सोमनाथ चटर्जी : स्पीकर पद नहीं छोड़ने पर जब अपनी ही पार्टी ने किया था बाहर

नयी दिल्ली : देश के शीर्ष वामपंथी नेताओं में शामिल पूर्व स्पीकर सोमनाथ चटर्जी का 89 वर्ष की उम्र में कोलकाता में निधन हो गया है. उनके निधन से देश ने एक महत्वपूण राजनीतिक हस्ती व मार्गदर्शक खो दिया, जिसके लिए मूल्य व सिद्धांत हमेशा सर्वोपरि रहे. यूपीए वन के सत्ता में आने पर सोमनाथ […]
नयी दिल्ली : देश के शीर्ष वामपंथी नेताओं में शामिल पूर्व स्पीकर सोमनाथ चटर्जी का 89 वर्ष की उम्र में कोलकाता में निधन हो गया है. उनके निधन से देश ने एक महत्वपूण राजनीतिक हस्ती व मार्गदर्शक खो दिया, जिसके लिए मूल्य व सिद्धांत हमेशा सर्वोपरि रहे. यूपीए वन के सत्ता में आने पर सोमनाथ चटर्जी देश के 13वें स्पीकर बने थे और 2004 से 2009 तक इस पद पर रहे. लोकसभा की कार्यवाही संचालन में उन्होंने एक नयी मिसाल कायम की और निष्पक्षता, अनुशासन और समय का अधिकतम उपयोग इस पद पर रहते हुए उनके लिए प्राथमिकता रही.
सोमनाथ चटर्जी लोकसभा में सांसदों के हंगामे पर नाराजगी जाहिर करते थे. उन्होंने एक बार नाराजगी में कहा था कि स्कूल के छोटे बच्चे भी इतना शोर नहीं करते. वे बड़े भावुक होकर अपनी नाराजगी जाहिर करते थे. सदन के संचालन के दौरान उनकी बांग्ला मिश्रित हिंदी में अद्भुत मिठास होती थी.
सोमनाथ चटर्जी 1971 में पहली बार सांसद चुने गये और ममता बनर्जी का राजनीतिक उदय 1984 में उनको जाधवपुर से लोकसभा चुनाव में हरा कर ही हुआ था. सोमनाथ चटर्जी के पिता निर्मल चंद्र चटर्जी हिंदू महासभा से जुड़े थे और चर्चित वकील थे. उनकी मां का नाम वीणापाणि देवी था. सोमनाथ चटर्जी ने प्रसिडेंसी कॉलेज और कलकत्ता यूनिवर्सिटी से शिक्षा पायी.
सोमनाथ चजर्टी के 1968 में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए थे और 2008 में तबतक जुड़े रहे जबतक की पार्टी ने उन्हें निकाला नहीं. दरअसल, मनमोहन सिंह सरकार अमेरिका से सिविल न्यूक्लियर डील करने पर अड़ी थी, जिसका वाम मोर्चे के तब के अगुवा माकपा महासचिव प्रकाश करात विरोध कर रहे थे. करात उस दौर में सोनिया गांधी के बाद देश के दूसरे सबसे ताकतवर नेता की छवि हासिल कर चुके थे. सरकार उन पर आश्रित थी. सिविल न्यूक्लियर डील इस मुद्दे पर वाम मोर्चे ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया. मनमोहन सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया और ऐसे में माकपा ने सोमनाथ चटर्जी को स्पीकर का पद छोड़ कर एक सांसद के रूप में विपक्ष में वोट देने को कहा. सोमनाथ चटर्जी ने खुद के संवैधानिक पद पर होने व दलीय राजनीति से परे होने का हवाला देकर ऐसा करने से इनकार कर दिया.
माकपा नेतृत्व को यह बात खल गयी. पार्टी पोलित ब्यूरो ने 40 साल से पार्टी में रहे एक बुजुर्ग नेता को बाहर कर दिया. इसके लिए पार्टी संविधान का हवाला दिया गया. उस समय माकपा के पश्चिम बंगाल इकाई के सचिव बिमान बोस ने कहा था – सोमनाथ चटर्जी ने भारतीय संविधान के अनुसार काम किया, लेकिन पार्टी के अंदरूनी मामले में पार्टी का संविधान ही सर्वोपरि है.
सोमनाथ चटर्जी के माकपा से निष्कासन के अंदाज सेइससबसे बड़े वाम दल को आलोचना का सामना करना पड़ा. वहीं, चटर्जी की प्रशंसा हुई. उनके फैसले को हर किसी ने सराहा. सोमनाथ चटर्जी ने अपने फैसलों व काम करने के अंदाज से खुद को साबित किया और देश उन्हेें इसके लिए हमेशा याद रखेगा.
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