की कोशिश में है.

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