रूठे उत्तराधिकारी, अब सोनिया और राबड़ी ने संभाली पार्टियों की कमान, राहुल-तेजस्वी को लेकर अचरज में नेता और कार्यकर्ता
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :18 Aug 2019 6:52 AM (IST)
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पटना : कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राजद नेत्री व पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी में बहुत समानताएं हैं. दोनों के बेटे लोकसभा चुनाव के बाद रूठे हुए हैं. दोनों ने खूब कोशिशें कीं, पर ना तो राहुल गांधी झुकने को तैयार हुए और ना ही तेजस्वी यादव पटना आने को तैयार हैं. राहुल को अपनी […]
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पटना : कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राजद नेत्री व पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी में बहुत समानताएं हैं. दोनों के बेटे लोकसभा चुनाव के बाद रूठे हुए हैं. दोनों ने खूब कोशिशें कीं, पर ना तो राहुल गांधी झुकने को तैयार हुए और ना ही तेजस्वी यादव पटना आने को तैयार हैं.
राहुल को अपनी पार्टी के नेताओं से शिकायत है. वहीं, तेजस्वी अपने परिवार की राजनीति से परेशान हैं. अब दोनों की माताओं ने पार्टी की कमान संभाल ली है. राहुल-प्रियंका के मना करने पर सोनिया गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर काम करना शुरू कर दिया है. जबकि, राबड़ी देवी लालू प्रसाद और तेजस्वी की गैर मौजूदगी में पार्टी कार्यों को निर्देशित कर रही हैं.
राहुल-तेजस्वी को लेकर अचरज में नेता और कार्यकर्ता
लोकसभा चुनाव के बोझ ने कांग्रेस व राजद के युवा नेताओं राहुल गांधी और तेजस्वी प्रसाद यादव के कंधे को इतना झुका दिया कि वह पार्टी का भार उठाने से दूर हो गये हैं. जब पार्टी के मनोबल को ऊंचा करने का वक्त आया तो दोनों ही राजनीति के पर्दे से ओझल दिख रहे हैं.
इन दोनों नेताओं की राजनीतिक गतिविधियों से दूरी बना लेने से पार्टी के नेता भी स्तब्ध हैं. राहुल गांधी जब कांग्रेस अध्यक्ष बने थे तो ऐसा लगा कि पार्टी को एक युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष मिलने से पार्टी में नयी ऊर्जा का संचार होगा.
इसी तरह से राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद ने जेल जाने के पहले राजद की कमान अपने छोटे बेटे और युवा नेता तेजस्वी यादव को सौंप दिया था. दोनों नेताओं की पहली परीक्षा लोकसभा चुनाव 2019 थी. परिणाम दोनों नेताओं के उम्मीद से पूरी तरह से विपरीत गया. लोकसभा चुनाव का परिणाम 23 मई को आया था. 25 मई को कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में राहुल गांधी ने पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. सोनिया गांधी इसके पहले 1998 से 2017 तक पार्टी की अध्यक्ष रहीं और उनके नेतृत्व में दो बार यूपीए की सरकार केंद्र में बनी थी. इधर, राजद की स्थिति भी कांग्रेस से जुदा नहीं है.
राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद के 1990 में सत्ता में आने के बाद ऐसा कोई चुनाव नहीं रहा, जब पार्टी का एक भी सांसद लोकसभा का सदस्य नहीं हो. लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद तेजस्वी की उपस्थिति अचानक बिहार से गायब हो गयी. बिहार विधानसभा के लंबे सत्र में भी वह चंद दिन ही हाउस में दिखे. फिलहाल वह किसी भी सार्वजनिक राजनीतिक कार्यक्रम में नहीं दिख रहे हैं.
इधर, राजद द्वारा विधानसभा चुनाव को लेकर सदस्यता अभियान चलाया जा रहा है. पार्टी नेता तेजस्वी का इंतजार कर रहे हैं. जब तेजस्वी पार्टी कार्यालय नहीं पहुंचे तो पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी पार्टी कार्यालय पहुंच कर सभी विधायकों पर 20-20 हजार सदस्य बनाने का टारगेट दिया.
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