US-ईरान के बीच शांति का मुद्दा कहां अटका? युद्ध रोकने के लिए मोजतबा की शर्तें क्या? ट्रंप के पास कौन सा रास्ता? जानें

ईरान और अमेरिका के बीच किन शर्तों पर समझौता हो सकता है?
US Iran Deal: ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच 28 फरवरी से युद्ध शुरू हो गया. तीन हफ्ते बीतने के बाद भी दोनों पक्ष अब भी शांति पर राजी नहीं हुए हैं. लेकिन एक समय पर दोनों देश लगभग राजी हो गए थे, तो कहां बिगड़ा मामला और आगे का रास्ता कैसे तय होगा?
US Iran Deal: डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की रणनीति इस समय एक जोखिम भरे संतुलन की तरह नजर आ रही है, जिसमें युद्ध और कूटनीति दोनों को साथ-साथ साधने की कोशिश की जा रही है. एक तरफ अमेरिका ईरान पर सैन्य दबाव बढ़ा रहा है, तो दूसरी ओर पर्दे के पीछे संभावित शांति समझौते की जमीन भी तैयार की जा रही है. यह दोहरी नीति इस बात का संकेत है कि वॉशिंगटन युद्ध को पूरी तरह खत्म होने का इंतजार नहीं करना चाहता, बल्कि उसी दौरान ‘एंडगेम’ तय करने की कोशिश कर रहा है. अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि लगातार सैन्य दबाव से ईरान को बातचीत की टेबल पर मजबूर किया जा सकता है, हालांकि यह रास्ता आसान नहीं है और संघर्ष के अभी कई हफ्तों तक जारी रहने की आशंका भी जताई जा रही है.
इस उभरती रणनीति की खास बात यह है कि पारंपरिक कूटनीतिक चैनलों के बजाय बैकडोर संपर्कों पर ज्यादा भरोसा किया जा रहा है. उनके दामाद जेरेड कुश्नर और स्टीव विटकॉफ जैसे करीबी सहयोगियों के जरिए संभावित समझौते की रूपरेखा तैयार करने की कोशिश हो रही है. इससे साफ है कि यह पहल औपचारिक राजनयिक प्रक्रिया के बजाय नेताओं के बीच सीधे और अनौपचारिक संवाद पर आधारित है. हालांकि, यह मॉडल जहां तेजी से नतीजे दे सकता है, वहीं इसमें रणनीतिक विरोधाभास भी छिपे हैं, क्योंकि एक तरफ युद्ध जारी है और दूसरी ओर उसी दौरान शांति की संभावनाएं तलाश की जा रही हैं, जो पूरे समीकरण को और जटिल बना देती हैं.
अमेरिका-ईरान डील का संभावित ढांचा कैसा हो सकता है?
• ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर सीमा: अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु संवर्धन और हथियार से जुड़ी गतिविधियों पर सख्त रोक लगाए. यह मांग पहले भी उठ चुकी है, लेकिन भरोसे की कमी और शर्तों पर असहमति के कारण सहमति नहीं बन पाई.
• मिसाइल कार्यक्रम पर नियंत्रण: वॉशिंगटन ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को सीमित करने की शर्त रख सकता है. अमेरिका का मानना है कि यह क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है, जबकि ईरान इसे अपनी रक्षा जरूरत बताता है.
• क्षेत्रीय सैन्य गतिविधियों पर रोक: अमेरिका चाहता है कि ईरान मिडिल ईस्ट में अपने सहयोगी समूहों (हमास, हिज्बुल्ला और हूथी) और सैन्य प्रभाव को कम करे. ईरान इसे अपनी रणनीतिक गहराई का हिस्सा मानता है, इसलिए यह मुद्दा बातचीत में सबसे जटिल बन सकता है.
• प्रतिबंधों में राहत (ईरान की मांग): ईरान चाहता है कि उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध पूरी तरह या चरणबद्ध तरीके से हटाए जाएं. प्रतिबंध हटने से उसकी अर्थव्यवस्था को राहत मिलेगी और अंतरराष्ट्रीय व्यापार फिर से शुरू हो सकेगा.
• फ्रीज किए गए एसेट्स की वापसी: ईरान की बड़ी रकम विदेशी बैंकों में जमी हुई है, जिसे वह वापस पाना चाहता है. यह मुद्दा ईरान के लिए आर्थिक स्थिरता और घरेलू दबाव कम करने से जुड़ा है.
• आर्थिक रियायतें: ईरान निवेश, व्यापार और तेल निर्यात पर छूट जैसी अतिरिक्त आर्थिक सहूलियतें मांग सकता है. इन रियायतों के बिना ईरान किसी भी समझौते को अधूरा मान सकता है.
ईरान बातचीत से क्यों हिचक सकता है?
• पहले युद्धविराम या तनाव कम करने की शर्त: ईरान चाहता है कि बातचीत शुरू होने से पहले संघर्ष को रोका या कम किया जाए. उसका मानना है कि दबाव की स्थिति में बातचीत करना उसके हित में नहीं होगा.
• भविष्य में समझौते से अमेरिका के पीछे हटने की गारंटी: ईरान को डर है कि अमेरिका पहले की तरह किसी भी समय समझौते से बाहर निकल सकता है. इसलिए वह कानूनी और ठोस गारंटी चाहता है ताकि समझौता टिकाऊ हो.
• क्षेत्रीय भूमिका की मान्यता: ईरान चाहता है कि मिडिल ईस्ट में उसके प्रभाव और भूमिका को औपचारिक रूप से स्वीकार किया जाए. यह उसके लिए सिर्फ सुरक्षा नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिष्ठा और रणनीतिक पहचान का सवाल भी है.
अविश्वास की खटास दोनों के बीच बातचीत की सबसे बड़ी बाधा
अमेरिका और ईरान के बीच अविश्वास इस पूरे संकट की सबसे बड़ी बाधा बनकर सामने आया है. हालिया घटनाक्रम ने इस खाई को और गहरा कर दिया है. अब्बास अराघची ने साफ शब्दों में कहा कि अमेरिका के साथ बातचीत अब हमेशा के लिए खत्म हो चुकी है, क्योंकि वॉशिंगटन ने हमले न करने का भरोसा दिया था, लेकिन बाद में उसी वादे से मुकर गया.
उनके बयान से यह स्पष्ट होता है कि ईरान अब अमेरिकी दबाव को कूटनीतिक अवसर नहीं, बल्कि जबरदस्ती और धोखे के रूप में देख रहा है. यही वजह है कि जहां अमेरिका सैन्य दबाव को अपनी ताकत मानकर बातचीत का रास्ता खोलना चाहता है, वहीं ईरान इसे अपनी संप्रभुता पर दबाव के तौर पर देख रहा है, जिससे दोनों देशों के बीच किसी भी संभावित समझौते की जमीन और कमजोर होती जा रही है.
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ईरान की ओर से कौन करेगा बात?
बातचीत की कोई ठोस राह फिलहाल नजर नहीं आ रही है. बैकडोर चैनलों की चर्चा जरूर हो रही है, लेकिन यह साफ नहीं है कि ईरान की ओर से आधिकारिक प्रतिनिधि कौन होगा, मध्यस्थ देश कौन बनेगा और क्या दोनों पक्ष एक साथ बातचीत के लिए तैयार भी होंगे या नहीं. पहले ओमान जैसे देश इस भूमिका में अहम रहे हैं, लेकिन इस बार ऐसी किसी व्यवस्था की पुष्टि नहीं हुई है. वहीं ईरान की लीडरशिप भी समाप्त हो गई है, इसमें अली लारिजानी सबसे अहम हैं, जो ईरान की ओर से अब तक इस बातचीत में शामिल थे.
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सैन्य दबाव और कूटनीति दोनों नाव पर सवार ट्रंप प्रशासन
कुल मिलाकर ट्रंप प्रशासन की रणनीति एक हाई-रिस्क संतुलन की तरह दिख रही है, जहां सैन्य दबाव और कूटनीति दोनों को साथ लेकर चला जा रहा है. अमेरिकी अधिकारियों को भी इस बात का अंदाजा है कि जल्दबाजी में पीछे हटना उनकी ताकत को कमजोर कर सकता है, जबकि लंबे समय तक संघर्ष जारी रहने से क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ सकती है. ऐसे में आने वाले समय में यह तय होगा कि यह रणनीति किसी ठोस समझौते तक पहुंचती है या फिर और ज्यादा अनिश्चितता पैदा करती है.
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लेखक के बारे में
By Anant Narayan Shukla
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट. करियर की शुरुआत प्रभात खबर के लिए खेल पत्रकारिता से की और एक साल तक कवर किया. इतिहास, राजनीति और विज्ञान में गहरी रुचि ने इंटरनेशनल घटनाक्रम में दिलचस्पी जगाई. अब हर पल बदलते ग्लोबल जियोपोलिटिक्स की खबरों के लिए प्रभात खबर के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं.
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