अफगानिस्तान के सबसे खूंखार आतंकी संगठन हक्कानी नेटवर्क ने संभाली काबुल की कमान, अल-कायदा से हैं नजदीकियां

Kabul: A Taliban fighter sits on the back of a vehicle with a machine gun in front of the main gate leading to the Afghan presidential palace, in Kabul, Afghanistan, Monday, Aug. 16, 2021. The U.S. military has taken over Afghanistan's airspace as it struggles to manage a chaotic evacuation after the Taliban rolled into the capital. AP/PTI(AP08_16_2021_000171B)
Haqqani Network अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद तालिबान के कुछ शीर्ष नेता काबुल में नई अफगान सरकार के गठन पर चर्चा करने के लिए एकत्रित हो रहे हैं. इसमें शामिल होने के लिए हक्कानी नेटवर्क का एक प्रतिनिधि भी वहां पहुंचा है. बता दें कि हक्कानी नेटवर्क अफगानिस्तान का सबसे खूंखार आतंकवादी संगठन है.
Haqqani Terror Network अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद तालिबान के कुछ शीर्ष नेता काबुल में नई अफगान सरकार के गठन पर चर्चा करने के लिए एकत्रित हो रहे हैं. बड़ी बात यह है कि इस चर्चा में शामिल होने के लिए हक्कानी नेटवर्क का एक प्रतिनिधि भी वहां पहुंचा है. बता दें कि हक्कानी नेटवर्क अफगानिस्तान का सबसे खूंखार आतंकवादी संगठन है.
न्यूज 18 की रिपोर्ट के मुताबिक, हाल के वर्षों में कुछ सबसे घातक हमलों के लिए हक्कानी को दोषी ठहराया गया है. जिसमें नागरिकों, सरकारी अधिकारियों और विदेशी सुरक्षा बलों के जवानों की मौत हुई थी. तालिबान के पिछले सप्ताह अफगानिस्तान पर कब्जा करने के बाद नए शासन में उनके शक्तिशाली खिलाड़ी के तौर पर शामिल होने की उम्मीद जताई जा रही है.
इन सबके बीच, मीडिया रिपोर्ट में बताया जा रहा है कि राजधानी काबुल की कमान हक्कानी नेटवर्क को सौंप दी गई है, जिसकी नजदीकियां अल कायदा जैसे आतंकी संगठनों से हैं. हक्कानी नेटवर्क खुद कई घातक हमलों को अंजाम दे चुका है. ऐसे में एक बार फिर साफ हो गया है कि अफगानिस्तान की जमीन पर आतंकी संगठनों को ना पलने देने का तालिबान का दावा तो दिखावा है और पाकिस्तान का भी इसमें पूरा दखल है.
तालिबान के इस संगठन का गठन जलालुद्दीन हक्कानी ने किया था. हक्कानी की पहचान पहली बार 1980 के दशक में मुजाहिद्दीनों के सोवियत सेना के खिलाफ लड़े जा रहे युद्ध के दौरान हुई थी. जलालुद्दीन तब अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के संपर्क में आया था और यहीं से हक्कानी नेटवर्क की शुरुआत हुई थी. बताया तो यह भी जाता है कि 1979 में सोवियत सेना के जाने के बाद इस संगठन ने अफगानिस्तान में गृहयुद्ध भी लड़ा. सोवियत वापसी के बाद जलालुद्दीन हक्कानी ने ओसामा बिन लादेन सहित विदेशी जिहादियों के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए.
अफगानिस्तान में सरकार के खिलाफ हमलों में एक समय तालिबान से ज्यादा हक्कानी नेटवर्क का नाम सामने आने लगा. सरकार के खिलाफ हक्कानी नेटवर्क के ऑपरेशन की कमान जलालुद्दीन हक्कानी के बेटे सिराजुद्दीन ने संभाली और वह अपने पिता से भी खतरनाक माना जाता था. इसके बाद 2008 से लेकर 2020 तक अफगानिस्तान में कई बड़े हमलों में हक्कानी नेटवर्क का नाम सामने आया. हक्कानी संगठन के तीन सबसे बड़े हमलों में एक हमला 27 अप्रैल 2008 में हुआ था, जब हक्कानी नेटवर्क के आतंकियों ने तालिबान के साथ मिलकर तत्कालीन अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई पर ही हमला कर दिया. इस घटना को आत्मघाती हमलावरों के साथ बंदूकधारियों ने अंजाम दिया था और इसमें अफगानिस्तान के एक सांसद समेत तीन लोग मारे गए थे.
बताया जा रहा है कि हक्कानी नेटवर्क के सरगना जलालुद्दीन हक्कानी के खराब स्वास्थ्य के बाद उसके बेटे सिराजुद्दीन हक्कानी ने इस संगठन की कमान संभाल ली है. जलालुद्दीन हक्कानी की 2015 में मौत का खंडन करते हुए कई रिपोर्ट्स भी सामने आईं है. अंतत: 2018 में तालिबान ने ऐलान किया था कि सिराजुद्दीन की मौत हो गई है, लेकिन उसकी मौत की वजह कभी सामने नहीं आई. चर्चा है कि अगर अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार बनती है, तो सिराज को उपराष्ट्रपति भी बनाया जा सकता है. इसके अलावा सिराज के छोटा भाई अनस हक्कानी को काबुल की जिम्मेदारी सौंपी गई है. 2014 में अनस एक बार पकड़ा जा चुका था. बाद में 2016 में उसे कई हत्याओं, अपहरण और अन्य अपराधों के लिए मौत की सजा सुनाई गई थी, लेकिन विदेशियों की रिहाई के बदले अनस कैद से बाहर आ गया. अफगानिस्तान में अगली सरकार बनाने के लिए भाई अनस हक्कानी ही अमेरिकी और अफगान अफसरों से मुलाकात कर रहा है.
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