सर्वज्ञों की सोहबत

Updated at : 13 Jul 2018 7:39 AM (IST)
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सर्वज्ञों की सोहबत

सुरेश कांत वरिष्ठ व्यंग्यकार सब जानते हैं कि कोई भी आदमी सब-कुछ नहीं जान सकता, फिर भी कुछ लोग होते हैं जो सतत यह साबित करने में लगे रहते हैं कि वे सब-कुछ जानते हैं. सौभाग्य से मुझे बचपन से ही ऐसे सर्वज्ञों की काफी सोहबत मिली है. गर्मी की छुट्टियों में जब मैं गांव […]

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सुरेश कांत

वरिष्ठ व्यंग्यकार

सब जानते हैं कि कोई भी आदमी सब-कुछ नहीं जान सकता, फिर भी कुछ लोग होते हैं जो सतत यह साबित करने में लगे रहते हैं कि वे सब-कुछ जानते हैं. सौभाग्य से मुझे बचपन से ही ऐसे सर्वज्ञों की काफी सोहबत मिली है.

गर्मी की छुट्टियों में जब मैं गांव जाता था और वहां लोगों को शहर की अचरजभरी बातें सुनाता था, तो बाकी लोग तो गौर से सब सुनते और हैरान होने की रस्म भी अदा करते, पर गांव के एक ताऊ यह कहते हुए कि ‘यह कौन-सी बड़ी बात है!’

कोई उससे भी ज्यादा अजीब किस्सा सुनाकर महफिल लूट लेते. पचासेक साल पहले मेरे यह बताने पर कि शहर में अब नाई के पास जाकर उस्तरे से दाढ़ी बनवाने के बजाय शेविंग मशीन से घर पर ही दाढ़ी बना ली जाती है, उन्होंने कहा था कि इसमें कौन-सी बड़ी बात है, विलायत में तो यहां तक तरक्की हो गयी है कि आदमी मशीन में सिर घुसाता है और जब निकालता है, तो उसके सिर और दाढ़ी के बाल कटे होते हैं.

बड़ा हुआ, तो पड़ोस में ही एक सर्वज्ञ जी की सोहबत हासिल हो गयी. ‘केशव केसन अस करी, जस अरिहू न कराहि, चंद्रवदनी मृगलोचनी बाबा कहि-कहि जाहि’ लिखनेवाले केशवदास की ‘रामचंद्रिका’ के अनुसार, जो कि उन्होंने तुलसीदास की ‘रामचरितमानस’ की काट में रात-भर में ही लिख डाली थी, परशुराम के यह पूछने पर कि उनके आराध्य शिव का धनुष किसने तोड़ा, संबंधित पात्र द्वारा ‘रा…’ कहे जाते ही, यह समझकर कि रावण ने शिवजी का धनुष तोड़ा है, वे उसे खरी-खोटी सुनाने लगते हैं, जिसमें खरी कम होती है और खोटी ज्यादा, क्योंकि रावण ने तो शिवजी का धनुष तोड़ा ही नहीं होता. ठीक उसी तर्ज पर मेरे वे पड़ोसी भी मेरे मुंह से ‘म’ निकलते ही यह समझकर कि मैं मच्छर कहनेवाला हूं, एक ही सांस में मच्छरों की सारी किस्मों और उनके आचार-व्यवहार का पूरा ब्योरा दे डालते.

जैसे यह कि ‘…अफ्रीका के जंगलों में एक मच्छर ऐसा भी पाया जाता है, जो काटने के बाद आंसू बहाता है, जैसे मगरमच्छ अपने शिकार को निगलने के बाद बहाया करता है और इसका श्रेय उसे देने के लिए कायदे से मगरमच्छ के आंसुओं को मगरमच्छर के आंसू कहा जाना चाहिए.

एक दूसरे किस्म का मच्छर काटने से पहले ठुमरी का आलाप लेता है. हो न हो, प्रसिद्ध कथाकार ‘रेणु’ ने अपनी पुस्तक ‘ठुमरी’ ऐसे ही किसी मच्छर द्वारा काटे जाने के बाद लिखी होगी.’

उनके इन किस्सों को मच्छर भी उनके गाल पर बैठकर बहुत दिलचस्पी से सुनते थे और ऐसे ही एक अवसर पर भाव-विह्वल होकर एक मच्छर ने उन्हें ऐसा काटा था कि वे कई दिनों तक अस्पताल में पड़े रहे थे.

बहुत दिनों बाद अब जाकर मुझे उनकी टक्कर का सर्वज्ञ मिला है और सौभाग्य से सिर्फ मुझे ही नहीं मिला, बल्कि हर देशवासी को मिला है. आप कहेंगे, कौन है वह, तो लीजिए, हिंट देता हूं- अलग-अलग शताब्दियों में पैदा हुए कबीर, गोरखनाथ और गुरु नानक द्वारा मगहर में मिलकर चाय पर चर्चा!

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