सबसे अधिक बुड्ढा कौन रुपया या डॉलर? 1947 के बाद कितना टूटा भारतीय रुपया!

Published by :KumarVishwat Sen
Published at :07 Dec 2024 1:11 PM (IST)
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सबसे अधिक बुड्ढा कौन रुपया या डॉलर? 1947 के बाद कितना टूटा भारतीय रुपया!

USD vs INR

USD vs INR: अमेरिकी डॉलर के प्रचलन की शुरुआत 1792 में हुई. उस समय डॉलर को आधिकारिक मुद्रा के रूप में मान्यता मिली और इसे अमेरिकी सरकारी सिक्कों और कागजी नोटों के रूप में जारी किया गया. भारतीय उपमहाद्वीप में मुद्रा का प्रचलन बहुत पहले से था, लेकिन भारतीय रुपये के रूप में एक मानक मुद्रा की शुरुआत 16वीं सदी में हुई.

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USD vs INR: अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया काफी कमजोर होता जा रहा है. इस भारतीय मुद्रा के टूटने पर हर बार बड़ा सवाल खड़ा होता है और बवाल भी मचता है. कई बार तो लोग-बाग मजाक भी बना देते हैं. इस बीच, सवाल यह पैदा होता है कि 1947 में जब भारत आजाद हुआ था, तब रुपये की स्थिति क्या थी और आज क्या है? सबसे पुरानी मुद्रा कौन है रुपया या अमेरिकी डॉलर? आइए, इन सभी सवालों का जवाब जानते हैं.

भारत में रुपये की कब शुरुआत हुई

भारतीय उपमहाद्वीप में मुद्रा का प्रचलन बहुत पहले से था, लेकिन भारतीय रुपये के रूप में एक मानक मुद्रा की शुरुआत 16वीं सदी में हुई. जब पुर्तगालियों ने भारत में अपने व्यापारिक नियंत्रण की शुरुआत की, तो उन्होंने कुछ स्थानीय मुद्राएं जारी कीं, जिनमें से कुछ रुपये के रूप में मानी जाती थीं. मुगल सम्राट अकबर ने 16वीं शताबदी के अंत में सिक्कों के मानकीकरण की प्रक्रिया को आरंभ किया. उन्होंने ‘रुपया’ नामक सिक्का चलाया, जिसे सिल्वर (चांदी) का बना हुआ था. यह चांदी का सिक्का भारतीय रुपये के रूप में विकसित होने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था.

इसके बाद भारतीय रुपये की आधिकारिक शुरुआत 19वीं सदी में हुई, जब ब्रिटिश शासन के दौरान 1835 में भारतीय रुपया एक मानकीकृत मुद्रा के रूप में स्थापित हुआ. इस समय ब्रिटिश सरकार ने रुपया को भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापार और लेन-देन के लिए आधिकारिक मुद्रा के रूप में स्वीकार किया. भारत के स्वतंत्र होने के बाद 15 अगस्त 1947 को भारतीय रुपये को एक नई पहचान दी गई. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने रुपये के सिक्कों और नोटों के प्रचलन पर नियंत्रण किया.

कब अस्तित्व में आया अमेरिकी डॉलर

अमेरिकी डॉलर के प्रचलन की शुरुआत 1792 में हुई. उस समय डॉलर को आधिकारिक मुद्रा के रूप में मान्यता मिली और इसे अमेरिकी सरकारी सिक्कों और कागजी नोटों के रूप में जारी किया गया. शुरुआती वर्षों में डॉलर का मूल्य एक निश्चित मात्रा में गोल्ड और सिल्वर के बराबर था, जिसे ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ प्रणाली के रूप में जाना जाता था. 20वीं शताब्दी में 1944 में ब्रेटन वुड्स समझौते के साथ डॉलर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा प्रणाली में प्रमुख मुद्रा बन गया. ब्रेटन वुड्स समझौते ने अमेरिकी डॉलर को दूसरी मुद्राओं के मुकाबले स्थिर कर दिया और इसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्त में मुख्य रूप से प्रचलित मुद्रा बना दिया. यह समझौता 1971 में समाप्त हुआ. इसके बाद डॉलर की विनिमय दर को ‘फ्लोटिंग’ यानी तैरते रूप में रखने की अनुमति मिली, जिससे यह दुनिया भर के बाजारों में और भी अधिक प्रचलित हुआ.

1947 में कितने रुपये में मिलता था एक अमेरिकी डॉलर

1947 में 1 अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की विनिमय दर 4.76 रुपये थी. यह दर ब्रेटन वुड्स समझौते से प्रभावित थी. इस समझौते ने अमेरिकी डॉलर को सोने से जोड़ा और भारतीय रुपये जैसी दूसरी मुद्राओं का मूल्यांकन अमेरिकी डॉलर के सापेक्ष किया गया. यह दर औपनिवेशिक शासन की विरासत और अगस्त 1947 में भारतीय स्वतंत्रता के बाद की अवधि का हिस्सा थी, जब भारत एक अधिक संप्रभु आर्थिक प्रणाली में परिवर्तित हो रहा था​.

आज कितने रुपये में मिलता है एक अमेरिकी डॉलर

बाजार के आंकड़ों के अनुसार, 7 दिसंबर, 2024 तक 1 अमेरिकी डॉलर से भारतीय रुपये की विनिमय दर लगभग 84.6563​ है. वैश्विक वित्तीय स्थितियों और बाजार की मांग सहित विभिन्न आर्थिक कारकों के कारण इसकी दर उतार-चढ़ाव होना संभव है.

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78 साल में 95% गिरा रुपया

78 सालों में भारतीय रुपया की विनिमय दर में उल्लेखनीय गिरावट हुई है. 1946 में भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 4.76 था. आज के समय में भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 80 रुपये प्रति डॉलर के स्तर पर है. इन 78 सालों में रुपये की विनिमय दर में लगभग 95% की गिरावट आई है. यह मुख्य रूप से आर्थिक सुधारों, मुद्रास्फीति, विदेशी मुद्रा की मांग और आपूर्ति से प्रभावित होकर गिरा.

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KumarVishwat Sen

लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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