मजबूत विपक्ष भी चाहिए, वह है कहां?

कांग्रेस पार्टी की संस्कृति ऐसी बन गई है कि क्षेत्रीय नेताओं को पनपने नहीं दिया जाता. और यह समस्या और शिद्दत के साथ सामने आने वाली है. अभी कांग्रेस को महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली और झारखंड विधानसभाओं के चुनावों का सामना करना है. संसद में विपक्ष की भूमिका निभानी है. इस चुनाव में देश को एक […]
कांग्रेस पार्टी की संस्कृति ऐसी बन गई है कि क्षेत्रीय नेताओं को पनपने नहीं दिया जाता. और यह समस्या और शिद्दत के साथ सामने आने वाली है. अभी कांग्रेस को महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली और झारखंड विधानसभाओं के चुनावों का सामना करना है. संसद में विपक्ष की भूमिका निभानी है.
इस चुनाव में देश को एक स्थिर और मजबूत सरकार का मिलना जितना शुभ लक्षण है उतना ही एक बिखरे और अनमने विपक्ष का उभर कर आना परेशान करता है. यह परेशानी केवल संख्या को लेकर नहीं है. विपक्ष का गुणात्मक ह्रास भी हुआ है. फिलहाल ऐसा लगता है कि राजनेताओं ने जय-पराजय को व्यक्तिगत रूप से लिया है. उसे जनता की मनोकामनाओं से नहीं जोड़ा. चुनाव में कम से कम तीन ताकतों की पराजय ध्यान खींचती है. पहली है कांग्रेस, जो आजादी के बाद से भारत की अवधारणा को मूर्त करने वाली पार्टी रही है. दूसरी पराजय वामपंथी पार्टियों की है. इन पार्टियों की देश के औद्योगिक और खेत मजदूरों के हितों की लड़ाई में अग्रणी भूमिका रही. इनका नेतृत्व अपेक्षाकृत साफ-सुथरा रहा, फिर भी ये पार्टियाँ देश की मुख्यधारा में सबसे आगे कभी नहीं रहीं. पर इस चुनाव में तो उनके अस्तित्व का संकट पैदा हो गया है. तीसरी ताकत है आम आदमी पार्टी, जिसका उदय जितनी तेजी से हुआ, पराभव उससे भी ज्यादा तेज गति से होता नजर आता है.
कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में सोनिया गांधी और राहुल गांधी के इस्तीफों की पेशकश नामंजूर कर दी गई. किसी को उम्मीद नहीं थी कि इनके इस्तीफे मंजूर कर लिए जाएंगे. पर पार्टी इस हार पर किसी किस्म का गम्भीर पश्चाताप भी नहीं करेगी, इसकी उम्मीद नहीं थी. पार्टी अब भी अपनी हार को किसी साजिश का परिणाम साबित करना चाहती है. सम्भव है कि भाजपा को उसकी प्रचार मशीनरी का फायदा मिला हो. यह भी मान लिया कि उसे देश के कॉरपोरेट जगत ने प्रचुर धनराशि उपलब्ध कराई थी. पर देश की जनता इतनी मूर्ख नहीं है कि केवल प्रचार के आधार पर फैसला करे. इस हार की छाया पिछले दो साल से दिखाई पड़ रही थी. दो साल में हुए विधानसभा चुनावों में कर्नाटक, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश को छोड़कर कांग्रेस को कहीं से जीत नहीं मिली थी. इन तीनों जीतों के पीछे भाजपा की आंतरिक टूट-फूट भी जिम्मेदार थी. इनमें कहीं भी कांग्रेस के कार्यक्र मों और नेतृत्व की भूमिका दिखाई नहीं पड़ी.
यह पार्टी 129 साल की विरासत का दावा तो करती है, पर वह विरासत क्या है? नेहरू-गांधी खानदान? हालांकि नरेंद्र मोदी की जीत राष्ट्रीय अभियान और राष्ट्रीय नेता की जीत कही जा सकती है, पर क्षेत्रीय क्षत्रपों के महत्व को नकारा नहीं जा सकता. इस चुनाव में ममता, बनर्जी, जयललिता और नवीन पटनायक की जीत पर भी हमें ध्यान देना चाहिए. नरेंद्र मोदी भी क्षेत्रीय क्षत्रप थे. भाजपा के पास शिवराज सिंह चौहान, मनोहर पर्रिकर, रमन सिंह और येदीयुरप्पा जैसे क्षेत्रीय नेता हैं. देश की सबसे पुरानी पार्टी के पास किसी राज्य में ऊंचे कद का राजनेता नहीं है. इसका क्या कारण है? ऐसा नहीं कि नेता नहीं हैं. पार्टी की संस्कृति ऐसी बन गई है कि क्षेत्रीय नेताओं को पनपने नहीं दिया जाता. और यह समस्या और शिद्दत के साथ सामने आने वाली है. अभी कांग्रेस को महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली और झारखंड विधानसभाओं के चुनावों का सामना करना है. संसद में विपक्ष की भूमिका निभानी है. क्या कांग्रेस इसके लिए तैयार है? कांग्रेस के सामने अस्तित्व का सवाल है. देखना होगा कि वह वैचारिक और संगठनात्मक रूप से किस रास्ते पर जाती है. क्या वह किसी वामपंथी एजेंडा के साथ सामने आएगी? पर कांग्रेस आर्थिक उदारीकरण की ध्वजवाहक है, जिससे उसका ध्वज भाजपा ने छीन लिया है.
दूसरी ओर देखें की वाममोर्चे का भविष्य क्या है. सन 2004 में वाममोर्चे की सीटें थीं 59. उसकी ताकत पिछले दो चुनावों में घटती हुई 11 पर आ गई है. इनमें कम्युनिस्ट पार्टियों की कुल सीटें 10 हैं. कांग्रेस की तरह माकपा भी अपनी हार को स्वीकार नहीं कर रही है. पार्टी के महासचिव प्रकाश करत का कहना है कि हम इसे अपनी हार नहीं मानते, बंगाल में जबर्दस्त धांधली हुई है. धांधली हुई भी होगी, पर इस पार्टी की अलोकप्रियता बढ़ी है. वाम मोर्चे ने भी उभरते भारतीय मध्यवर्ग की आकांक्षाओं को नहीं पहचाना. वह इस मध्यवर्ग को लालची और मौकापरस्त मानता है. पूंजी के वैश्वीकरण को कम्युनिस्ट पार्टियां समझ नहीं पाईं हैं. वे इसे रोक पाने की स्थिति में नहीं हैं. जब उनकी सरकार होती है, तो वे इसी रास्ते पर चलती हैं. सन 2011 में बंगाल विधान सभा का चुनाव हारने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव एबी वर्धन ने दिल्ली के एक अखबार से कहा कि हम मध्य वर्ग से खुद को नहीं जोड़ पाए. ऐसे ही सवालों पर वामपंथी पार्टियों को विचार करने की जरूरत है.
आम आदमी पार्टी वह तीसरी महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति है, जिसपर देश की निगाहें थीं. ‘आप’ ने सवा चार सौ सीटों पर चुनाव लड़ा था, जो भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशियों की संख्या से ज्यादा थी. संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण था एक नए किस्म की राजनीति के उदय की सम्भावना. पार्टी के नेतृत्व ने आशा व्यक्त की थी कि उसे 100 से ज्यादा सीटों पर जीत मिलेगी. ‘आप’ के पास प्रयोग करने का पर्याप्त समय था. लोकसभा की 543 में से 216 सीटें शहरी या अर्ध शहरी हैं. ‘आप’ ने यदि इनमें से 15-20 फीसदी यानी 30-40 सीट भी हासिल करने का लक्ष्य रखा होता तो वह दूसरे नम्बर की ताकत होती. ऐसा क्यों नहीं हुआ, इसपर विश्लेषण होता रहेगा, पर इतना साबित हुआ कि अधकचरे और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित नेतृत्व अक्सर बड़ी से बड़ी सम्भावनाओं को तबाह कर देता है. ‘आप’ के पास दिल्ली की सरकार चलाने का मौका था, पर 49 दिन में उसने जितना श्रेय कमाया उससे ज्यादा उसे त्याग कर उसने बदनामी हासिल की. और अब वह फिर से प्रचार की राजनीति की राह पर जा रही है. संवैधानिक संस्थाओं के प्रति ‘आप’ की गैर-जिम्मेदारी उसे हाशिए पर पहुंचा देगी और एक अभिनव प्रयोग इतिहास के कूड़ेदान में चला जाएगा.
प्रमोद जोशी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और देश के कई अखबारों और पोर्टलों के लिए लिखते हैं.
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