केंद्र में नयी सरकार की चुनौतियां

Published at :13 May 2014 4:52 AM (IST)
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केंद्र में नयी सरकार की चुनौतियां

डॉ भरत झुनझुनवाला अर्थशास्त्री बीते दशक में हाइवे, बंदरगाह, एयरपोर्ट एवं रेल इत्यादि में सरकारी निवेश में भारी कटौती हुई. निजी कंपनियों के इन क्षेत्रों में प्रवेश का स्वागत है, लेकिन जहां निजी कंपनियां प्रवेश नहीं कर रही हैं, वहां सरकारी निवेश जारी रहना चाहिए. हमारे नेताओं ने सत्ता पर काबिज रहने का विशेष फामरूला […]

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डॉ भरत झुनझुनवाला

अर्थशास्त्री

बीते दशक में हाइवे, बंदरगाह, एयरपोर्ट एवं रेल इत्यादि में सरकारी निवेश में भारी कटौती हुई. निजी कंपनियों के इन क्षेत्रों में प्रवेश का स्वागत है, लेकिन जहां निजी कंपनियां प्रवेश नहीं कर रही हैं, वहां सरकारी निवेश जारी रहना चाहिए.

हमारे नेताओं ने सत्ता पर काबिज रहने का विशेष फामरूला निकाला था. देश को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के द्वारा लूटे जाने के लिए खोल दिया गया. सोच थी कि इन कंपनियों से टैक्स वसूल कर गरीब को राहत पहुंचायी जायेगी. मनरेगा, सस्ता अनाज और ऋण माफी जैसे कार्यक्रम चलाये जायेंगे. यह मॉडल अब ध्वस्त होता दिख रहा है. दो समस्याएं उत्पन्न हो गयी हैं. पहली समस्या है कि बड़ी कंपनियों और नेताओं द्वारा लूटे जाने से अर्थव्यवस्था मंद पड़ रही है.

नेताओं की सोच थी कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लूटने की छूट देंगे, तो विदेशी निवेश बड़ी मात्र में आता रहेगा. पूंजी की यह आवक अर्थव्यवस्था से हो रहे रिसाव को ढक लेगी, जैसे घाटे में चल रही कंपनी की खस्ता हालत लोन से मिली रकम से ढक जाती है. परंतु यह खेल ज्यादा समय नहीं चलता है. शीघ्र ही नये लोन मिलना बंद हो जाते हैं और कंपनी का दीवाला निकल जाता है. इसी प्रकार अंदर से खोखली हो रही अर्थव्यवस्था को विदेशी निवेश मिलना कम हो गया है. इससे अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ रही है.

दूसरी समस्या जनचेतना की जागृति से उत्पन्न हो रही है. नेताओं की सोच थी कि गरीब को राहत देकर उसे लगातार बांधे रखा जा सकेगा. ऐसा नहीं हो सका है. वह देखता है कि वह सुबह दूध बेचने निकलता है और शाम तक मशक्कत करके मात्र 300 रुपये कमा पाता है, जबकि सरकारी कार्यालय में कर्मी गपशप में दिन काट देते हैं और हजारों रुपये कमाते हैं. वह चाहता है कि देश की समृद्धि में उसका भी हिस्सा बने. उसके लिए उत्पादन के अवसर ज्यादा महत्वपूर्ण हो गये हैं. यही कारण है कि वोटर कह रहा है कि सड़क दीजिए और पीडब्ल्यूडी के भ्रष्टाचार को बंद कीजिए. इस प्रकार लूट तथा राहत का मॉडल फेल हो गया है.

आनेवाले समय के प्रति मैं उत्साहित हूं. पूरे देश की चेतना जागृत होती दिख रही है. मेरे गांव में गरीब मनरेगा में नहीं जाना चाहते हैं, क्योंकि दिहाड़ी देर से मिलती है और बाजार में वेतन भी अच्छे हैं. लोग समझ रहे हैं कि जाति, धर्म और बीपीएल के माध्यम से हमें भिड़ाया जा रहा है. आज मांग उठने लगी है कि जाति आधारित आरक्षण समाप्त किये जायें. आनेवाले समय में धर्म और बीपीएल आधारित कार्यक्रमों के विरुद्ध भी आवाजें उठेंगी, ऐसा मेरा अनुमान है.

अभी हमारे सामने चार बड़ी चुनौतियां हैं. पहली चुनौती भ्रष्टाचार और सुशासन की है. जरूरी है कि लोकपाल, सीएजी, सीइसी, सीवीसी, सीबीआइ के निदेशक एवं उच्च न्यायालयों के जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया में सरकारी दखल को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाये. इन पदों पर नियुक्ति के कॉलेजियम में वरिष्ठतम शंकराचार्य, सबसे बड़ी ट्रेड यूनियन के अध्यक्ष, वरिष्ठतम अजरुन पुरस्कार विजेता जैसे व्यक्तियों को नियुक्त किया जाना चाहिए. ऐसा करने से ईमानदार व्यक्तियों की संवैधानिक पदों पर नियुक्ति होने की संभावना बढ़ जायेगी.

दूसरी चुनौती बेरोजगारी और असमानता की है. आज देश में करीब एक चौथाई युवा बेरोजगार हैं. मनरेगा से इस समस्या का समाधान नहीं होगा. जरूरत है कि चिह्नित श्रम सघन क्षेत्रों में बड़ी कंपनियों पर भारी टैक्स लगा दिया जाये. जैसे टेक्सटाइल मिलों पर भारी टैक्स लगा दिया जाये, तो हथकरघा उद्योग चल निकलेगा और बेरोजगारी दूर करने में मदद मिलेगी. असमानता पर नियंत्रण के लिए विलासिता की वस्तुओं, जैसे एयरकंडीशनर पर एक्साइज ड्यूटी में भारी वृद्धि करनी चाहिए. डीजल सब्सिडी, स्वास्थ्य, शिक्षा एवं जन कल्याण जैसे कार्यक्रमों पर सरकार द्वारा करीब 500 हजार करोड़ रुपये प्रतिवर्ष खर्च किये जा रहे हैं. ऐसे कार्यक्रमों को बंद करके इस रकम को 20 करोड़ परिवारों में सीधे नगद वितरित कर दिया जाये, तो प्रत्येक परिवार को 25,000 रुपये प्रतिवर्ष मिल जायेंगे. इस रकम से वे भोजन, स्वास्थ और शिक्षा की अपनी न्यूनतम जरूरतों को बाजार से खरीद कर पूरा कर सकेंगे.

तीसरी चुनौती बुनियादी ढांचे की है. बीते दशक में हाइवे, बंदरगाह, एयरपोर्ट एवं रेल इत्यादि में सरकारी निवेश में भारी कटौती हुई. निजी कंपनियों के इन क्षेत्रों में प्रवेश का स्वागत है, पर जहां निजी कंपनियां प्रवेश नहीं कर रही हैं, वहां सरकारी निवेश जारी रहना चाहिए. निजी कंपनियों द्वारा इन क्षेत्रों में की जा रही लूट पर नियंत्रण भी जरूरी है.

चौथी चुनौती देश की पूंजी के पलायन को रोकने एवं विदेशी बैंकों में पड़ी पूंजी वापस लाने की है. यूं सुशासन स्थापित होने से अर्थव्यवस्था स्वयं चल निकलेगी. फिर भी पूंजी के गैरकानूनी प्रेषण और विदेश में पड़ी पूंजी को वापस लाने के लिए अलग खुफिया तंत्र स्थापित करना चाहिए. इस समय देश में जो विदेशी पूंजी आ रही है, उसका बड़ा हिस्सा अपनी पूंजी का राउंडट्रिपिंग है. अनुमान है कि 75 प्रतिशत विदेशी निवेश अपने ही कालेधन की वापसी है. इसे रोक लें तो देश की समृद्धि का रिसाव बंद हो जायेगा और हमारा छिपा वैभव प्रत्यक्ष दिखने लगेगा.

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