तानाशाही फिर चुनाव क्यों? उत्तर कोरिया में 99.93% वोटों से जीते किम जोंग उन

Updated at : 18 Mar 2026 11:58 AM (IST)
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North Korea Election Results 2026

तस्वीर में उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन.

North Korea Election Results: उत्तर कोरिया में 15 मार्च 2026 को हुए संसदीय चुनाव के नतीजों ने सबको चौंका दिया है. किम जोंग उन की पार्टी को 99.93% वोट मिलने के पीछे की असली वजह क्या है? जानिए कैसे वोटिंग के बहाने वहां की सत्ता में 70% नए चेहरों की एंट्री हुई और क्यों वोट न देना वहां देशद्रोह माना जाता है.

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North Korea Election Results: उत्तर कोरिया में 15 मार्च 2026 को हुए संसदीय चुनावों के नतीजे आ गए हैं. किम जोंग उन ने एक बार फिर ऐतिहासिक जीत दर्ज की है. योनहाप न्यूज एजेंसी ने उत्तर कोरियाई सरकारी मीडिया के हवाले से बताया कि किम जोंग उन की वर्कर्स पार्टी और उनके सहयोगियों को 99.93 प्रतिशत वोट मिले हैं. हैरानी की बात यह है कि इस चुनाव में वोटिंग का प्रतिशत भी 99.99 रहा, यानी लगभग हर नागरिक ने वोट डाला. अब 15वीं सुप्रीम पीपल्स असेंबली (SPA) के नए सदस्य देश की कमान संभालने और संविधान में बदलाव के लिए तैयार हैं.

केसीएनए (KCNA) की रिपोर्ट के मुताबिक, इस नई असेंबली का पहला काम देश के राष्ट्रपति का चुनाव और ‘सोशलिस्ट संविधान’ में संशोधन करना होगा. योनहाप न्यूज एजेंसी का मानना है कि इस बार किम जोंग उन संविधान में दक्षिण कोरिया को आधिकारिक तौर पर अपना ‘परम शत्रु’ लिख सकते हैं. इस मीटिंग में किम जोंग उन अपनी नई विदेश नीति का एलान भी कर सकते हैं. एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया सिर्फ किम जोंग उन की ताकत को कानूनी रूप देने का एक तरीका है.

70% नए चेहरे और किम की बहन की एंट्री

इस चुनाव में 687 सीटों पर वोटिंग हुई, जिसमें एक बड़ा फेरबदल देखने को मिला है. योनहाप न्यूज एजेंसी के अनुसार, पिछले बार के मुकाबले 70 प्रतिशत से ज्यादा सांसद (डिप्टी) बदल दिए गए हैं. जानकारों का मानना है कि यह किम जोंग उन द्वारा अपनी पावर को और मजबूत करने की कोशिश है. चुने गए लोगों में किम जोंग उन की पावरफुल बहन किम यो-जोंग, विदेश मंत्री चो सन-हुई और किम के खास सहयोगी जो योंग-वोन शामिल हैं. वहीं पुराने दिग्गज चो रयोंग-हे को इस लिस्ट से बाहर कर दिया गया है.

विरोध में पड़े सिर्फ 0.07% वोट 

केसीएनए की रिपोर्ट में एक दिलचस्प डेटा यह दिया गया कि 0.07 प्रतिशत लोगों ने उम्मीदवारों के खिलाफ वोट दिया. जानकारों का कहना है कि इतने कम ‘ना’ वाले वोट सिर्फ दुनिया को यह दिखाने के लिए रखे जाते हैं कि वहां विरोध की आजादी है. असल में, वहां वोटिंग सीक्रेट नहीं होती. अगर कोई ‘ना’ चुनता है, तो उसे सरकार की नजर में गद्दार माना जा सकता है. वहां विपक्ष का कोई रोल नहीं है और किम जोंग उन के पास ही सेना से लेकर सरकार तक की सारी फाइनल पावर है.

वोट न देना मतलब देश से गद्दारी

‘द पीपल्स कोरिया’ की रिपोर्ट्स के मुताबिक, उत्तर कोरिया के संविधान में 17 साल से ऊपर के हर नागरिक के लिए वोट देना अनिवार्य है. इसे सिर्फ अधिकार नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी माना जाता है. वहां चुनाव में हिस्सा न लेना ‘देशद्रोह’ के बराबर समझा जाता है. यही वजह है कि चीन और रूस जैसे देशों में रहने वाले उत्तर कोरियाई नागरिक भी इन चुनावों में अपनी हाजिरी लगवाते हैं.

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डेमोक्रेसी के नाम पर सख्त तानाशाही है

कहने को तो उत्तर कोरिया का पूरा नाम ‘डेमोक्रेटिक पीपल्स रिपब्लिक ऑफ कोरिया’ है, लेकिन असल में यह एक सख्त तानाशाही है. वहां हर 5 साल में चुनाव होते हैं, पर हर सीट पर सिर्फ एक ही उम्मीदवार खड़ा होता है जिसे पार्टी खुद चुनती है. लोगों के पास अपनी पसंद का कैंडिडेट चुनने का कोई ऑप्शन नहीं होता. यह चुनाव केवल जनता के अनुशासन को चेक करने और सरकारी डेटा को अपडेट करने का एक जरिया मात्र बनकर रह गया है.

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Govind Jee

लेखक के बारे में

By Govind Jee

गोविन्द जी ने पत्रकारिता की पढ़ाई माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय भोपाल से की है. वे वर्तमान में प्रभात खबर में कंटेंट राइटर (डिजिटल) के पद पर कार्यरत हैं. वे पिछले आठ महीनों से इस संस्थान से जुड़े हुए हैं. गोविंद जी को साहित्य पढ़ने और लिखने में भी रुचि है.

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