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जयंती विशेष : आज की महिलाओं को ईश्वर चंद्र विद्यासागर का शुक्रगुजार क्यों होना चाहिए?

Updated at : 25 Sep 2019 10:53 PM (IST)
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जयंती विशेष : आज की महिलाओं को ईश्वर चंद्र विद्यासागर का शुक्रगुजार क्यों होना चाहिए?

आज भारत के महान समाज सुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर की जयंती है. 26 सितंबर 1820 को बंगाल के मेदिनीपुर जिले में एक गरीब ब्राह्मण परिवार में जन्मे ईश्वर चंद्र बंदोपाध्याय आगे चल कर एक महान समाज सुधारक, शिक्षा शास्त्री, दार्शनिक और स्वाधीनता सेनानी के तौर पर मशहूर हुए. बंगाल के पुनर्जागरण के स्तंभों में से […]

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आज भारत के महान समाज सुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर की जयंती है. 26 सितंबर 1820 को बंगाल के मेदिनीपुर जिले में एक गरीब ब्राह्मण परिवार में जन्मे ईश्वर चंद्र बंदोपाध्याय आगे चल कर एक महान समाज सुधारक, शिक्षा शास्त्री, दार्शनिक और स्वाधीनता सेनानी के तौर पर मशहूर हुए.

बंगाल के पुनर्जागरण के स्तंभों में से एक ईश्वर चंद्र विद्यासागर के बारे में बचपन में हमसबने किताबों में पढ़ा है. भारत के सभी प्राइमरी स्कूलों के पाठ्यक्रमों में ईश्वर चंद्र विद्यासागर के बारे में बताया जाता है. इसके पीछे उद्देश्य है विद्यासागर के आदर्शों का प्रभाव बच्चों पर बचपन से ही पड़े.

ईश्वर चंद्र के बारे में एक बात काफी मशहूर थी कि वह समय के बड़े पक्के थे. एक बार उन्हें लंदन में सभा को संबोधित करना था. जब वे वहां पहुंचे, तो सभा के बाहर काफी लोग खड़े थे. उन्होंने बाहर खड़े लोगों से पूछा- क्या हुआ? आप लोग बाहर क्यों हैं? उन्हें जवाब मिला- हॉल साफ नहीं है, क्योंकि सफाई कर्मचारी पहुंचे नहीं है. फिर क्या था? उन्होंने झाड़ू उठायी और सफाई करने लगे और थोड़ी ही देर में पूरा हॉल साफ हो गया.

ईश्वर चंद्र विद्यासागर की गिनती आधुनिक भारत के जन्मदाताओं में होती है. उन्हें गरीबों और दलितों का संरक्षक माना जाता था. उन्होंने स्त्री शिक्षा और विधवा पुर्नविवाह के लिए आवाज उठायी थी. वे मानते थे कि अंग्रेजी और संस्कृत भाषा के ज्ञान के समन्वय से ही भारतीय और पाश्चात्य परंपराओं का श्रेष्ठ ज्ञान हासिल किया जा सकता है.

गांव में प्रारंभिक शिक्षा के बाद वह अपने पिता के साथ कलकत्ता आ गए थे. कहते हैं कि ईश्वर चंद्र ने अपनी पढ़ाई स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठकर की क्योंकि उनके परिवार के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह गैस या दूसरी कोई लाइट खरीद सके. मेधावी होने की वजह से उन्हें कई स्कॉलरशिप भी मिली थी. इसी वजह से उनको विद्यासागर की उपाधि दी गई थी.

वर्ष 1839 में विद्यासागर ने कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद 1841 में केवल 21 साल की उम्र में फोर्ट विलियम कॉलेज में संस्कृत विभाग के प्रमुख के तौर पर काम शुरू कर दिया. वर्ष 1849 में एक बार फिर वह साहित्य के प्रोफेसर के तौर पर संस्कृत कॉलेज से जुड़े.

समाज सुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने स्थानीय भाषा और लड़कियों की शिक्षा के लिए स्कूलों की एक शृंखला के साथ कलकत्ता में मेट्रोपोलिटन कॉलेज की स्थापना की. संस्कृत कॉलेज का प्रिंसिपल बनने के बाद उन्होंने सभी जाति के बच्चों के लिए कॉलेज के दरवाजे खोल दिये, जो उसजमाने में बहुत बड़ी बात थी.

उनके अथक प्रयासों की वजह से विधवा पुनर्विवाह कानून 1856 पारित हुआ. कथनी के बजाय करनी में विश्वास करनेवाले ईश्वर चंद्र ने अपने बेटे की शादी एक विधवा से की थी. उन्होंने बहुपत्नी प्रथा और बाल विवाह के विरुद्ध भी आवाज उठायी थी. आपको बता दें, उस समय हिंदू समाज में विधवाओं की स्थिति बहुत चिंतनीय थी. महिलाओं को दूसरा जीवन देने वाले ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने 29 जुलाई 1891 में दुनिया को अलविदा कह दिया था.

ईश्वर चंद्र विद्यासागर के निधन पर रवींद्रनाथ टैगोर ने लिखा था- यह आश्चर्य करने वाली बात है कि भगवान ने चार करोड़ बंगाली बनाये, लेकिन इंसान एक ही बनाया.

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