भारत का एक ऐसा गांव जहां लोग नहीं पहनते हैं जूते और चप्पल, आखिर क्या है कारण?

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भारत का एक ऐसा गांव जहां लोग नहीं पहनते हैं जूते और चप्पल, आखिर क्या है कारण?

Bizarre: भारत एक ऐसा देश है जहां आपको कई तरह की अजीबों-गरीब और अविश्वसनीय चीजें देखने को मिल जाएंगी. आज इस आर्टिकल में हम आपको भारत के एक ऐसे ही गांव के बारे में बताने वाले हैं जहां के लोग कभी जूते और चप्पल नहीं पहनते हैं.

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Bizarre: भारत एक काफी अनोखा देश है. यहां आपको कई तरह की ऐसी चीजें देखने और सुनने को मिलेंगे जिनके बारे में शायद ही आपने कभी सोचा होगा. कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक यहां आपको कई तरह की विभिन्न चीजें देखने को मिल जाएंगी जो इसे काफी रोचक बना देती हैं. भारत एक ऐसा देश है जहां आपको कई संस्कृति के लोग दिखाई देंगे. यह लोग अलग-अलग मान्यताओं पर भरोसा करते हैं और कई तरह की रीति रिवाजों पर भरोसा भी करते हैं. यहीं कुछ चीजें हैं जो भारत को काफी अलग बना देती है. आज हम आपको इस आर्टिकल में भारत के एक ऐसे गांव के बारे में बताने जा रहे हैं जिसके बारे में शायद आप नहीं जानते हों. जिस गांव की आज हम बात कर रहे हैं वह गाँव इसलिए भी खास है क्योंकी यहां के लोग कभी जूते और चप्पल नहीं पहनते हैं. आप चाहे इस गांव के हों या फिर बाहर से आये हों, आपको इस नियम का पालन करना ही होगा. तो चलिए इस गांव के बारे में विस्तार से जानते हैं.

कहां है यह गांव

आज हम जिस गांव की बात कर रहे हैं वह आंध्र प्रदेश में है और इसका नाम वेमना इंदलू है. अगर आप यहां जाना चाहते हैं तो बता दें यह गांव तिरुपति बालाजी से 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. मजेदार बात यह भी है कि इस गांव में सिर्फ 25 परिवार रहते हैं और यहां की कुल आबादी महज 80 लोगों की है. भले काफी छोटा है लेकिन यहां की जो परम्पराएं हैं वह काफी अनोखी हैं. यहां के लोग पढ़े-लिखे नहीं है मुख्य तौर पर खेती पर ही डिपेंडेंट हैं. यहां रहने वाले लोग सिर्फ अपने भगवान और वहां के मुखिया सरपंच की ही बात मानते हैं. सामने आयी जानकारी के अनुसार इस गांव में जो लोग रहते हैं वे पलवेकरी समुदाय से जुड़े हुए हैं और अपनी पहचान दोरावारलू के तौर पर करवाते हैं. इस जाति के लोगों को पिछड़े वर्ग की केटेगरी में रखा गया है. इस गांव से जुड़ी एक मजेदार बात यह भी है कि यहां जब कोई बीमार पड़ता है तो वह अस्पताल नहीं जाता है बल्कि, यह कहता है कि हम जिस भगवान की पूजा करते हैं वे सब कुछ संभाल लेंगे और ठीक कर देंगे. जब लोग यहां बीमार होते हैं तो यहां मौजूद एक नीम का पेड़ है जिसकी परिक्रमा कर लेते हैं. केवल यहीं नहीं यहां जो लोग रहते हैं वे त‍िरुपत‍ि भगवान वेंकटेश्वर की पूजा नहीं करने जाते हैं बल्कि, गांव में स्थित एक मंदिर में ही पूजा कर लेते हैं.

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बाहर से आने वालों पर भी लागू होता है नियम

इस गांव के रहने वाले लोग नियमन को इतने स्ट्रिक्ट हैं कि अगर कोई व्यक्ति बाहर से घूमने के लिए आता है तो उसे भी जूते-चप्पल खोलकर ही इस गांव में घुसने दिया जाता है. यह नियम सभी ऑफिशियल्स को भी मानना पड़ता है. मजेदार बात यह भी है कि जब कोई यहां बाहर से आता है तो वह बिना नहाये धोये यहां नहीं आ सकता.

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सौरभ पोद्दार

लेखक के बारे में

By सौरभ पोद्दार

सौरभ पोद्दार एक लाइफस्टाइल जर्नलिस्ट हैं और पिछले 4 सालों से डिजिटल मीडिया में एक्टिव हैं. उन्होंने रांची के सेंट जेवियर्स कॉलेज से जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन में मास्टर्स किया है. फिलहाल, सौरभ 'प्रभात खबर' के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बतौर कंटेंट राइटर काम कर रहे हैं. सौरभ को उन टॉपिक्स पर लिखना सबसे ज्यादा पसंद है, जो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े हैं. उनके आर्टिकल्स में आपको हेल्थ, फिटनेस, स्किन-हेयर केयर, पेरेंटिंग, हेल्दी रेसिपीज, घरेलू नुस्खे, रिलेशनशिप और वास्तु शास्त्र जैसी उपयोगी जानकारियां मिलेंगी. फिटनेस और अच्छी सेहत सौरभ की निजी जिंदगी का भी अहम हिस्सा हैं. वे जिन विषयों पर लिखते हैं, उन्हें अपनी रूटीन में फॉलो भी करते हैं. उनका मानना है कि जब आप किसी चीज को खुद एक्सपीरियंस करते हैं, तभी दूसरों तक सही और प्रैक्टिकल जानकारी पहुंचा सकते हैं. उनकी हमेशा यही कोशिश रहती है कि वे ट्रेंडिंग टॉपिक्स पर बिल्कुल आसान और आम बोलचाल की हिंदी में लिखें, ताकि हर पाठक उसे आसानी से समझ सके. यही वजह है कि उनके लिखे आर्टिकल्स काफी एंगेजिंग और SEO-फ्रेंडली होते हैं.

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