सुप्रीम कोर्ट ने दागी सांसदों व विधायकों के मामले का निबटारा छह महीने में करने का दिया निर्देश

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 01 Sep 2017 12:47 AM

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नयी दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने जघन्य अपराध के मामले में आरोपी सांसदों और विधायकों के मामले की सुनवाई तय समय में करने को कहा है. अदालत ने कहा कि क्यों नहीं ऐसे मामलों की सुनवाई तत्काल होनी चाहिए? दोषी करार दिये गये सांसदों और विधायकों के आजीवन प्रतिबंध लगाने के मामले की सुप्रीम कोर्ट लगातार […]

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नयी दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने जघन्य अपराध के मामले में आरोपी सांसदों और विधायकों के मामले की सुनवाई तय समय में करने को कहा है. अदालत ने कहा कि क्यों नहीं ऐसे मामलों की सुनवाई तत्काल होनी चाहिए? दोषी करार दिये गये सांसदों और विधायकों के आजीवन प्रतिबंध लगाने के मामले की सुप्रीम कोर्ट लगातार सुनवाई करेगा. जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि दोषी सांसदों और विधायकों के मामलों को छह महीने के अंदर निबटारा करना बेहतर होगा.

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गौरतलब है कि मौजूदा समय में किसी भी मामले में दोषी करार दिये गये सांसदों और विधायकों के छह साल तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध है. याचिका में दो साल से अधिक सजा पाने वालों पर आजीवन प्रतिबंध लगाने की मांग की गयी है. इस मामले में चुनाव आयोग ने हलफनामा देकर मांग की थी कि जघन्य अपराध के मामले में सजा पाने वाले सांसदों और विधायकों के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए. केंद्र सरकार ने हलफनामे में कहा कि मौजूदा समय में दोषी करार दिये गये सांसदों पर विधायकों पर छह साल चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं है.

न्यायमूर्ति रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा की पीठ उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के उस प्रावधान को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गयी है, जिसके तहत दोषी नेताओं के जेल की सजा काटने के बाद चुनाव लड़ने पर छह साल का प्रतिबंध है. हस्तक्षेपकर्ता राकेश उपाध्याय की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश द्विवेदी ने कहा कि मौजूदा प्रावधानों के अनुसार गुरमीत राम रहीम जैसा व्यक्ति भी जेल की सजा काटने के छह साल बाद चुनाव लड़ सकता है.

उन्होंने कहा कि इसके अलावा, जेल की सजा काट चुके दोषियों के चुनाव लड़ने और राजनैतिक दल शुरू करने पर कोई प्रतिबंध नहीं है. जनहित याचिका दायर करने वाले अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने नयी प्रार्थनाएं कीं, जिसमें यह निर्देश देने की मांग की गयी कि दोषी व्यक्ति के राजनैतिक दल बनाने, किसी राजनैतिक दल का पदाधिकारी बनने या चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए. दलील के दौरान द्विवेदी ने इस तथ्य का उल्लेख किया कि किसी फौजदारी मामले में किसी लोकसेवक को गिरफ्तारी के 48 घंटे के भीतर निलंबित कर दिया जाता है और दोषसिद्धि के बाद उसकी सेवाएं समाप्त कर दी जाती हैं.

हालांकि, नेताओं के मामले में कानून यह प्रावधान करता है कि वे जेल की सजा काटने के छह साल बाद चुनावी राजनीति में लौट सकते हैं. उन्होंने कहा कि अगर किसी सरकारी सेवक को सेवा से बर्खास्त कर दिया जाता है, तो उसकी सेवा में लौटने का कोई सवाल नहीं है, लेकिन नेताओं को जेल की सजा काटने के छह साल बाद राजनीति में लौटने की वैधानिक अनुमति है. वकील ने पूछा कि क्या यह भेदभावपूर्ण नहीं है. उन्होंने पूछा कि क्या नेताओं के मामले में ही सिर्फ छह साल के लिए अयोग्यता होनी चाहिए.

उन्होंने कहा कि नेताओं को सिर्फ छह साल की अवधि के लिए अयोग्य ठहराना शायद उन्हें राजनीति के क्षेत्र में फिर से आमंत्रित करना है और यह संघीय ढांचे को विकृत करेगा. उन्होंने गुरमीत राम रहीम से संबंधित दोहरे बलात्कार मामले में हाल के फैसले का भी उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि कोई भी नेता न्यायाधीश की तारीफ करने के लिये आगे नहीं आया. न्यायाधीश पर मामले की सुनवाई के दौरान जबर्दस्त दबाव था. द्विवेदी ने कहा कि विभिन्न रिपोर्ट और सिफारिशों के बावजूद विधायिका ने दोषी नेताओं को अयोग्य ठहराने की अवधि नहीं बढ़ायी, जो राजनीति को स्वच्छ रखने के लिए जरूरी था.

उन्होंने कहा कि ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें पुष्ट अपराधी को राजनीति से हटाया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि हम इस अदालत से इस शून्यता को भरने को नहीं कह रहे हैं, बल्कि सिर्फ इतना कह रहे हैं कि इस हिस्से (छह साल के लिए अयोग्य ठहराने) को असंवैधानिक करार दे. मामले में सुनवाई गुरुवार को अधूरी रह गयी और 12 सितंबर को आगे की सुनवाई होगी.

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