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सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा, मौत की सजा के लिए फांसी के अलावा और भी है कोई विकल्प

Updated at : 06 Oct 2017 4:35 PM (IST)
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सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा, मौत की सजा के लिए फांसी के अलावा और भी है कोई विकल्प

नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने सजा-ए-मौत के लिए फांसी की जगह दूसरे तरीकों के इस्तेमाल की मांग पर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए शुक्रवार को केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर तीन महीने में जबाव में मांगा है. फांसी के तरीके के खिलाफ दायर याचिका में इसे क्रूर और अमानवीय बताते हुए इसके […]

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नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने सजा-ए-मौत के लिए फांसी की जगह दूसरे तरीकों के इस्तेमाल की मांग पर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए शुक्रवार को केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर तीन महीने में जबाव में मांगा है. फांसी के तरीके के खिलाफ दायर याचिका में इसे क्रूर और अमानवीय बताते हुए इसके लिए वैकल्पिक तरीका अपनाने की मांग की गयी है. याचिका में फांसी को मौत का सबसे दर्दनाक और बर्बर तरीका बताते हुए जहर का इंजेक्शन लगाने, गोली मारने, गैस चैंबर या बिजली के झटके देने जैसी सजा देने की मांग की गयी है.

याचिका में कहा गया है फांसी से मौत में 40 मिनट तक लगते हैं, जबकि गोली मारने और इलेक्ट्रिक चेयर पर केवल कुछ मिनटों में मौत हो जाती है. सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि नवीन वैज्ञानिक अविष्कार के दूसरे तरीकों पर सरकार मौत की सजा देने के लिए दूसरे विकल्पों पर विचार कर सकती है, ताकि दोषी को शांति से मौत दी जा सके. याचिका में लॉ कमीशन की रिपोर्ट का हवाला दिया गया है. रिपोर्ट में कमीशन ने सीआरपीसी की धारा 354(5) में जरूरी संशोधन करने और फांसी के साथ इंजेक्शन के जरिये मौत दिये जाने के वैकल्पिक तरीके को भी अपनाये जाने की सिफारिश की है.

गौरतलब है कि पिछले काफी समय से फांसी की सजा के खिलाफ आवाज उठायी जाती रही है. वकील ऋषि मल्होत्रा ने अपनी याचिका में अदालत से यह दरख्वास्त की थी कि सजा-ए-मौत के तरीके पर विचार किये जाने की जरूरत है. याचिका में ज्ञान कौर बनाम पंजाब (1996) में दिये गये सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया गया है जिसमें जीवन जीने के मौलिक अधिकारों में सम्मान से मरने का भी अधिकार है यानी जब भी कोई व्यक्ति मरे तो मरने की प्रक्रिया भी सम्मानजनक होनी चाहिए. वहीं, दूसरे मामले में दीना बनाम भारत संघ (1983) के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा गया है कि मौत की सजा का तरीका ऐसा होना चाहिए जिससे जल्दी से मौत हो जाये और ये तरीका आसान भी होना चाहिए ताकि कैदी की मार्मिकता को और ना बढ़ाये. कोर्ट ने कहा था कि ये तरीका ऐसा होना चाहिए जिसमें जल्द मौत हो जाये और इसमें अंग-भंग ना हो.

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