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Film Review : गैंगस्टर के महिमामंडन की कमजोर कहानी #Daddy

Updated at : 08 Sep 2017 3:26 PM (IST)
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Film Review : गैंगस्टर के महिमामंडन की कमजोर कहानी #Daddy

IIउर्मिला कोरीII फिल्म : डैडीनिर्माता : अर्जुन रामपालनिर्देशक : असीम अहलूवालियाकलाकार : अर्जुन रामपाल, निशिकांत कामत, ऐश्वर्या राजे, राजेश और अन्यरेटिंग : ढाईबॉलीवुड में गैंगस्टर की बायोपिक का चलन पुराना है. डैडी गैंगस्टर अरुण गवली की कहानी है. बॉलीवुड की दूसरी गैंगस्टर फिल्मों की तरह यहां भी महिमामंडन ही हुआ है. फिल्म के पहले ही […]

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IIउर्मिला कोरीII

फिल्म : डैडी
निर्माता : अर्जुन रामपाल
निर्देशक : असीम अहलूवालिया
कलाकार : अर्जुन रामपाल, निशिकांत कामत, ऐश्वर्या राजे, राजेश और अन्य
रेटिंग : ढाई

बॉलीवुड में गैंगस्टर की बायोपिक का चलन पुराना है. डैडी गैंगस्टर अरुण गवली की कहानी है. बॉलीवुड की दूसरी गैंगस्टर फिल्मों की तरह यहां भी महिमामंडन ही हुआ है. फिल्म के पहले ही दृश्य में गवली का किरदार अपनी बेटी को पूछता है कि लोग उसे रॉबिनहुड क्यों कहते हैं. वह बोलती है कि आप खलनायक नहीं हैं. आप अमीरों से लेकर गरीब को देते हैं.

फिल्म में भी इसी बात को दिखाया गया है कि मिल मजदूर का बेटा अरुण गवली को गरीबी किस तरह से जुर्म के रास्तों में धकेल देती है. एक दृश्य में अरुण गवली की मां कहती भी है कि उसका सबसे बड़ा दोष गरीबी था. फिल्म में दाऊद के साथ गवली के गैंग वॉर भी है. हां, फिल्म में किरदार का नाम दाऊद न देकर मकसूद दिया गया है.

पुलिस अरुण गवली के पीछे पड़ी है. मुंबई पुलिस के एनकाउंटर वाली घटनाओं पर इस फिल्म में सवाल उठाया गया है. इस बात को भी साफ तौर पर दिखाया गया है कि दाऊद से मुंबई पुलिस की सांठ-गांठ थी. गैंगस्टर अरुण गवली के पॉलिटिशियन डैडी बनने की कहानी फिल्म में आगे है. फिल्म में सबकुछ डाला गया है, लेकिन फिल्म की कमजोर स्क्रीनप्ले एंगेज नहीं कर पाती है.

फिल्म में अरुण गवली की इमेज को अच्छा रखने की कोशिश में उसे एक खतरनाक गैंगस्टर के तौर पर फिल्म स्थापित करने में चूकती है. दगडी चाल में किस तरह से गवली का गढ़ था कि आम आदमी ही नहीं, पुलिस भी वहां जाने से कतराती थी. फिल्म में इसका कहीं भी जिक्र नहीं है.

फिल्म के आखिर में गवली का किरदार सवाल उठाता है कि जिन जमीनों को खाली कराने के लिए उस पर जुर्म का इल्जाम लगा है, उन जमीनों पर बनी बड़ी बिल्डिंगों में आज कौन रह रहा है. फिल्म खत्म हो जाती है. फिल्म का पहला भाग किरदारों को स्थापित करता है और कहानी का मूल परिवेश तैयार करता है. सेकंड हाफ में कहानी भटक गयी और एक ही जगह पर घूमती दिखती है, जिससे ऊब होने लगती है.

फिल्म की कहानी गवली की जिंदगी को परदे लाने के बजाय उसकी इमेज को अच्छा बनाने के ज्यादा करीब दिखती है. यही इसकी सबसे बड़ी खामी है. हां, फिल्म का प्रोडक्शन इसकी खासियत है. 70 और 80 के दशक की मुंबई को बहुत ही डिटेलिंग के साथ फिल्म में दर्शाया गया है. इसके लिए रिसर्च टीम की तारीफ करनी होगी. अभिनय की बात करें, तो यह अभिनेता अर्जुन रामपाल का सर्वश्रेष्ठ अभिनय कह सकते हैं. किरदार का लुक हो या उसका बॉडी लैंग्वेज या संवाद अदायगी. उन्होंने किरदार को आत्मसात किया है.

निशिकांत कामत का काम भी बेहतरीन रहा है. अपने अभिनय वाली फिल्मों में निशिकांत का लुक काफी अलग रहता है. इसके लिए उनकी तारीफ करनी होगी. अर्जुन और उनका परफॉरमेंस फिल्म को खास बना देता है. अभिनेत्री ऐश्वर्या, राजेश और आनंद इंग्ले सहित बाकी लोग भी अपनी भूमिका में जमे हैं.

फरहान अख्तर मकसूद भाई के किरदार में मिसफिट लगते हैं. फिल्म का गीत और संगीत औसत है. बैकग्राउंड म्यूजिक अच्छा है. फिल्म का स्क्रीनप्ले कुछ कमजोर है. कुल मिलाकर ‘डैडी’ सिर्फ कलाकारों के अभिनय और प्रोडक्शन की वजह से ही एंगेज कर पाती है.

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