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Social Media पर ट्रोल किया तो खैर नहीं, सुप्रीम कोर्ट जल्द बना सकता है कायदे-कानून

Updated at : 06 Oct 2017 8:15 AM (IST)
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Social Media पर ट्रोल किया तो खैर नहीं, सुप्रीम कोर्ट जल्द बना सकता है कायदे-कानून

नयी दिल्लीः अदालती कार्यवाहियों को लेकर सोशल मीडिया पर किये जाने वाले ट्रोलिंग, कठोर टिप्पणी आैर आक्रामक प्रतिक्रिया जताने वालों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त रुख अख्तियार कर सकता है. सोशल मीडिया पर ट्रोल, कठोर टिप्पणी आैर आक्रामक प्रतिक्रिया करने वालों की अब खैर नहीं. सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ जल्द ही इसके लिए कायदे-कानून बना […]

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नयी दिल्लीः अदालती कार्यवाहियों को लेकर सोशल मीडिया पर किये जाने वाले ट्रोलिंग, कठोर टिप्पणी आैर आक्रामक प्रतिक्रिया जताने वालों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त रुख अख्तियार कर सकता है. सोशल मीडिया पर ट्रोल, कठोर टिप्पणी आैर आक्रामक प्रतिक्रिया करने वालों की अब खैर नहीं. सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ जल्द ही इसके लिए कायदे-कानून बना सकती है.

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सुप्रीम कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे के उस कथित बयान को गुरुवार को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि शीर्ष अदालत के कई न्यायाधीश सरकार समर्थक हैं. अदालत ने साथ ही यह भी कहा कि शीर्ष अदालत सरकार को भी फटकार लगाती है.

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प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविल्कर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड की पीठ दवे द्वारा एक समाचार चैनल को दिये गये बयान को लेकर नाराज थी. इसके अलावा, पीठ ने न्यायाधीशों और न्यायिक कार्यवाहियों समेत लगभग हरेक मुद्दे पर सोशल मीडिया पर कठोर टिप्पणी, ट्रोल और आक्रामक प्रतिक्रिया की बढती प्रवृत्ति को लेकर चिंता जतायी.

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पीठ ने कहा कि उन्हें इस बात को देखने के लिए सुप्रीम कोर्ट में बैठना चाहिए कि कैसे सरकार की खिंचाई की जाती है. पीठ ने दवे का नाम लिये बिना कहा कि बार के कुछ सदस्यों ने टिप्पणी की कि सुप्रीम कोर्ट में सरकार समर्थक न्यायाधीशों का वर्चस्व है. उन्हें सुप्रीम कोर्ट में बैठकर देखना चाहिए कि नागरिकों के अधिकार के पक्ष में कैसे सरकार की खिंचाई की जाती है.

सोशल मीडिया की गतिविधियों पर बन सकता है कायदा-कानून

शीर्ष अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता फली एस नरीमन और हरीश साल्वे के उन सुझावों पर भी सहमति जतायी कि सोशल मीडिया पर इस तरह की घटनाओं का नियमन किये जाने की आवश्यकता है. ये दोनों उत्तर प्रदेश में एक हाईवे पर सामूहिक बलात्कार के मामले में उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री आजम खान के बयान से संबंधित मामले में शीर्ष अदालत की सहायता कर रहे हैं.

हरीश साल्वे ने ट्रोलिंग की वजह से बंद कर दिया ट्विटर एकाउंट

साल्वे ने कहा कि मैंने अपना ट्विटर एकाउुट बंद कर दिया है. उस पर काफी गाली-गलौच की गयी थी. उन्होंने कहा कि जब वह क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज से संबंधित मामले में पेश हो रहे थे और उसके बाद जो कुछ भी उनके ट्विटर हैंडल पर हुआ, उसने उन्हें इसे बंद करने को मजबूर किया.

रोहिंग्या मामले में सोशल मीडिया पर की गयी टिप्पणियां अदालत की नजर में

नरीमन ने कहा कि मैंने उसे देखना बंद कर दिया है. नरीमन ने कहा कि इन मंचों पर तकरीबन सभी विषयों पर गैर-जरूरी टिप्पणियां पायी जा सकती हैं. पीठ ने तब कहा कि रोहिंग्या मामले पर सुनवाई के दौरान एक टिप्पणी को ऐसे पेश किया गया जैसे आदेश दे दिया गया हो और यह चर्चा का विषय बन गया.

गलत सूचना को फैला रहे हैं सोशल मीडिया मंच

साल्वे ने कहा कि ऐसा कुछ भी जो न्यायाधीशों और दलील रख रहे वकीलों के बीच विचारों के मुक्त आदान-प्रदान को बाधित करता है, उस पर रोक लगाये जाने की आवश्यकता है. पीठ ने भी कहा कि सोशल मीडिया मंचों का दुरपयोग हो रहा है और लोग अदालत की कार्यवाही के बारे में भी गलत सूचना फैला रहे हैं.

अखबार आैर मीडिया संगठन बिना किसी प्रमाणिकता के प्रकाशित कर रहे आॅडियाे क्लिप

पीठ ने कहा, पहले सिर्फ राज्य निजता के अधिकार का उल्लंघन कर सकता था. अब इस तरह की बातें निजी पक्षों से भी हो रही हैं. साल्वे ने कहा कि कोई समाचार पत्र या मीडिया संगठन कोई ऑडियो क्लिप पाता है और इसकी प्रामाणिकता की कोई जिम्मेदारी लिये बिना इसका प्रकाशन करता है.

मीडिया संगठन कर रहे निजता के अधिकार नियमों का उल्लंघन

उन्होंने कहा कि क्या यह निजता का उल्लंघन नहीं है. पीठ ने कहा कि निजी भागीदारों की घुसपैठ की वजह से माई हाउस इज माई कैसल की अवधारणा तेजी से धुंधली पड़ रही है. नरीमन ने तब कहा कि भारतीय दीवानी कानून त्रुटिपूर्ण हैं और इस तरह की घटनाओं से निपटने में सक्षम नहीं हैं.

सोशल मीडिया के लिए जल्द ही बन सकते हैं कायदे-कानून

साल्वे ने कहा कि किसी तरह के नियमन की अविलंब आवश्यकता है. पीठ ने सुझावों पर सहमति जतायी. इस बीच, शीर्ष अदालत ने उन सवालों को संविधान पीठ के पास भेजा कि क्या कोई सार्वजनिक पदाधिकारी या मंत्री जांच के अधीन किसी संवेदनशील मामले पर अपनी राय जाहिर करने के दौरान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दावा कर सकता है.

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