OPEC : वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए कितना अहम है ओपेक, जिससे बाहर निकलेगा यूएई

Published by :Preeti Singh Parihar
Published at :29 Apr 2026 5:26 PM (IST)
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uae quit opec

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संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन ओपेक से बाहर निकलने की घोषणा की है. यूएई के इस फैसले के बाद वैश्विक तेल की राजनीति में उथल-पुथल का माहौल है. इसे ओपेक के उस कार्टेल के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, जो तेल उत्पादन की देखरेख करता है और वैश्विक कीमतों पर असर डालता है...

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OPEC : संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) से अलग होने का फैसला किया है. यूएई ने घोषणा की है कि वह 1 मई, 2026 से ओपेक और ओपेक प्लस से अलग हो रहा है. दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों में से एक यूएई ने यह कदम ऐसे समय उठाया है, जब ईरान संघर्ष के चलते होर्मुज स्ट्रेट बाधित होने के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में तकरीबन दो माह से अनिश्चितता बरकरार है. ऐसे में यूएई के ओपेक से बाहर निकलने का फैसला वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित कर सकता है और आने वाले समय में तेल की कीमतों में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है.

क्या है ओपेक

ओपेक दुनिया के कुछ प्रमुख तेल उत्पादक देशों का एक स्थायी, अंतर-सरकारी संगठन है. इसका पूरा नाम ‘ऑर्गनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज’ है यानी पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन. यह संगठन विश्व बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को स्थिर रखने में अहम भूमिका निभाता है, ताकि तेल उत्पादकों को नुकसान न हो और उपभोक्ताओं को उचित दाम पर तेल मिले.

कैसे बना यह संगठन

इस संगठन की स्थापना पश्चिमी तेल कंपनियों के प्रभाव को कम करने के उद्देश्य से सितंबर 1960 में इराक के बगदाद सम्मेलन में हुई थी और इसके संस्थापक देश थे ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला. इसका मुख्यालय ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में है. अप्रैल 2026 तक ओपेक में कुल 12 सदस्य देश शामिल थे. लेकिन यूएई के इस संगठन से बाहर निकलने के फैसले के बाद अब इसमें 11 सदस्य देश होंगे.

ओपेक के सदस्य देश

ओपेक के सदस्य देशों में मध्य पूर्व के चार (यूएई से हटने से पहले पांच), अफ्रीका के छह और दक्षिण अमेरिका का एक देश शामिल हैं-
सऊदी अरब
इराक
ईरान
कुवैत
वेनेजुएला
नाइजीरिया
लीबिया
अल्जीरिया
गैबॉन
कांगो गणराज्य
भूमध्यरेखीय गिनी

वैश्विक ऊर्जा बाजार में ओपेक की भूमिका

ओपेक का वैश्विक ऊर्जा बाजार में मजबूत दखल रहा है, क्योंकि किसी दौर में दुनिया के कुल कच्चे तेल के भंडार का लगभग 80 प्रतिशत ओपेक देशों के पास था. अभी भी करीब 50 फीसदी हिस्सेदारी ओपेक देशों के पास है. ये देश जब तेल के उत्पादन को कम करने का फैसला करते हैं, तो दुनिया भर में तेल की कीमतें बढ़ जाती हैं, वहीं उत्पादन बढ़ाने पर कीमतें गिरती भी हैं. ओपेक एक तरह का ‘ऑयल कार्टेल’ (गुट) है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था की नब्ज यानी तेल को नियंत्रित करने की ताकत रखता है.

ओपेक प्लस को भी जानें  

ओपेक प्लस का गठन आधिकारिक तौर पर दिसंबर 2016 में हुआ था. ओपेक के 11 ( यूएई के साथ 12 थे) सदस्य देशों के अलावा 10 अन्य देश भी ओपेक देशों के साथ मिलकर तेल उत्पादन का निर्णय लेते हैं, जिन्हें ‘ओपेक प्लस’ कहा जाता है. ओपेक प्लस के देशों में रूस,कजाकिस्तान, अजरबैजान, ब्रुनेई, मलेशिया, बहरीन, ओमान, मैक्सिको, दक्षिण सूडान और सूडान शामिल हैं. 

यूएई पहला नहीं, कई देशों ने छोड़ा है ओपेक

यूएई से पहले भी कई देश ओपेक से बाहर निकल चुके हैं. इंडोनेशिया ने 2009 में इससे अपनी सदस्यता वापस ली, लेकिन फिर से शामिल हुआ और 2016 में दोबारा छोड़ दिया. कतर ने गैस उत्पादन पर ध्यान केंद्रित करने के लिए 2019 में ओपेक छोड़ दिया. ओपेक प्लस देशों ने भी हमेशा कोटा का सख्ती से पालन नहीं किया है. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) की स्थापना 1970 के दशक में मुख्य रूप से पश्चिमी सदस्य देशों के लिए एक ‘ओपेक-विरोधी’ संगठन के रूप में की गयी थी, ताकि किसी वैश्विक संकट के दौरान तेल की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए उनके रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (एसपीआर) को जारी करने में समन्वय स्थापित किया जा सके.

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लेखक के बारे में

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