गंगा मइया तोहे मैली ना होने देंगे

।। लोकनाथ तिवारी।। (प्रभात खबर, रांची) फिर गंगा मइया चर्चा में हैं. एक और स्वयंभू शिरोमणि भक्त उनको पाक-साफ बनाने के लिए कटिबद्ध हैं. हमारे देश में कई बार गरीबी हटाने, भ्रष्टाचार मिटाने के लिए नेताओं ने कमर कसी, या यूं कहिए कि धोती खोंस ली, लेकिन नतीजा क्या हुआ यह हम सब जानते हैं. […]
।। लोकनाथ तिवारी।।
(प्रभात खबर, रांची)
फिर गंगा मइया चर्चा में हैं. एक और स्वयंभू शिरोमणि भक्त उनको पाक-साफ बनाने के लिए कटिबद्ध हैं. हमारे देश में कई बार गरीबी हटाने, भ्रष्टाचार मिटाने के लिए नेताओं ने कमर कसी, या यूं कहिए कि धोती खोंस ली, लेकिन नतीजा क्या हुआ यह हम सब जानते हैं. अब गंगा मइया को साफ करने के लिए भी एक रणबांकुरे ने कमर कसी है. कहा जा रहा है कि गंगा मइया ने बुलाया है.
आ मेरे लाल तेरे बिन मैं मैली हो गयी हूं. अब इनको कौन बताये कि गंगा को साफ करने के लिए आज से 25 साल पहले शुरू किये गये ‘गंगा एक्शन प्लान’ पर दो हजार करोड़ रुपये से अधिक खर्च हो चुके हैं. इस ढाई दशक में गंगा निर्मल तो नहीं हुई पर उसके प्रति नीति-निर्धारकों की नीयत जरूर मैली हो गयी. इस प्लान के तहत केंद्र सरकार ने गंगा की सफाई के लिए लगभग दस हजार करोड़ रुपये जारी किये.
इस भारी-भरकम राशि को देख कर गंगा मइया के किनारे बसे राज्यों की सरकारों की लार टपकने लगी. भक्त शिरोमणि की पार्टी के एक मुख्यमंत्री जिनके यहां से गंगा निकलती है, लार टपकाने में सबसे आगे रहे. इस प्लान की विफलता के बाद गंगा को प्रदूषणमुक्त बनाने के लिए केंद्र ने सात हजार करोड़ रुपये की नयी योजना बनायी. इसके लिए विश्व बैंक से कर्ज भी लिया गया. पांच राज्यों उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड व पश्चिम बंगाल में गंगा को साफ करने के लिए विस्तृत योजना बनी. नाले और सीवर का पानी गंगा में जाने से रोकने के लिए कागजों पर ही योजनाएं बनीं. लेकिन गंगा में सीवर लाइनें अब भी अनवरत बह रही हैं.
भक्त इसी सीवर के ‘पवित्र जल’ में पाप धोते हैं. भक्त डुबकी लगा कर पाप- मुक्त भले ही हो जायें, लेकिन उनको बीमारी-युक्त होने से गंगा मइया भी नहीं रोक पातीं. गंगा मइया को साफ करने के मामले में तो हाइकोर्ट से भी फटकार लग चुकी है. मानकों के अनुसार ए क्लास के ठेकेदारों को ही इन परियोजनाओं के निर्माण का कार्य दिया जा सकता है. जो सच सामने आया है वह गंगा को आस्था का प्रतीक मानने वाले अनुयायियों को स्तब्ध करने वाला है. कैग की रिपोर्ट के अनुसार महाकुंभ के दौरान करोड़ों लोगों ने सीवर मिश्रित गंगा जल का आचमन किया.
गंगा के उद्गम प्रदेश उत्तराखंड में ही गंगा और उसकी सहायक नदियों पर चलायी जा रही परियोजनाओं के प्रति प्रदेश सरकार का रवैया बहुत कुछ साफ कर देता है. अलकनंदा के किनारे बसे सात पहाड़ी कस्बों के लिये शुरू योजना का काम अभी तक नहीं हो पाया है. अब देखना है कि गंगा मइया के नये शूरवीर भक्त इस दिशा में कौन सा तीर मारते हैं. गंगा मइया के किनारे रहनेवालों को इसका इंतजार रहेगा. इस बार गंगा किनारेवाले छोरे उनके साथ हैं. हे गंगा मइया के भक्त! इनकी उम्मीदों पर खरा उतरना, वरना आपके जोड़ीदार भी गंगा मइया के नाम पर गोटी सेट करने के जुगाड़ में लगे हैं.
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