World Thalassemia Day : वंशानुगत रक्त विकार है थैलेसीमिया

थैलेसीमिया का उपचार
World Thalassemia Day : यह बीमारी जीन में गड़बड़ी के कारण होती है, जब माता और पिता दोनों में थैलेसीमिया माइनर के जीन हों, तो बच्चे में थैलेसीमिया मेजर होने का जोखिम 25% होता है. वहीं अगर पति-पत्नी में से कोई एक सामान्य है और दूसरा माइनर, तो बच्चे को थैलेसीमिया मेजर नहीं होगा.
–डॉ अभिषेक रंजन-
(क्लिनिकल हेमेटोलॉजी विभाग, सदर अस्पताल, रांची)
World Thalassemia Day : थैलेसीमिया एक वंशानुगत रक्त विकार (Genetic Blood Disorder) है. इसमें शरीर की हीमोग्लोबिन बनाने की क्षमता प्रभावित होती है. हीमोग्लोबिन लाल रक्त कोशिकाओं (RBC) में पाया जाने वाला वह प्रोटीन है, जो पूरे शरीर में ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करता है. थैलेसीमिया के कारण शरीर में खून की भारी कमी हो जाती है, जिसे एनीमिया कहते हैं. इसमें नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत पड़ती है.
फिलहाल अच्छी बात ये है कि हमलोग पिछले एक साल से प्रयोगिक तौर पर ‘थैलिडोमाइड’ नामक दवा मुफ्त में दे रहे हैं, जिसका बढ़िया रिजल्ट मिल रहा है. कई ऐसे बच्चे हैं, जिन्हें 4-6 माह में एक बार ही खून चढ़ाने की जरूरत रह गयी है, वहीं कुछ को तो एक साल से नहीं चढ़ाना पड़ा. वैसे ये दवा बेहद सस्ती भी है. हां, ये बेहद जरूरी है कि ये दवा एक्सपर्ट हेमेटोलॉजिस्ट की देखरेख में ही दी जाये, क्योंकि इसके साइड इफेक्ट भी होते हैं.
रोग के मुख्य कारण
यह बीमारी जीन में गड़बड़ी के कारण होती है, जब माता और पिता दोनों में थैलेसीमिया माइनर के जीन हों, तो बच्चे में थैलेसीमिया मेजर होने का जोखिम 25% होता है. वहीं अगर पति-पत्नी में से कोई एक सामान्य है और दूसरा माइनर, तो बच्चे को थैलेसीमिया मेजर नहीं होगा. इसके लिए फैमिली हिस्ट्री, जीन संबंधी दोष भी कारण हैं. इसमें मरीज को 9 ग्राम हीमोग्लोबिन मेंटेन करने की जरूरत होती है. 15-20 ब्लड ट्रांसफ्यूजन के बाद आयरन ओवरलोड के लिए खास दवाएं दी जाती हैं, इनमें दो ओरल ड्रग ( defefisirox, Deferepirione) हैं और एक इंजेक्शन (Subcutaneous Deferrixamine). इसके अभाव में मरीज के हृदय, लिवर आदि अंगों को गहरा नुकसान हो सकता है.
थैलेसीमिया के दो मुख्य प्रकार
1. थैलेसीमिया माइनर (Thalassemia Minor): इसे ‘थैलेसीमिया कैरियर’ या वाहक भी कहते हैं. ऐसे व्यक्तियों में बीमारी के लक्षण नहीं दिखते और वे एक सामान्य जीवन जीते हैं. हालांकि, वे अपने बच्चों में इस जीन को स्थानांतरित कर सकते हैं.
2. थैलेसीमिया मेजर (Thalassemia Major): यह बीमारी का गंभीर रूप है. यदि माता और पिता दोनों माइनर हैं, तो बच्चे को मेजर होने की 25% संभावना होती है. ऐसे बच्चों को जीवित रहने के लिए जीवनभर नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन (खून चढ़ाने) की आवश्यकता होती है.
क्या हैं प्रमुख लक्षण
थैलेसीमिया मेजर के लक्षण आमतौर पर बच्चे के जन्म के 6 महीने से 2 साल के भीतर दिखने लगते हैं :
* त्वचा का पीला पड़ना (गंभीर एनीमिया)
* लगातार थकान और कमजोरी महसूस होना
* हड्डियों में विकृति (विशेषकर चेहरे की हड्डियों का बढ़ना)
* विकास की गति धीमी होना
* पेट का फूलना (तिल्ली या प्लीहा और लिवर का बढ़ना)
* पेशाब का रंग गहरा होना
उपचार के क्या हैं विकल्प
थैलेसीमिया का प्रबंधन एक जटिल प्रक्रिया है, जिसके लिए विशेषज्ञ हेमेटोलॉजिस्ट की देखरेख जरूरी है :
– नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन : हीमोग्लोबिन के स्तर को सामान्य रखने के लिए हर 2-4 सप्ताह में खून चढ़ाना पड़ता है. अच्छी बात ये है कि हमलोग पिछले एक साल से प्रयोगिक तौर पर ‘थाइलोरोमाइड’ नामक दवा मुफ्त में दे रहे हैं, जिसका बढ़िया रिजल्ट मिल रहा है. कई ऐसे बच्चे हैं, जिन्हें 4-6 माह में एक बार ही खून चढ़ाने की जरूरत रह गयी है, वहीं कुछ को तो एक साल से नहीं चढ़ाना पड़ा. वैसे ये दवा बेहद सस्ती भी है.
– आयरन चिलेशन थेरेपी : बार-बार खून चढ़ाने से शरीर में आयरन (लोहा) की मात्रा बढ़ जाती है, जो हृदय और लिवर को नुकसान पहुंचा सकती है. इसे निकालने के लिए विशेष दवाओं का उपयोग किया जाता है.
– बोन मैरो ट्रांसप्लांट (BMT) : यह थैलेसीमिया का एकमात्र स्थायी इलाज है. यदि कोई मैचिंग डोनर (जैसे भाई या बहन) मिल जाये, तो बीएमटी के जरिए इस बीमारी को पूरी तरह ठीक किया जा सकता है.
बचाव ही सबसे बड़ा समाधान
थैलेसीमिया एक ऐसी बीमारी है, जिसे रोका जा सकता है. इसके लिए समाज को निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए :
1. Hb-Electrophoresis टेस्ट : विवाह से पहले या गर्भधारण से पहले पति-पत्नी को यह टेस्ट जरूर कराना चाहिए.
2. कुंडली नहीं, ब्लड रिपोर्ट मिलाएं : यदि दोनों साथी ‘थैलेसीमिया माइनर’ हैं, तो बच्चे को ‘मेजर’ होने का खतरा करीब 25 फीसदी होता है. जरूरी है कि सोशल स्टेग्मिा न फैले, ताकि शादी-ब्याह या नौकरी में किसी तरह की परेशानी हो. नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन, चेलेटिंग एजेंट के सेवन से हेमेटोलॉजिस्ट की देखरेख में ऐसे बच्चे भी सामान्य जीवन जी सकते हैं.
3. प्रसव पूर्व जांच (Prenatal Diagnosis) : यदि दोनों माता-पिता कैरियर हैं, तो गर्भावस्था के 10-12 हफ्तों में भ्रूण की जांच करायी जा सकती है.
कुछ आम सवाल-जवाब
सवाल : क्या थैलेसीमिया छूत की बीमारी है?
जवाब : नहीं, यह संक्रमण से नहीं फैलता. यह केवल माता-पिता से बच्चों में जींस के जरिये आता है.
सवाल : क्या थैलेसीमिया माइनर को इलाज की जरूरत है?
जवाब : आमतौर पर नहीं. थैलेसीमिया माइनर एक बीमारी नहीं, बल्कि एक अवस्था है. बस उन्हें आयरन की गोलियां बिना डॉक्टर की सलाह के नहीं लेनी चाहिए, क्योंकि उनका एनीमिया आयरन की कमी वाला नहीं होता.
सवाल : सरकारी सुविधाओं में क्या नियम हैं?:
जवाब : भारत सरकार के RPWD एक्ट 2016 के तहत अब थैलेसीमिया को एक दिव्यांगता माना गया है. बच्चे का ‘डिसेबिलेटी सर्टिफिकेट’ बनने के बाद उसे शिक्षा, परिवहन और इलाज में सरकारी मदद और आरक्षण मिल सकता है.
सवाल : ब्लड बैंक के नियम क्या कहते हैं?
जवाब : नेशनल ब्लड ट्रांसफ्यूजन काउंसिल (NBTC) के नियमों के अनुसार, सरकारी अस्पतालों और कई चैरिटेबल ब्लड बैंकों में थैलेसीमिया मरीजों को बिना रिप्लेसमेंट डोनर दिये मुफ्त में ब्लड मिलना चाहिए. अगर उनसे हर बार डोनर मांगा जा रहा है, तो वे स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारी या थैलेसीमिया सोसाइटी से संपर्क कर सकते हैं.
सवाल : थैलेसीमिया और सिकल सेल में क्या अंतर है?
जवाब : ये दोनों ही आनुवंशिक रक्त विकार हैं, लेकिन इनके कारण और प्रभाव अलग हैं. थैलेसीमिया हीमोग्लोबिन की मात्रा (कम उत्पादन) को प्रभावित करता है, जबकि सिकल सेल एनीमिया हीमोग्लोबिन की संरचना को. थैलेसीमिया में लाल रक्त कोशिकाएं छोटी और फीकी (माइक्रोसाइटिक) होती हैं, जबकि सिकल सेल में कठोर और हंसिया के आकार की हो जाती हैं.
सवाल : दोनों के लक्षणों और उपचार में क्या अंतर है?
जवाब : थैलेसीमिया में गंभीर एनीमिया और कमजोरी प्रमुख लक्षण है. एनीमिया के कारण बच्चे की वृद्धि और विकास बाधित हो सकती है. जबकि सिकल सेल में रक्त प्रवाह रुकने के कारण तीव्र दर्द और अंगों को नुकसान हो सकता है.
– उपचार : दोनों में ही समय-समय पर खून चढ़ाने और शरीर में जमा अतिरिक्त आयरन को बाहर निकालने के लिए आयरन केलेशन थेरेपी की जाती है. जबकि सिकल सेल में पेन मैनेजमेंट, हाइड्रेशन और कभी-कभी खून चढ़ाने की जरूरत होती है.
सवाल : जीन थेरेपी कितनी कारगर है?
जवाब : जीन थेरेपी केवल सिकल सेल मामले में कारगर है, थैलेसीमिया के लिए नहीं. फिलहाल झारखंड में इसकी सुविधा नहीं है. विकसित राज्य में बेहतर सुविधाओं की वजह से ऐसे बच्चे सामान्य जीवन जीते हैं, जैसे तमिलनाडु में मैंने खुद इसका अनुभव किया है.
जागरूकता ही एकमात्र हथियार
थैलेसीमिया मुक्त समाज के निर्माण के लिए जागरूकता ही एकमात्र हथियार है. यदि आपके परिवार में किसी को एनीमिया है, जो दवाओं से ठीक नहीं हो रहा, तो तुरंत एक हेमेटोलॉजिस्ट से संपर्क करें और अपनी जांच कराएं.
छोटे बच्चों का वैक्सीनेशन जरूर कराएं. थैलेसीमिया मेजर बच्चों की मॉनिटरिंग के लिए 3-6 माह पर HIV HBsAg, HCV, serum ferritin, CBC, LFT, urea, Creatinine, thyroid profile, urine आदि जांच जरूर कराएं.
याद रखें : एक छोटा सा रक्त परीक्षण आपकी आने वाली पीढ़ी को एक दर्दनाक बीमारी से बचा सकता है. इलाज के लिए हेमेटोलॉजिस्ट (रक्त रोग विशेषज्ञ) से परामर्श करना सबसे उचित है.
सरकार भी ध्यान दे
झारखंड में जहां 10-15 फीसदी थैलेसीमिया या सिकल सेल ट्रेट के मरीज दर्ज हैं, वहां कुछ आवश्यक सुविधाएं हों, जैसे- ओरल चेलेटिंग एजेंट को अनिवार्य दवाओं की सूची में शामिल किया जाये, और इनकी उपलब्धता हर जिले में सुनश्चित की जाये, तो मरीजों का जीवन आसान हो सकता है.
एमआरआइ सहित अन्य जरूरी जांच जैसी सीवीएस (Chorionic Villus Sampling) और (Amniocentesis) आदि की व्यवस्था होनी चाहिए.नियम ऐसे बनें कि मरीजों को पूरा खून देने के बजाय प्लाज्मा मुक्त खून (PRBC) दिया जाये, जो कहीं ज्यादा सुरक्षित उपाय है.
बोनमेरो ट्रांसप्लांटेशनकी सुविधा झारखंड राज्य के सरकारी अस्पतालों में जल्द ही उपलब्ध करायी जाये.
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