सोचो, अगर सांड़ छत पर चढ़ जाये..

।। सत्य प्रकाश चौधरी ।। प्रभात खबर, रांची रुसवा साहब वैसे तो शायर हैं, पर एक जमाने में उन्होंने सहाफत भी की थी. मजबूरी में. हुआ यूं था कि वह सपाट लहजे में खड़ी शायरी करते थे. सीधी, पर गहरी. मुशायरों में खूब दाद पाते थे. मेहनताना भी अच्छा मिलता था. कुल मिला कर जिंदगी […]
।। सत्य प्रकाश चौधरी ।।
प्रभात खबर, रांची
रुसवा साहब वैसे तो शायर हैं, पर एक जमाने में उन्होंने सहाफत भी की थी. मजबूरी में. हुआ यूं था कि वह सपाट लहजे में खड़ी शायरी करते थे. सीधी, पर गहरी. मुशायरों में खूब दाद पाते थे. मेहनताना भी अच्छा मिलता था. कुल मिला कर जिंदगी ठीकठाक चल रही थी. लेकिन, वक्त बदला, लोग बदले और मुशायरे भी बदल गये. कला से ज्यादा गला चलने लगा.
शायर खड़ा हुआ नहीं कि ‘तरन्नुम में.. तरन्नुम में’ का शोर मचने लगता. बस यहीं मात खा गये बेसुरे रुसवा साहब. उन्होंने मुशायरे छोड़ कर अपनी नज्में छपवानी शुरू कर दीं. मुशायरे से कम से कम दाल-रोटी चल जाती थी (तब दाल का वर्गीय चरित्र नहीं बदला था), मगर प्रकाशक की रॉयल्टी से चायवाले की उधारी भरनी भी मुश्किल थी (तब राजू चायवाला सिर्फ चायवाला हुआ करता था, ‘नमो टी स्टॉल’ का मालिक नहीं). मन मार कर उन्होंने एक उर्दू अखबार पकड़ लिया जहां उन्होंने दिया बहुत-बहुत ज्यादा और लिया बहुत-बहुत कम.
वह अखबार में टिक तो पाये कम ही दिन, पर पत्रकारिता की रग-रग से वाकिफ हो गये. तब से लेकर आज तक, पप्पू पनवाड़ी की दुकान पर जब भी मिलते हैं, पत्रकारिता के अपने ज्ञान की पुड़िया किसी न किसी बहाने सरकाना नहीं भूलते. आज सुबह भी उन्होंने यही किया. मगही का जोड़ा दबाया और बोले, ‘‘सोचो, अगर कोई सांड़ किसी छत पर चढ़ जाये तो?’’ मैंने कहा, ‘‘यह तो खबर है!’’ वह यूं मुस्कराये मानो उन्हें मालूम हो कि मैं यही जवाब दूंगा. फिर पूछा, ‘‘कितनी बड़ी?’’ मैंने कहा, ‘‘यह तो इस पर है कि आप टीवी में हैं या अखबार में. अगर अखबार में हैं तो 10 लाइन. बड़ा लिक्खाड़ होगा तो 20-30 लाइनें लिख देगा. लेकिन, टीवी के लिए दिन भर का मसाला है.
चार कैमरे लगाओ और बीच-बीच में आनेवाले खालीपन को भरने के लिए दो रिपोर्टर लगाओ जो कुछ भी अल्ल-बल्ल बोल कर समां बांधे रहें. फिर पूरा चैनल मौज में. कोई दूसरी खबर ढूंढ़ने की जहमत नहीं. ‘सांड़ लाइव’ से ही दिन कट जायेगा.’’ रुसवा साहब की मुस्कान और गहरी हो गयी, बोले- ‘‘रह गये न वही जिसमें रखा जाता है दही. किस जमाने में हो मियां? तुम अपने ही अखबार को ले लो, मेरा दावा है कि तीन पन्नोंसे कम नहीं छापेगा. एक पन्ने में दिनभर का घटनाक्रम. सांड़ कितने बज कर कितने मिनट पर कहां था, पूरी तफसील से बताओगे. वहां लगे मजमे का ब्योरा पेश करोगे. दूसरे पन्नोंमें कम से कम चार पशु-विशेषज्ञों से ‘खास’ बातचीत होगी. इससे पहले सांड़ कहां-कहां छत पर चढ़ चुका है, इसके लिए पांच आदमी पूरा इंटरनेट खंगाल डालेंगे. तीसरे पन्नोंमें फोटो फीचर. अलग-अलग कोणों से सांड़ की इतनी तसवीरें कि दीपिका पादुकोण का फोटो सेशन भी फीका लगे.’’ रुसवा साहब की बात सोलहों आने सही थी. हर दिन, कोई न कोई ‘सांड़’ टीवी से निकलता है और अखबारों के पन्नों पर गोबर करता चला जाता है.
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