नरेंद्र मोदी और रोनाल्ड रीगन

Published at :28 Apr 2014 4:52 AM (IST)
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नरेंद्र मोदी और रोनाल्ड रीगन

।। रविभूषण।। (वरिष्ठ साहित्यकार) एक सप्ताह पहले प्रतिष्ठित समाचार पत्र ‘दि हिंदू’ में प्रकाशित डेविड कोहेन के लेख ‘इज इंडिया अबाउट टू इलेक्ट इट्स रीगन’ में मोदी और अमेरिका के 40वें राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के बीच कई समानताओं की बात कही गयी है. ‘दि हिंदू’ में प्रकाशित होने के एक सप्ताह पहले यह इसी शीर्षक […]

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।। रविभूषण।।

(वरिष्ठ साहित्यकार)

एक सप्ताह पहले प्रतिष्ठित समाचार पत्र ‘दि हिंदू’ में प्रकाशित डेविड कोहेन के लेख ‘इज इंडिया अबाउट टू इलेक्ट इट्स रीगन’ में मोदी और अमेरिका के 40वें राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के बीच कई समानताओं की बात कही गयी है. ‘दि हिंदू’ में प्रकाशित होने के एक सप्ताह पहले यह इसी शीर्षक से ऑनलाइन अमेरिकी समाचार-पत्र ‘दि डेली कॉलर’ में प्रकाशित हुआ था. भारत से पहले ‘सोशल मीडिया’ की बदौलत कोहेन ने भारतीय डायसपोरा और बुद्धिजीवियों का ध्यान आकृष्ट किया था. ‘दि हिंदू’ में ‘डेली कॉलर’ वाले लेख के वे दो अंश नहीं हैं, जिनमें उन्होंने राहुल गांधी और सोनिया गांधी सहित नेहरू की भी चर्चा की है. मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारतीय राजनीति में होनेवाले संभावित बदलावों का भी जिक्र ‘दि हिंदू’ में नहीं है.

कोहेन के इस लेख के पहले ‘इकोनॉमिस्ट’ ‘गाजिर्यन’ और ‘इंडिपेंडेंट’ में मोदी के संबंध में जो कुछ प्रकाशित हुआ है, उसमें मोदी की आलोचना है. इकोनॉमिस्ट ने मोदी को एक विभाजनकारी व्यक्ति के रूप में चित्रित कर भारतीयों से राहुल गांधी नीत सरकार की अनुशंसा की थी. इस लेख का शीर्षक था-‘इंडिया डिजव्र्स बेटर दैन मोदी.’ भाजपा इस पर अधिक क्रुद्ध हुई थी. अब पहली बार मोदी की प्रशंसा में किसी विदेशी-‘डेविड कोहेन’- ने प्रशंसात्मक उदगार व्यक्त किये हैं. लेख के अंत में उन्होंने प्रश्न किया है कि अमेरिका को अपना ‘मोदी’ कब मिलेगा? जाहिर है कोहेन ओबामा प्रशासन से संतुष्ट नहीं हैं. कोहेन रीगन के बड़े प्रशंसकों में हैं. मोदी और रीगन में उन्होंने कई बाह्य समानताएं देखी हैं.

रीगन कैलिफोर्निया के गवर्नर थे और मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री हैं. इन दोनों को कोहेन ने अपने राज्य के लोकप्रिय और सफल नेता के रूप में देखा है. अमेरिका में रीगन के और भारत में मोदी के ‘निंदक’ और विरोधी क्यों हैं- इसका कोहेन खुलासा नहीं करते. उन्होंने अमेरिका और भारत के ‘सांस्कृतिक एलीट्स’ की बात कही है, जो दोनों के विरोधी हैं. इनके अनुसार रीगन ‘रेसिस्ट’, मोदी ‘संप्रदायवादी’ हैं. कोहेन ने भारत के सुप्रीम कोर्ट द्वारा मोदी को ‘क्लीन चिट’ दिये जाने की बात कही है. वे अमेरिका के रीगन-बुश वाले र्ढे पर भारत को देखने की आकांक्षा भी रखते हैं. रीगन और जॉर्ज डब्ल्यू बुश दोनों रिपब्लिकन पार्टी के थे, जो लगातार 16 वर्ष तक अमेरिका के राष्ट्रपति थे. कोहेन के अनुसार अमेरिका ने जिसे ‘वार ऑन टेरर’ कहा है, भारत भी उसी स्थिति में है. मोदी को उन्होंने अमेरिका का ‘मूल्यवान साथी’ बताया है. उन्होंने भारत की तुलना पाकिस्तान और बांग्लादेश से की है, भारत के ‘सेक्यूलरिज्म’ पर प्रश्न भी किये हैं. अमेरिका में जिस प्रकार रीगन के ‘रेस कार्ड’ की बात कही गयी थी, उसी प्रकार भारत में मोदी के ‘कम्युनल कार्ड’ की बात की जाती है. गुजरात ‘नरसंहार’ को कोहेन ने ‘दंगा’ कहा है. यह लेख एक प्रकार से मोदी का प्रचार-अभियान है, जिसमें गंभीर तथ्यों का अभाव है. कोहेन ने ‘रीगनोमिक्स’ के साथ-साथ ‘मोदीनोमिक्स’ की भी चर्चा की है. गुजरात के विकास की प्रशंसा के बाद कोहेन बाजार-अर्थव्यवस्था के समर्थक ही नहीं, प्रवक्ता के रूप में दिखाई देते हैं. अमेरिका का मोदी को ‘वीजा’ न देना कोहेन को ‘शर्मनाक’ लगता है. अमेरिका का राज्य-विभाग, जो वीजा देता है, वामपंथी झुकावों वाले सांस्कृतिक एलीट्स के प्रभाव में रहा है. अमेरिका की ‘टी पार्टी’ से ‘टी सेलर’ (मोदी) में उन्होंने कई समानताएं देखी हैं. भाजपा के बीच आडवाणी, सुषमा और जोशी का जो धड़ा है, वह शायद ही अमेरिका की ‘टी पार्टी’ से भाजपा की तुलना करे.

कोहेन का यह लेख चुनाव के समय मतदाताओं को भरमाने के लिए प्रकाशित हुआ है. वे जिस ‘रीगनोमिक्स’ और ‘मोदीनोमिक्स’ की बात करते हैं, वह है क्या? जुलाई 1981 में रीगन ने ओवल कार्यालय में कर-छूट-संबंधी अपनी योजना के बारे जो भाषण दिया था, उसके साथ रीगन की आर्थिक नीतियों को ही ‘रीगनोमिक्स’ कहा जाता है. रीगन की आर्थिक नीतियां कमोबेश आज भी कई देशों में लागू हैं, जो सामान्यत: अर्थशास्त्र के आपूर्ति पक्ष से संबंधित है, जिसे राजनीतिक विरोधियों और मुक्त बाजार अर्थशास्त्र के समर्थकों ने ‘ट्रिकल डाउन अर्थशास्त्र’ कहा है. यह अर्थशास्त्र बड़े कारोबारियों और कॉरपोरेटों का अर्थशास्त्र है. रीगनोमिक्स के प्रमुख चार स्तंभ हैं-सरकारी खर्च में कमी, फेडरल आय कर को कम करने के साथ सरकारी नियम-कानून और व्यवस्था में कमी लाना, अवमूल्यन को कम करने के क्रम में मुद्रा-आपूर्ति सुदृढ़ करना. ‘रीगनोमिक्स’ में आपूर्ति पक्ष पर अधिक बल है. जॉन केनेथ गैलब्रेथ ने डेविड स्टॉकमैन को उद्धृत किया है कि आपूर्ति पक्षीय अर्थशास्त्र आर्थिक नीतियों के ‘ट्रिकल डाउन’ सिद्धांत को ढकने के लिए था. इसे हम ‘टपकन’ या ‘उच्छिष्ट’ सिद्धांत कह सकते हैं, जिसमें चंद उद्योगपतियों, पूंजीपतियों के पास पूंजी इकट्ठी हो जाती है और कुछ अंश जनता-जनार्दन को प्राप्त होता रहता है. पूंजीवाद अपनी शब्दावली समयानुसार बदलता है. ‘रीगनोमिक्स’, ‘मनमोहनोमिक्स’ या ‘मोदीनोमिक्स’ की जड़ों की पड़ताल की जानी चाहिए.

राष्ट्रपति बनने के मात्र बीस-इक्कीस दिन बाद रीगन ने राष्ट्रपति की आर्थिक नीति के सलाहकार बोर्ड के गठन पर ध्यान दिया. 10 फरवरी, 1981 को ह्वाइट हाउस ने राष्ट्रपति की आर्थिक नीति के सलाहकार बोर्ड के गठन की घोषणा की. इस बोर्ड में पहला नाम आर्थर बर्न्‍स का था और दूसरा नाम मिल्टन फ्रीडमैन का था. यहां मिल्टन फ्रीडमैन का जिक्र केवल इसलिए है कि आज की ‘नवउदारवादी अर्थव्यवस्था’ मिल्टन के अर्थशास्त्रीय विचारों-सिद्धांतों से जुड़ी है. कोहेन के अनुसार ‘मोदीनोमिक्स’ ‘रीगनोमिक्स’ का समर्थक है. हमें तब निश्चित रूप से यह जानना चाहिए कि ‘रीगनोमिक्स’ मिल्टन फ्रीडमैन के अर्थशास्त्रीय सिद्धांतों पर खड़ा है. मोदी ने अपने भाषणों में जो बार-बार ‘मिनिमम गवर्नमेंट और मैक्सिमम गवर्नेस’ की बात कही है, वह फ्रीडमैन की नीतियों से जुड़ी हुई है. कोहेन आज जिस ‘रीगनोमिक्स’ की बात करते हैं, उसे रीगन के विरुद्ध राष्ट्रपति चुनाव में जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने ‘वूडू इकोनॉमिक्स’ (जादू-टोना या तंत्र-मंत्र का अर्थशास्त्र) कहा था. पांच वर्ष पहले फरवरी, 2009 में पीटर फेरारा ने ‘दि वॉल स्ट्रीट जर्नल’ में लेख लिखा था- ‘रीगनोमिक्स वर्सेज ओबानोमिक्स’. उन्होंने ओबामा की अर्थनीतियों को रीगन की अर्थनीति के सर्वथा विपरीत बताया था.

हकीकत यही है कि रीगन ने अमेरिका में लोकतंत्र की हत्या की. भारत में लोकतंत्र का हत्यारा कोई नहीं बनना चाहेगा. रीगन बन कर मोदी अपना, देश और लोकतंत्र का नुकसान ही करेंगे.

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